शुक्रवार, 17 अप्रैल को लोकसभा में विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला 'संविधान संशोधन बिल' लोकसभा में गिर गया. मोदी सरकार सदन में इस बिल को पास कराने के लिए जरूरी 'दो-तिहाई बहुमत' का आंकड़ा नहीं जुटा पाई.
वोटिंग के दौरान 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट किया. चूंकि यह मामला संविधान संशोधन का था, इसलिए इसके लिए साधारण बहुमत नहीं, बल्कि 'दो-तिहाई बहुमत' की अनिवार्य जरूरत थी, जिसे सरकार हासिल करने में नाकाम रही.
विपक्ष ने यह साफ कर दिया है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार महिला आरक्षण को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है, ताकि इसके पीछे छिपकर 'परिसीमन' को जबरदस्ती लागू किया जा सके.
मीडिया से बात करते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "हम महिला आरक्षण के पूरी तरह पक्ष में हैं. अगर सरकार 2023 में पास हुए महिला आरक्षण बिल को ही लागू कर दे, तो पूरा विपक्ष बिना किसी संकोच के उसका समर्थन करेगा."
यह इतना अहम क्यों है?
यह संसद में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया पहला बिल है, जो पराजित हुआ है.
सरकार को पहले भी कानून लाने में अड़चनें जरूर आई हैं—जैसे अपने पहले कार्यकाल में 'भूमि अधिग्रहण बिल' (Land Acquisition Bill) या दूसरे कार्यकाल में 'कृषि कानून'. लेकिन, उस समय सरकार ने इन बिलों को खुद ही वापस ले लिया था. यह पहली बार है जब सरकार कोई बिल लेकर आई, उस पर वोटिंग हुई और सरकार उसे पास कराने में नाकाम रही.
संसदीय इतिहास में ऐसी मिसालें कम हैं, जब सरकारें बिल पास कराने में नाकाम रही हों:
साल 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार आतंकवाद विरोधी कानून (POTA) लाई थी. यह बिल राज्यसभा में गिर गया था. हालांकि, बाद में सरकार ने संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर इसे पास करवा लिया था.
राजीव गांधी की सरकार पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 64वां संविधान संशोधन लेकर आई थी, जो राज्यसभा में गिर गया था. बाद में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार के समय यही बिल '73वें संविधान संशोधन' के तौर पर पास हो पाया.
बात कहां बिगड़ी?
महिला आरक्षण बिल 2023 में पास हुआ था और तब विपक्ष ने सरकार का पूरा साथ दिया था. लेकिन इस बार बाजी पलट गई. विपक्षी दलों ने बिल का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उन्हें इसमें परिसीमन को जबरदस्ती जोड़ने की कोशिश नजर आई.
सरकार और विपक्ष के बीच 'परिसीमन' ही वह असली पेंच है, जहां से पूरी खींचतान शुरू हुई. इस विवाद के दो मुख्य कारण हैं:
पहला डर यह है कि परिसीमन के बाद संसद में दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी (प्रतिनिधित्व) कम हो जाएगी.
विपक्ष को यह डर सता रहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन के बहाने चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं में ऐसी हेरफेर की जा सकती है, जिससे सत्ताधारी दल को अपने फायदे के लिए चुनावी नक्शा बदलने का मौका मिल जाए.
अब आगे क्या?
बिल का गिरना दोनों ही पक्षों के लिए फायदे और नुकसान की वजह बन सकता है.
बीजेपी इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगी. वह इसे एक हथियार बनाकर विपक्ष को 'महिला-विरोधी' साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. बिल के गिरते ही बीजेपी की महिला सांसदों ने संसद के बाहर मोर्चा खोल दिया और विपक्ष पर जमकर बरसीं.
वहीं दूसरी तरफ, विपक्ष का हौसला बढ़ा है. उन्हें मोदी सरकार को लोकसभा में पहली बार 'जीत का स्वाद' चखाने की कामयाबी मिली है.
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकार ने इस मौके पर यह बिल पेश ही क्यों किया? जबकि सरकार को अच्छी तरह पता था कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी आंकड़ा उनके पास नहीं है.
विपक्ष ने फिलहाल तो 'परिसीमन' (delimitation) को टाल दिया है, लेकिन अगली जनगणना—जो फिलहाल चल रही है—उसके बाद इसका होना लगभग तय है.
और इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि सरकार विपक्ष की उस मांग को मान लेगी, जिसमें महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से अलग करने की शर्त रखी गई है.
