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प्रेग्नेंट, जंगल और जेल.. डिपोर्टेशन के बाद बांग्लादेश से लौटी सुनाली की कहानी

जून 2025 में कथित तौर पर सुनाली, उनके पति दानिश, नाबालिग बेटे और तीन अन्य लोगों को बांग्लादेश डिपोर्ट किया था.

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क्या किसी भारतीय नागरिक को उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर, आधी रात को किसी दूसरे देश की सीमा में धकेला जा सकता है? पश्चिम बंगाल के बीरभूम की रहने वाली सुनाली खातून की कहानी किसी डरावनी फिल्म जैसी लगती है, लेकिन यह जून 2025 की एक कड़वी हकीकत है. सुनाली का दावा है कि जून 2025 में उन्हें, उनके पति, नाबालिग बेटे और तीन अन्य लोगों के साथ भारत से बांग्लादेश भेज दिया गया था.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सुनाली और उनका 8 साल का बेटा दिसंबर 2025 में भारत लौट आए, लेकिन उस खौफनाक मंजर को याद कर वह आज भी कांप उठती हैं.

आंखों  पर पट्टी बांध कर 'जबरन निर्वासन'

सुनाली खातून दिल्ली में घरों में बर्तन-झाड़ू का काम कर अपना गुजारा करती थीं. 20 जून 2025 की रात 8:00 बजे दिल्ली पुलिस ने उनके पति को हिरासत में लिया. इसके बाद सुनाली अपने करीबियों के साथ उन्हें छुड़ाने के लिए थाने गईं, जहां कथित तौर पर उनसे कहा गया कि अपने दस्तावेज दिखाएं.

सुनाली का दावा है कि उनके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड और यहां तक कि पेरेंट्स के 2002 के पहचान पत्र भी थे. बावजूद इसके, पुलिस ने इन दस्तावेजों को 'जाली' करार दिया और सभी को हिरासत में ले लिया.

सुनाली बताती हैं,

"हमें दो दिन थाने में और सात दिन 'लाल कोठी' में रखा गया. फिर एक बस में भरकर हमें हरियाणा के किसी इलाके में ले जाया गया. वहां हमारी आंखों पर पट्टी बांधी गई और जहाज (हेलीकॉप्टर) में चढ़ाया गया. जब पट्टी खुली, तो हम एक अंधेरे लॉरी में थे."
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जंगल में छोड़ा, बंदूक की धमकी

सोनाली का दावा है कि आखिरकार उन्हें एक घने जंगल में उतार दिया गया. उस वक्त वह एक महीने की गर्भवती थीं और उनके साथ उनका 8 साल का बेटा भी था. "हमने हाथ जोड़कर कहा कि हमें यहां मत छोड़ो, हमारे साथ बच्चा है. लेकिन हमें धमकी दी गई कि पीछे मुड़कर देखा तो गोली मार दी जाएगी,” वह बताती हैं.

सुनाली कहती हैं, "कई दिनों तक भटकने के बाद, एक छोटी नदी पार करके हम लोग एक गांव पहुंचे, जहां हमें पता चला कि हम लोग बांग्लादेश में हैं. इसके बाद वहां की पुलिस ने हमें कथित तौर पर अवैध रूप से सीमा पार करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया."

सोनाली और उनके साथियों को बांग्लादेश के चापाई नवाबगंज की जेल में रखा गया, जहां उन्होंने 101 दिन बिताए. उस दौरान सोनाली गर्भवती थीं, लेकिन उनके मुताबिक उनकी स्थिति को लेकर कोई विशेष संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई.

"हम बार-बार कहते रहे कि हम भारतीय हैं, लेकिन कोई हमारी बात नहीं सुन रहा था," वह बताती हैं.

अदालतों की दखल और वापसी

टीएमसी सांसद समीरुल इस्लाम की टीम के सदस्य मुफीजुल इस मामले में लगातार सक्रिय हैं. उन्होंने बताया कि बांग्लादेश की अदालतें इन लोगों को जमानत देने में हिचकिचा रही थीं क्योंकि उनके पास वहां का कोई स्थानीय पता नहीं था. भारतीय दूतावास को भी पत्र लिखे गए, लेकिन शुरुआत में कोई ठोस जवाब नहीं मिला. दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिससे यह कानूनी लड़ाई और पेचीदा हो गई है.

सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद सुनाली और उनके बेटे की भारत वापसी संभव हो पाई. दरअसल, 3 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाली खातून को मानवीय आधार पर भारत वापस लाने का निर्देश दिया था. हालांकि, सुनाली के पति दानिश शेख और उनके साथ गए अन्य लोग अभी भी बांग्लादेश में फंसे हुए हैं.

भारत वासपी के बाद सोनाली ने जनवरी 2026 में एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन उसके पिता अब भी वतन वापसी के लिए कानूनी जंग लड़ रहे हैं. सोनाली का कहना है, "मेरा बच्चा अब अपने पिता को ढूंढता है. त्यौहार बीत गए, लेकिन वह घर नहीं आए. हमारा कसूर सिर्फ इतना था कि हम बांग्ला बोलते थे, इसलिए हमें बांग्लादेशी समझ लिया गया."

डर, गरीबी और अनिश्चित भविष्य

आज सुनाली अपने गांव बीरभूम में अपने भाई के सहारे रह रही हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है.

दिल्ली लौटने के सवाल पर वह साफ मना कर देती हैं. “अब वहां जाने की हिम्मत नहीं है. जो हुआ, वो जिंदगी भर नहीं भूल सकते,” वह कहती हैं.

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