Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Webqoof Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019नफरती भाषा को सिनेमा के जरिए मेनस्ट्रीम में लाने की कोशिश?

नफरती भाषा को सिनेमा के जरिए मेनस्ट्रीम में लाने की कोशिश?

कश्मीर फाइल ने नफरत भरी भाषा का एक टेम्पलेट दिया, अब सिनेमा में ऐसी नफरत सामान्य होती दिख रही है

सिद्धार्थ सराठे
वेबकूफ
Published:
<div class="paragraphs"><p>ये तस्वीर AI के जरिए बनाई गई है&nbsp;</p></div>
i

ये तस्वीर AI के जरिए बनाई गई है 

फोटो : Google Gemini

advertisement

'2025 तक पूरा भारत एक इस्लामिक देश होगा.' ये डायलॉग से ज्यादा एक चेतावनी लगती है. चेतावनी देश के बहुसंख्यकों के लिए और अल्पसंख्यकों के खिलाफ. ये भाषा किसी सोशल मीडिया ट्रोल या ऐसे शख्स की नहीं जिसे हम आमतौर पर हेट स्पीच कहते हैं. ये 27 फरवरी को रिलीज हुई केरला स्टोरी 2 के ट्रेलर का पहला डायलॉग है.

फिल्म में कई ऐसे डायलॉग इस्तेमाल हुए हैं, जो अब तक वॉट्सऐप पर शेयर किए जाने नफरती कॉन्सपिरेसी थ्योरी में लिपटे हुए मैसेजेस में हुआ करते थे. जैसे कि 'मेरा अब्दुल ऐसा नहीं है.' 2022 से 2026 तक का सिलसिला देखें, तो फिल्म कश्मीर फाइल्स ने कश्मीरी पंडितों के पलायन की कहानी के नाम पर एक समुदाय को बाकी समाज के खिलाफ दुश्मन की तरह पेश करने का एक टेम्पलेट पेश किया.

यहां से सिलसिला शुरू हुआ और फिर हमारे बारह, उदयपुर फाइल्स, साबरमती रिपोर्ट, बस्तर, रजाकार, आखिर पलायन जैसी फिल्मों के जरिए इस नफरती भाषा और कॉन्सपिरेसी थ्योरी को मेन स्ट्रीम में लाने की कोशिश की गई. ये भाषा कभी एक धर्म के खिलाफ होती है, तो कभी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों, तो कभी लिबरल्स के खिलाफ. इस रिपोर्ट में समझेंगे कि..

  • नफरती भाषा के मेन स्ट्रीम सिनेमा में आने का पैटर्न क्या है?

  • कैसे सच्ची घटनाओं के नाम पर परोसा जा रहा है कॉन्सपिरेसी थ्योरी और फिक्शन का झोल.

  • कौन जिम्मेदार, किसका नुकसान ?

1. नफरती भाषा के मेन स्ट्रीम सिनेमा में आने का पैटर्न?

ये पैटर्न आज की पॉलिटिक्स में भले ही हमें पिछले एक दशक में ज्यादा दिख रहा हो. पर हर दौर में एक समुदाय के खिलाफ इसका इस्तेमाल होता रहा है. 1940 की नाजी फिल्म 'द इटरनल ज्यू' में यहूदियों की तुलना चूहों से कर उन्हें समाज के लिए 'परजीवी' (parasite) और खतरा बताया गया. प्रोपेगेंडा के तहत इस फिल्म में चूहों के दृश्यों का इस्तेमाल कर एक पूरी कौम के खिलाफ नफरत और उनका सफाया करने की मानसिकता को बढ़ावा दिया गया. यहूदियों को युद्ध भड़काने वाला भी बताया गया.

एक तरफ 1940 की फिल्म में यहूदियों के खिलाफ चलाए गए नफरती प्रोपेगैंडा का सबूत मिलता है. दूसरी तरफ 80 साल बाद 2015 में नेटफ्लिक्स पर शुरू हुई इजरायली वेब सीरीज FAUDA पर आरोप लगता है कि उसमें फिलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ एक खास नकारात्मक नैरेटिव बनाया जा रहा है.

