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ईरान और सऊदी अरब 7 साल बाद संबंध बहाली पर सहमत, इसमें पंच बने चीन को क्या फायदा?

Iran और Saudi Arabia दो महीने के भीतर राजनयिक संबंधों को फिर से स्थापित करने और दूतावासों को फिर से खोलने पर सहमत

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ईरान और सऊदी अरब दो महीने के भीतर राजनयिक संबंधों को फिर से स्थापित करने (Iran-Saudi Arabia Agree To Restore Relations) और दूतावासों को फिर से खोलने पर सहमत हो गए हैं. 7 साल के लंबे गैप के बाद मिडिल ईस्ट की इन दो बड़ी शक्तियों के संबंधों की बहाली की पुष्टि एक संयुक्त बयान जारी करके की गयी है.

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सऊदी की सरकारी न्यूज एजेंसी द्वारा प्रकाशित इस बयान के अनुसार, सऊदी और ईरानी अधिकारियों ने इस सप्ताह चीन में आयोजित वार्ता के बाद समझौते की घोषणा की है. वर्ल्ड ऑर्डर में अमेरिका के टॉप पोजीशन को लगातार चुनौती देता चीन, दोनों ही देशों के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है.

ईरान के सरकारी मीडिया ने भी इस समझौते की घोषणा की है.

ईरान-सऊदी के बीच क्या सहमति बनी है?

सऊदी अरब और ईरान दो महीने के भीतर एक-दूसरे के देशों में दूतावास फिर से खोलेंगे, और दोनों राज्यों ने "राष्ट्रों की संप्रभुता के लिए उनके सम्मान और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने" का वादा किया है.

संयुक्त बयान में कहा गया है कि रियाद और तेहरान ने 2001 में साइन किए गए एक सुरक्षा सहयोग समझौते को सक्रिय करने पर सहमति व्यक्त की है. दोनों देशों के बीच यह ऐसी पॉलिस शिफ्ट है जो सऊदी अरब को निशाना बनाने वाले ईरानी प्रॉक्सी के सालों के मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद आया है.

इसके अलावा पुराने व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक समझौतों को भी फिर से सक्रिय करने पर सहमति जताई गयी है.

ईरान-सऊदी के बीच संबंध क्यों बिगड़े थे?

दशकों की क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के बाद, सऊदी अरब ने 2016 में ईरान के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह से काट दिया था. इसकी तात्कालिक वजह थी कि सऊदी अरब द्वारा एक प्रमुख सऊदी शिया मौलवी को फांसी दिए जाने के बाद 2016 में ईरानी प्रदर्शनकारियों ने तेहरान में मौजूद सऊदी के दूतावास पर धावा बोल दिया था.

शिया-बहुसंख्यक ईरान और सुन्नी मुस्लिम बहुसंख्यक सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में जारी कई संघर्ष क्षेत्रों में प्रतिद्वंद्वी पक्षों का समर्थन करते हैं. इसमें यमन भी शामिल है जहां हूती विद्रोहियों को तेहरान का समर्थन प्राप्त है, जबकि रियाद वहां की सरकार का समर्थन करने वाले एक सैन्य गठबंधन को अपना समर्थन देता है.

फारस की खाड़ी में एक दूसरे से 150 मील से भी कम दूरी पर स्थित इन दो इस्लामिक देशों के बीच संघर्ष ने मिडिल ईस्ट में लंबे समय से राजनीति और व्यापार को आकार दिया है.

दोनों देशों के बीच तनाव 2019 में अपने चरम पर पहुंच गया, जब एक प्रमुख सऊदी ऑयल प्लांट पर एक मिसाइल और ड्रोन हमले ने देश के क्रूड ऑयल उत्पादन का आधा हिस्सा बाधित कर दिया. अमेरिकी अधिकारियों ने तब कहा कि हमला ईरान की निगरानी में हुआ था.

