आजकल प्राइवेट हॉस्पिटल पर सरकार और मीडिया आरोप लगा रही है कि वो बेईमान और मुनाफा खोर संगठन हैं, जो भोले-भाले मरीजों को उनकी सबसे मुश्किल घड़ी में शिकार बनाते हैं. मरीज भी, जो कि ज्यादातर अपनी जेब से पैसे भरते हैं, इस बात से इत्तेफाक रखते हैं. वो अपने डॉक्टरों को शक की निगाह से देख रहे हैं और उनसे ऐसे सवाल पूछ रहे हैं, जैसे पहले कभी नहीं पूछे गए.
मरीज और उनके हेल्थ केयर सर्विस प्रोवाइडर के बीच भरोसा शायद सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है. यह भरोसा दोबारा कायम करने की जरूरत है, ताकि कम से कम हेल्थ केयर सिस्टम काम तो कर सके, अच्छे से काम करने की बात फिलहाल छोड़ दीजिए. अच्छी क्वालिटी की हेल्थकेयर सुविधा की उपलब्धता सभी आर्थिक वर्गों के लिए जरूरी है. ये दो अकाट्य सच हैं, जो हर विकसित समाज के लिए जरूरी हैं.
आयुष्मान भारत स्कीम इन दोनों मुद्दों का समाधान करने के लिए लागू की जा रही है, और यह काबिले-तारीफ मकसद है.
इस मकसद को आक्रामक और आकस्मिक प्राइस कंट्रोल के माध्यम से हासिल किया जाएगा. और समस्या यहीं पर है.