यॉर्क यूनिवर्सिटी (कनाडा) में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद अली खालिदी अपने एक लेख में कहते हैं, Fauda एक ऐसी “समानांतर दुनिया” रचती है जिसमें फिलिस्तीनियों को ऐसे आतंकियों के रूप में दिखाया जाता है जो लगातार इजराइली बस्तियों पर हमले करते रहते हैं. खालिदी कहते हैं कि इस कहानी में दिखाया गया है कि कैसे इजराइली सैनिकों को बेबस होकर फिलिस्तीनी समाज में घुसपैठ करना पड़ती है, ताकि कथित “टिक-टिक करते बमों” को फटने से रोका जा सके. यह चित्रण उन लोगों के लिए वास्तविकता से बिल्कुल अलग है जो इजरायल के कब्जे वाले इलाकों की असल स्थिति को जानते हैं, लेकिन यह उन दर्शकों की राय को प्रभावत कर सकते हैं जिन्हें जमीनी हालातों के बारे में नहीं पता.

अब भारतीय सिनेमा, खासकर हिंदी सिनेमा के हालिया पैटर्न पर लौटते हैं. सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि कश्मीर फाइल्स से लेकर केरला स्टोरी 2 में इस्तेमाल की गई नफरती भाषा का इस्तेमाल कैसे धीरे-धीरे बढ़ा है.

केरला स्टोरी 2 : जैसा कि हमने शुरुआत में ही देखा, ट्रेलर को हिंदुओं के लिए एक चेतावनी की तरह दिखाया गया है. फिल्म के डायलॉग्स में शादी को खासकर ऐसे शादी को जिसमें दो अलग-अलग धर्म के लोग साथ आते हैं, उसे जाल बताया गया है. फिल्म में एक बहुत ही विवादास्पद सीन दिखाया गया जहां एक हिंदू महिला को जबरदस्ती 'बीफ' (गोमांस) खिलाया जाता है.

फिल्म के अंत में "अब सहेंगे नहीं, लड़ेंगे" जैसे नारे दिए गए हैं. कोर्ट में इस पर आपत्ति जताई गई कि यह शांतिपूर्ण चर्चा के बजाय लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ 'लड़ने' और कानून हाथ में लेने के लिए उकसाने वाली भाषा है.

फिल्म का वो सीन जहां दिखाया गया है कि हिंदू महिला को जबरन बीफ खिलाया जा रहा है

सोर्स : Sunshine Pictures

फिल्म के डायलॉग्स में यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों और बुद्धिजीवियों को ऐसा शख्स दिखाया गया है जो युवाओं के दिमाग में "भारत विरोधी ज़हर" भरते हैं. उन्हें शिक्षा के नाम पर 'ब्रेनवाश' करने वाला बताया गया है.

कश्मीर फाइल्स : फिल्म की कहानी में दिखाया गया कि 'हर पड़ोसी' धोखेबाज था. इस पर आपत्ति भी जताई गई की कुछ कट्टरपंथी लोगों की गलती के लिए पूरे समुदाय को गुनहगार बताना गलत है, क्योंकि इससे समाज में नफरत फैलती है.

फिल्म के आखिर में यूनिवर्सिटी वाला भाषण नफरत का रुख इतिहास से मोड़कर आज के पढ़े-लिखे लोगों और छात्रों की तरफ कर देता है. इस सीन के जरिए लिबरल लोगों को 'देशद्रोही' की तरह पेश किया गया, जिससे आम छात्रों को भी शक की नजर से देखा जाने लगा.

फिल्म में एक महिला को पति के खून से सने चावल खिलाने वाला डरावना सीन दिखाया गया. हालांकि बाद में पीड़ित परिवार ने कहा कि 'खून वाले चावल' जैसी बात कभी नहीं हुई थी। आरोप लगे कि विलेन को ज्यादा 'जानवर' दिखाने के लिए यह बात खुद से जोड़ी गई.

फिल्म की भाषा ऐसी थी कि इसे देखने के बाद कई सिनेमाघरों में लोगों ने दूसरे समुदाय के खिलाफ खुलेआम नारे लगाए और नफरत भरे भाषण दिए.

ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT

द साबरमती रिपोर्ट : 2024 में आई इस फिल्म ने भी कश्मीर फाइल्स के ट्रेंड को जारी रखा. 'द साबरमती रिपोर्ट' में नफरत का रुख सीधे समुदाय के बजाय 'अंग्रेजी मीडिया' और 'बुद्धिजीवियों' की ओर मोड़ा गया है. फिल्म की भाषा समाज को हिंदी बनाम अंग्रेजी के आधार पर बांटती है और पत्रकारिता को एक 'देशविरोधी साजिश' के रूप में पेश करती है.

फिल्म का वो सीन जहां हिंदी पत्रकार और अंग्रेजी पत्रकार के बीच का फर्क दिखाया गया है 

सोर्स : Balaji Motion Picture

पत्रकार राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त पर आरोप लगा था कि इन्होंने 2002 दंगों की लाइव रिपोर्टिंग के दौरान पीड़ितों और हमलावरों की धार्मिक पहचान बार-बार उजागर की, जिससे तनाव और बढ़ा. बरखा दत्त की आलोचना इसलिए भी हुई क्योंकि उन्होंने कुछ संवेदनशील जगहों का सीधा प्रसारण (Live Location) किया था, जिसे सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माना गया. पर यहां पहले से प्लान की गई साजिश जैसा कुछ सामने नहीं आया.

फिल्म पर सवाल इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि यहां सिर्फ अंग्रेजी पत्रकारों को निशाना बनाया गया है. जबकि सच्चाई कुछ और है.

2002 में सबसे ज्यादा आलोचना स्थानीय गुजराती मीडिया की हुई थी. प्रेस काउंसिल ने 'संदेश' अखबार को ऐसी झूठी खबरें छापने के लिए फटकार लगाई थी जिनमें कहा गया था कि "मुस्लिमों ने हिंदू महिलाओं का अपहरण किया"—जो बाद में पूरी तरह गलत पाई गईं.

2002 गुजरात दंगों के दौरान मीडिया की भूमिका को लेकर रिपोर्ट

सोर्स : स्क्रीनशॉट/CJP.ORG

Gnomon Wise नाम के रिसर्च प्लेटफॉर्म पर छपी एक शोध समीक्षा के मुताबिक, प्रोपेगैंडा में अक्सर ऐसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं जो किसी समूह की मानवीय पहचान को कमजोर कर देते हैं. ऐसा करने का मकसद लोगों के मन में उस समूह के प्रति घृणा और डर पैदा करना होता है. इस तरह की भाषा धीरे-धीरे लोगों को यह मानने पर मजबूर करती है कि वह समूह आम इंसानों की तरह नहीं, बल्कि खतरनाक है.
  • 'रजाकार: द साइलेंट जेनोसाइड ऑफ हैदराबाद' : यह फिल्म 1948 की ऐतिहासिक घटनाओं को वर्तमान के सांप्रदायिक नजरिए से पेश करती है. फिल्म का एक विवादित डायलॉग है—"हिंदुओं को या तो धर्म बदलना होगा या अपनी जान देनी होगी, क्योंकि यह धरती सिर्फ अल्लाह के बंदों की है."

  • JNU: जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी : इस फिल्म में एक यूनिवर्सिटी को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र दिखाया गया है/ फिल्म का एक प्रमुख डायलॉग है—"इस यूनिवर्सिटी में शिक्षा नहीं, देश के खिलाफ युद्ध की रणनीति सिखाई जाती है." यहां छात्रों और प्रोफेसरों को 'ब्रेनवॉश' करने वाले विलेन के रूप में पेश किया गया है.

  • 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर': फिल्म में सावरकर का एक डायलॉग है—"गांधी की अहिंसा ने भारत की मर्दानगी छीन ली." ऐसे संवादों के जरिए गांधीवादी सिद्धांतों को 'कमजोरी' और सावरकर की सशस्त्र विचारधारा को एकमात्र 'सच्ची देशभक्ति' के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई है. यहां भी वॉट्सऐप पर फॉरवर्ड किए जाने वाले दावों को मेन स्ट्रीम में लाने की कोशिश हुई. .

