मध्य पूर्व में चल रहे तनाव से दुनिया का शायद ही कोई देश या सेक्टर बचा हो. इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई का असर सीधे भारत के बासमती चावल कारोबार पर पड़ रहा है. हजारों निर्यातकों के लिए यह लड़ाई बड़ी परेशानी का सबब बन चुकी है.
"माल और पैसा दोनों अटका है"
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) के महासचिव अजय भलोटिया ने 'किसान इंडिया' से खास बातचीत में कहा कि सीधे शब्दों में बात करें तो बासमती चावल के करीब 12,000 कंटेनरों पर असर पड़ा है. ये कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है. इसमें करीब 3 लाख मीट्रिक टन चावल है, जिसकी कीमत लगभग 3,000 करोड़ रुपये बैठती है. सोचिए, इतना बड़ा माल न अपने गंतव्य तक पहुंच पा रहा है, न ही उसका पैसा वापस आ रहा है. यानी पैसा भी अटका है और माल भी.
अजय भलोटिया के अनुसार,
हर कंटेनर पर औसतन डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा का घाटा हो रहा है. अगर कुल जोड़ करें, तो ये नुकसान करीब 300 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. लेकिन असली झटका सिर्फ इस नुकसान से नहीं है—जो शिपमेंट पहले ही भेजे जा चुके थे, उनका पेमेंट भी पूरी तरह अटक गया है. यानी व्यापारी ऐसी स्थिति में हैं, जहां न उनके पास माल है, न पैसा. कैश फ्लो रुकने का मतलब है कि आगे का काम भी धीरे-धीरे ठप पड़ सकता है.
लॉजिस्टिक्स बिगड़ा, हर दिन बढ़ रहा खर्च
जमीनी स्तर पर दिक्कतें और भी ज्यादा हैं. जिन देशों में ये चावल जाना था, वहां के लिए फिलहाल सभी शिपमेंट रोक दिए गए हैं. कई कंटेनर बीच रास्ते में ही रोक लिए गए हैं, कुछ को दूसरे पोर्ट्स पर उतार दिया गया है. इससे लॉजिस्टिक्स का पूरा हिसाब गड़बड़ा गया है. ऊपर से डिमरेज (कंटेनर खड़ा रहने का चार्ज), ग्राउंड रेंट और अतिरिक्त फ्रेट जैसे खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यानी नुकसान सिर्फ माल के फंसने का नहीं है, बल्कि हर दिन नया खर्च भी जुड़ रहा है.
सबसे ज्यादा परेशानी इस बात की है कि आयातकों की तरफ से कोई साफ जवाब नहीं मिल रहा. न वे पेमेंट कर रहे हैं, न ये बता रहे हैं कि आगे क्या करना है. ऐसे में चावल निर्यातकों के पास इंतजार करने के अलावा ज्यादा विकल्प भी नहीं बचते.
497 करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान पर गाइडलाइन का खुलासा नहीं
सरकार ने इस संकट को देखते हुए 497 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है. यह एक जरूरी कदम तो है, लेकिन अभी तक इसकी डिटेल सामने नहीं आई है. कारोबारियों को समझ नहीं आ रहा कि उन्हें इसमें से कितना और कैसे फायदा मिलेगा. भलोटिया के अनुसार, इंडस्ट्री की मांगें भी बहुत सीधी और व्यावहारिक हैं.
सबसे पहले—सरकार जल्द से जल्द इस पैकेज की पूरी जानकारी जारी करे.
दूसरा—जो अतिरिक्त खर्च बढ़ रहा है, जैसे डिमरेज, ग्राउंड रेंट और फ्रेट, उसमें कुछ राहत दी जाए.
तीसरा—बैंकिंग सेक्टर से मदद मिले, जैसे लोन री-स्ट्रक्चरिंग, ब्याज में राहत या नया वर्किंग कैपिटल, ताकि कारोबार चलते रहें.
चौथा—सरकार इस मुद्दे को कूटनीतिक स्तर पर उठाए, ताकि फंसा हुआ माल और रुका हुआ भुगतान दोनों निकल सकें.
भलोटिया कहते हैं कि यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ कुछ व्यापारियों की समस्या नहीं है. बासमती चावल भारत का एक बड़ा एक्सपोर्ट प्रोडक्ट है और मध्य पूर्व इसका अहम बाजार रहा है. अगर यह संकट लंबा चलता है, तो इसका असर पूरे एग्री-एक्सपोर्ट सेक्टर पर पड़ सकता है साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख भी प्रभावित हो सकती है और दूसरे देश इस मौके का फायदा उठा सकते हैं.
