जब सूरज संग हो जाए अंधियार के, तब दिये का टिमटिमाना जरूरी है,
जब देश को खतरा हो गद्दारों से, तो गद्दारों को धरती से मिटाना जरूरी है|
जब गुमराह हो रहा हो युवा देश का ,
तो उसे सही राह दिखाना जरूरी है.
जब हर आेर फैल गई हो निराशा देश में,
तो क्रांति का बिगुल बजाना जरूरी है.
जब नारी खुद को असहाय पाए तो,
उसे लक्ष्मीबाई बनाना जरूरी है.
जब नेताओं के हाथ में सुरक्षित न रहे देश ,
तो फिर सुभाष का आना जरूरी है.
जब सीधे तरीके से देश ना बदले,
तब विद्रोह जरूरी है...
- प्रयांशी मेहता
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