(6 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. फिट हिन्दी बच्चों पर लिंग भेद-भाव के खराब प्रभावों पर लिखे इस लेख को फिर से प्रकाशित कर रहा है.)
मैं तीन साल की बच्ची की मां हूं और यह देख कर दंग हूं कि मीडिया और समाज के जरिए हमारे बच्चों पर किस तरह लैंगिक भेद करने वाली सूचनाएं थोपी जा रही हैं, और उनके लिए पहचान, अभिव्यक्ति और आकांक्षाओं के तंग दायरे तय किए जा रहे हैं.
काफी छोटी उम्र से ही हमारे बच्चों का सीमित और तंग नजरिये से सामना हो रहा है, जिसमें उन्हें बताया जा रहा है कि लड़का होने का क्या मतलब है और लड़की होने का क्या मतलब है.
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