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लगातार बढ़ रहे हैं बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार के मामले

सर्वे के मुताबिक, नहीं बनना चाहता कोई बुढ़ापे की लाठी

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(क्‍व‍िंट हिंदी पर ये स्‍टोरी पहली बार 28 सितंबर, 2017 को छपी थी. 1 अक्‍टूबर को अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस के मौके पर हम इसे पाठकों के लिए फिर से पेश कर रहे हैं.)

मुकुंद शर्मा के तीन बेटे हैं. उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया लिखाया...काबिल बनाया. लेकिन अब उन्हें अपने ही बेटों के खिलाफ मुकद्दमा लड़ना पड़ रहा है. अपने ही बेटों की ज्‍यादती का शिकार बने मुकुंद शर्मा अब न्याय के लिए अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं.

बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार का मसला सिर्फ घर की दहलीज तक ही सीमित नहीं है. बाहर भी बुजुर्गों को अपमानित करने वालों की कमी नहीं है. अदालतों के चक्कर लगा रहे शर्मा की मानें तो कई बार सीट को लेकर जवान लड़के ही उन्हें अपमानित करते हैं.

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सुरिंदर कौर एक स्वाभिमानी महिला हैं, जो आज अपने हक के लिए अपने ही बेटों से लड़ रहीं हैं. कौर के पति का देहांत होने के बाद उनका बेटा उनसे पूरी प्रॉपर्टी अपने नाम करा लेना चाहता था. प्रॉपर्टी को लेकर उनके बेटे ने न सिर्फ उन्हें कई बार अपमानित किया. बल्कि अंत में उन्हें अपने हक के लिए लड़ना भी पड़ा.

बुजुर्गों के साथ घर के अंदर और बाहर बदले व्यवहार को देखकर पारिवारिक मूल्यों को लेकर बहस छिड़ी हुई है. इसी क्रम में हेल्प एज इंडिया नाम की संस्था ने पूरे देश में एक सर्वे कराया. सर्वे के जरिए जानने की कोशिश की गई कि आखिर पारिवारिक मूल्य अब कहां पहुंच चुके हैं.

आज एक ऐसे देश में आयु को लेकर भेदभाव बढ़ रहा है, जो अपनी संस्कृति और मूल्यों के लिए खुद पर गर्व करता है. यह दुखद है कि 53% बुजुर्गों ने साक्षात्कार में कहा कि हां, हमें समाज में भेदभाव सहना पड़ता है. यह अलग-अलग शहरों में अलग-अलग मात्रा में होता है. 
मंजिरा खुराना, कंट्री हेड, एडवोकेसी एंड कम्यूनिकेशंस, हेल्प एज इंडिया
44 फीसदी बुजुर्गों ने माना कि उन्हें बस, मेट्रो, बैंक, पोस्ट ऑफिस, पार्क और सड़कों पर अपमानित किया जाता है.  
52 फीसदी बुजुर्गों ने माना कि उनके धीमे चलने से लोग बेचैन हो जाते हैं.
54 फीसदी बुजुर्गों ने माना कि किसी भी दुकान में बुजुर्ग के बजाय युवाओं को तवज्जो दी जाती है. 

हेल्प एज इंडिया के मंजिरा खुराना बताते हैं कि बेंगलुरु में 70 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें अपशब्दों का सामना करना पड़ता है. संभव है यह इसलिए है, क्योंकि यह शहर तेजी से विकसित हो रहा है, वहां आईटी कंपनियों में परफॉर्मेंस को लेकर बहुत प्रेशर है. वहां जो बुजुर्ग माता-पिता बाहर आते हैं, उनकी हालत और हैसियत पोते-पोतियों की देखभाल करने वालों से ज्यादा नहीं है.

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