  • 'आखिर पलायन कब तक?': यह फिल्म मुस्लिम बहुल इलाकों से हिंदुओं के पलायन के मुद्दे पर आधारित है. फिल्म में एक किरदार कहता है—"वे हमारे घरों को नहीं, हमारी सभ्यता को कब्जा रहे हैं. आज घर छोड़ रहे हो, कल देश छोड़ना पड़ेगा." यहां 'वे' शब्द का इस्तेमाल एक पूरे समुदाय को 'आक्रमणकारी' (Invaders) साबित करने के लिए किया गया है, जो सीधे तौर पर सांप्रदायिक तनाव को उकसाता है.

2. सच्चाई बताकर परोसा जा रहा कॉन्सपिरेसी थ्योरी और फिक्शन का झोल.

जिन फिल्मों की हमने बात की, उनमें सच्ची घटना (True Story) के नाम पर नफरत और साजिशों (Conspiracy Theories) को परोसने का एक नया मॉडल भी सामने आया है. केरला स्टोरी (2023) और केरला स्टोरी 2 (2026) के उदाहरण से ही समझने की कोशिश करते हैं कि ये फिल्में कैसे काम करती हैं.

  • 'द केरल स्टोरी' (2023) ने 32,000 महिलाओं के लापता होने का झूठा दावा किया. इसी कड़ी में 'द केरल स्टोरी 2' (2026) ने "2047 तक भारत के इस्लामिक स्टेट बनने" जैसी भविष्यवाणियों को डायलॉग के जरिए 'आने वाले खतरे' की तरह पेश किया.

सोर्स : The Quint

कई इंवेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स में सामने आया कि 32000 हिंदू महिलाओं को शादी के नाम पर बहलाकर ISIS में भेजे जाने का दावा पूरी तरह निराधार है. ऐसा कोई डेटा वजूद में है ही नहीं.

केरला स्टोरी 2 फिल्म के समर्थन में जिन मामलों या कथित पीड़ितों को सामने लाया गया, उनमें से कई केरल के नहीं बल्कि झारखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल जैसे दूसरे राज्यों के थे, जबकि फिल्म की कहानी और टाइटल दोनों केरल पर केंद्रित हैं.

यानी भारत में शादी में धोखाधड़ी या दबाव डालकर धर्म परिवर्तन कराने के कुछ अलग-अलग मामले जरूर सामने आए हैं, लेकिन ऐसा कोई सार्वजनिक और पुख्ता सबूत नहीं है कि केरल में फिल्म में दिखाए गए तरीके का कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था. इसलिए आरोप लगे कि फिल्म देश के अलग-अलग राज्यों की असंबंधित घटनाओं को जोड़कर उन्हें केरल से जुड़ी एक ही कहानी की तरह पेश करती है, इसी वजह से इसके दावों की तथ्यात्मकता पर सवाल उठाए गए हैं.

फिल्म में बीफ खिलाए जाने को धर्म परिवर्तन के हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया, ये दिखाने की कोशिश की गई कि इससे हिंदुओं का धर्म भ्रष्ट किया जा रहा है. जबकि आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. केरल में धर्म के आधार पर खान - पान की आदतों को लेकर किया गया केंद्र सरकार का आखिरी सर्वे 2011-12 के डेटा के आधार पर है.

ये डेटा कहता है कि केरल में बीफ खाने वाले हिंदुओं की संख्या बाकी राज्यों से कहीं ज्यादा है. NSSO का ये सर्वे कहता है कि केरल में लगभग 15 लाख हिंदू समुदाय के लोग बीफ या भैंस का मांस खाते हैं.