सऊदी अधिकारियों ने भी बार-बार ईरान के न्यूक्लिर प्रोग्राम पर आशंका व्यक्त की है. उसने यह कहा है कि वे ही ईरान के लिए सबसे महत्वपूर्ण टारगेट होंगे.

ईरान-सऊदी के बीच हाल में सुलझे संबंध

हाल ही में दोनों देशों की ओर से संबंधों को मधुर बनाने के लिए और अधिक प्रयास किए गए हैं. अलजजीरा की रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बगदाद में सऊदी और ईरानी अधिकारियों के बीच बैठकें हुई हैं. इराकियों ने 2021 में मध्यस्थता वार्ता शुरू की लेकिन 2021 के इराकी चुनावों के दौरान सब कुछ बंद हो गया.

तेहरान और रियाद के बीच बेहतर संबंधों का मध्य पूर्व में राजनीति पर प्रभाव पड़ सकता है.

ईरान-सऊदी के बीच पंच बनकर चीन को क्या फायदा?

चीन ने हाल ही में ईरान के कट्टर राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी की मेजबानी की थी और वह सऊदी तेल का एक सबसे बड़ा खरीदार भी है. राष्ट्रपति के रूप में तीसरे पांच साल का कार्यकाल पाने वाले राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिसंबर 2023 में चीन की ऊर्जा आपूर्ति के लिए खाड़ी अरब देशों के साथ बैठकों में भाग लेने के लिए खुद रियाद गए थे.

चीन लगातार दोनों को एक साथ साधने की कोशिश करता रहा है. उदाहरण के लिए, 2016 में, शी जिनपिंग ने सऊदी अरब और ईरान दोनों के साथ कुछ हफ्तों के भीतर ही व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. 2017 और 2019 दोनों में बीजिंग ने ईरान और सऊदी अरब के साथ अलग-अलग सैन्य अभ्यास किए और वो भी केवल कुछ ही हफ्तों के गैप के अंदर.

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फारस की खाड़ी विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में चीनी उत्पादों, निवेश और बुनियादी ढांचे के लिए एक आकर्षक गंतव्य रही है. चीन की इस महत्वकांक्षा को खाड़ी के राजशाही में कई राष्ट्रीय पहलों से बल भी मिला है, जैसे कि सऊदी विजन 2030, जो खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने और उन्हें तेल व्यापर से आगे अपना अस्तित्व खड़ा करने के तैयार करना चाहता है. इसने अक्षय ऊर्जा, उपग्रह प्रौद्योगिकी और 5G प्रौद्योगिकी पर चीन-खाड़ी सहयोग को और अधिक आसान बनाया है.

डरहम यूनिवर्सिटी के बेंजामिन ह्यूटन ने अपने एक रिसर्च पेपर में लिखा है कि यह क्षेत्र कई अन्य कारणों से भी चीन के लिए महत्वपूर्ण है. घरेलू स्तर पर, बीजिंग यह चिंता जताता रहा है कि अल्पसंख्यक उइगर मुसलमान, जिनमें से अधिकांश झिंजियांग के उत्तर-पश्चिमी प्रांत में रहते हैं, चरमपंथी, आतंकवादी या अलगाववादी गतिविधियों में भाग ले सकते हैं. लेकिन उनपर सरकारी कार्रवाई, निगरानी और क्रूरता की नीतियों ने पश्चिमी देशों के दावों को हवा दी है कि बीजिंग उइगरों के मानवाधिकारों का हनन कर रहा है.

दूसरी तरफ फारस की खाड़ी कई प्रभावशाली मुस्लिम देशों का घर है. ईरान और सऊदी अरब दोनों ही इस्लाम के सच्चे ध्वजवाहक होने का दावा करते हैं. ऐसे में चीनी सरकार ने झिंजियांग में अपनी नीतियों को सही ठहराने के लिए इन राज्यों के साथ अपने संबंधों का हवाला दे सकती है.

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