MEDIAD जर्नल पर छपे द केरला स्टोरी फिल्म पर किए गए विश्लेषण के मुताबिक, फिल्म में सात प्रमुख तत्व सामने आते हैं—मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के साथ बलात्कार, ‘लव जिहाद’, मुसलमानों का भारत पर कब्जा करने की साजिश, हिंदू धर्म से इस्लाम में धर्मांतरण, इस्लाम और आतंकवाद को जोड़ना, इस्लाम में महिलाओं की गुलामी, और इस्लाम को पिछड़ा व असहिष्णु बताना. फिल्म में इन तत्वों को बार-बार दिखाया गया है. इन दृश्यों को डायलॉग और संगीत के जरिए और प्रभावी बनाने की कोशिश है. विश्लेषण के मुताबिक, फिल्म में इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक नफरत भरी भाषा के तत्व साफ दिखाई देते हैं.

हाल की अन्य प्रोपेगैंडा फिल्म में भी हमें ऐसी ही कॉन्सपिरेसी थ्योरी को सच की तरह पेश करने के कई उदाहरण मिलते हैं. जैसे कि साबरमती रिपोर्ट.

द इंडियन एक्सप्रेस की फिल्म समीक्षक Shubhra Gupta ने 15 नवंबर 2024 को छपे इस लेख में The Sabarmati Report के एक दृश्य पर टिप्पणी करते हुए लिखा.

फिल्म में विक्रांत मैसी ‘हिंदी रिपोर्टर’ समर कुमार के किरदार में हैं, जो अपनी ‘अंग्रेजी बोलने वाली’ सहयोगी मणिका राजपुरोहित (रिद्धि डोगरा) के साथ गोधरा के ‘ग्राउंड ज़ीरो’ पर पहुंचते हैं. बिना किसी स्पष्ट जांच के, दोनों तुरंत इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि यह हादसा नहीं था—“आग लगी नहीं, लगवाई गई थी.” यह कभी साफ नहीं किया जाता कि वे इस निष्कर्ष तक कैसे पहुंचे, लेकिन इसके बाद फिल्म आगे बढ़ती रहती है—जहां समर कुमार अपने रुख पर कायम रहता है, जबकि मणिका राजपुरोहित राजनीतिक दबाव के कारण अपना रुख बदल देती है.

3. कौन जिम्मेदार, किसका नुकसान ?

  • नसीरउद्दीन शाह, प्रकाश राज जैसे कई चर्चित कलाकारों ने ये आरोप लगाए हैं कि बॉलीवुड का एक बड़ा हिस्सा अब 'सत्ता का मोहरा' बन गया है. ये फिल्में इतिहास की पेचीदगियों को दिखाने के बजाय उसे 'हीरो और विलेन' के खांचे में बांट रही हैं. अक्सर मुगलों या मुस्लिमों को क्रूर और हिंदुओं को बहादुर दिखाकर समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (Communalism) को बढ़ावा दिया जा रहा है.

  • फिल्म सेंसर बोर्ड (CBFC) पर लगातार पक्षपात के आरोप लग रहे हैं. एक तरफ 'भीड़' जैसी फिल्में, जो सरकारी खामियों या सिस्टम पर सवाल उठाती हैं, उन्हें भारी कट्स या बैन का सामना करना पड़ता है. वहीं दूसरी ओर, उग्र बहुसंख्यकवादी नैरेटिव वाली फिल्मों को बिना किसी रोक-टोक के हरी झंडी दे दी जाती है और सरकार खुद उनका प्रचार करती है.

  • फिल्म निर्माताओं के लिए विवाद अब 'फ्री मार्केटिंग' का जरिया बन गया है. ट्रेलर में भड़काऊ दावे किए जाते हैं (भले ही बाद में फिल्म से उन्हें हटा दिया जाए), ताकि हफ्तों तक टीवी और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी रहे. इस शोर-शराबे का सीधा फायदा फिल्म को मिलता है और 'ओपनिंग डे' पर बंपर कमाई होती है.

  • मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में इन फिल्मों को तुरंत 'टैक्स-फ्री' कर दिया जाता है. सरकार के इस आर्थिक सपोर्ट की वजह से ये फिल्में बड़े बजट की ग्लोबल फिल्मों को टक्कर दे पाती हैं. नतीजा यह है कि आज 'प्रोपेगेंडा' फिल्म बनाना एक मुनाफे वाला बिजनेस मॉडल बन चुका है.

Published: undefined

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT