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दिसंबर 2023 में लोकसभा में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं देखा गया था.
स्पीकर ओम बिरला ने लोकसभा के नियम 374A के तहत ये कार्रवाई की थी. भारत के संसदीय इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा 'सामूहिक निलंबन' था.
साल 2001 में लागू हुए इस नियम के मुताबिक, अगर कोई सांसद सदन की कार्यवाही में 'भारी बाधा' डालता है (जैसे वेल में आना, नारेबाजी करना या काम रोकना), तो स्पीकर उन्हें सीधे सस्पेंड कर सकते हैं. इसके तहत सांसद को लगातार 5 बैठकों या पूरे सत्र के बचे हुए समय के लिए बाहर किया जा सकता है. खास बात ये है कि इसके लिए सदन में कोई प्रस्ताव लाने की जरूरत नहीं होती, स्पीकर खुद फैसला ले सकते हैं.
लेकिन 2023 की ये घटना कोई इकलौती मिसाल नहीं थी. 'द क्विंट' की पड़ताल में 2004 से 2026 के बीच हुए लोकसभा निलंबनों के आंकड़ों को खंगाला गया, जिसमें एक चौंकाने वाला पैटर्न दिखा:
पिछले दो दशकों में सांसदों के निलंबन की घटनाओं में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है.
ओम बिरला के स्पीकर रहते हुए निलंबन के आंकड़े अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं.
इस इन्वेस्टिगेशन में सिर्फ लोकसभा के आंकड़ों पर ध्यान दिया गया है. राज्यसभा की कार्यवाही इसमें शामिल नहीं है क्योंकि वहां निलंबन के नियम और प्रक्रियाएं अलग होती हैं.
हमारी पड़ताल में सामने आया कि साल 2004 से 2026 के बीच, लोकसभा में कुल 245 निलंबन दर्ज किए गए. लेकिन जब हम अलग-अलग स्पीकर्स के कार्यकाल पर नजर डालते हैं, तो तस्वीर काफी हैरान करने वाली है:
सोमनाथ चटर्जी (2004-2009): CPI-M नेता सोमनाथ चटर्जी के दौर में सिर्फ 5 निलंबन हुए थे.
ओम बिरला (2019-2024): इनके कार्यकाल में यह आंकड़ा सीधे 112 पर पहुंच गया. यानी करीब 2000 प्रतिशत से भी ज्यादा की बढ़ोतरी!
अगर बाकी स्पीकर्स की बात करें तो:
मीरा कुमार (2009-2014): इनके समय 45 सांसदों को सस्पेंड किया गया.
सुमित्रा महाजन (2014-2019): इनके कार्यकाल में 73 निलंबन दर्ज हुए.
(नोट: इस पड़ताल में सिर्फ लोकसभा से उन निलंबनों को शामिल किया गया है, जो स्पीकर ने संसदीय नियमों के तहत किए हैं. इसमें निष्कासन (Expulsions) शामिल नहीं हैं, जैसे कि 2005 का 'कैश-फॉर-क्वेरी' (सवाल के बदले पैसे) घोटाला. उस मामले में संसदीय समिति की सिफारिश और सदन में वोटिंग के बाद सांसदों को संसद से हटा दिया गया था.
निष्कासन (Expulsion): यह एक अलग और बहुत सख्त कार्रवाई है, जिसमें सांसद की सदस्यता स्थायी रूप से खत्म कर दी जाती है.
निलंबन (Suspension): इसमें सांसद को सिर्फ एक तय समय के लिए सदन की कार्यवाही में शामिल होने से रोका जाता है.
2000 के दशक के मध्य में सांसदों को सस्पेंड करना एक दुर्लभ घटना थी और ज्यादातर ऐसी कार्रवाई 'नैतिक दुर्व्यवहार' (ethical misconduct) के मामलों में ही होती थी. सीपीआई (एम) नेता और पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के 5 साल के कार्यकाल में सिर्फ 5 सांसद सस्पेंड किए गए थे.
इनमें से 4 निलंबन 2006 में हुए थे, जब 'सांसद निधि' (MPLADS) के इस्तेमाल में गड़बड़ी की जांच हुई थी.
एक अन्य सांसद को 2007 में एक आधिकारिक संसदीय दौरे के दौरान गलत व्यवहार के लिए सस्पेंड किया गया था.
कांग्रेस की मीरा कुमार के कार्यकाल (2012-2014) के दौरान, आंध्र प्रदेश के बंटवारे और तेलंगाना के गठन को लेकर सदन में बार-बार हंगामा हुआ. उस क्षेत्र के सांसद राज्य के बंटवारे के विरोध में बार-बार सदन के वेल में आ जाते थे.
जवाब में स्पीकर ने कई बार निलंबन की कार्रवाई की.
बीजेपी की सुमित्रा महाजन (2014-2019) के कार्यकाल में निलंबन की घटनाओं में और तेजी आई. मुख्य रूप से दो बड़ी घटनाओं की वजह से ये आंकड़े बढ़े:
अगस्त 2015: ललित मोदी विवाद पर विरोध प्रदर्शन के दौरान सुमित्रा महाजन ने कांग्रेस के 25 सांसदों को एक साथ सस्पेंड कर दिया था.
जनवरी 2019: आंध्र प्रदेश के लिए 'विशेष राज्य के दर्जे' की मांग कर रहे AIADMK और TDP के सांसदों के विरोध के कारण निलंबन की एक और लहर आई.
सुमित्रा महाजन का कार्यकाल खत्म होते-होते कुल 73 निलंबन रिकॉर्ड किए गए.
सांसदों के निलंबन की घटनाओं में सबसे तेज बढ़ोतरी 2019 के बाद देखने को मिली.
स्पीकर के तौर पर ओम बिरला के पहले कार्यकाल (2019-2024) के दौरान, लोकसभा से 112 सांसदों को सस्पेंड किया गया. पिछले दो दशकों में किसी भी स्पीकर के कार्यकाल में दर्ज किया गया यह सबसे बड़ा आंकड़ा है.
निलंबन के इन आंकड़ों में सबसे बड़ी भूमिका 2023 के 'विंटर सेशन' की रही, जब संसद की सुरक्षा में सेंध लगने के विरोध में एक ही हफ्ते के भीतर 100 सांसदों को सस्पेंड कर दिया गया.
हैरानी की बात यह है कि साल 2004 से अब तक लोकसभा में जितने भी निलंबन हुए हैं, उनमें से 40 प्रतिशत से ज्यादा सिर्फ इसी एक घटना के दौरान हुए.
2024 में बिरला दोबारा स्पीकर बने और उनके दूसरे कार्यकाल में 2026 के बजट सत्र के दौरान अब तक आठ सांसदों को निलंबित किया जा चुका है.
(नोट: जहां भी संभव हुआ है, इस डेटा के लिए लोकसभा की आधिकारिक कार्यवाही और संसदीय बुलेटिन का सहारा लिया गया है. पुराने सालों के लिए, जहां रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं थे, वहां पुख्ता जानकारी के लिए बड़े राष्ट्रीय समाचार माध्यमों की रिपोर्ट्स का इस्तेमाल किया गया है.)
पार्टी के हिसाब से अगर आंकड़ों को देखें, तो यह संसद के अंदर बदलती राजनीति की कहानी भी कहता है:
मीरा कुमार के दौर में: सस्पेंड होने वालों में सबसे ज़्यादा संख्या कांग्रेस सांसदों की ही थी. इसकी बड़ी वजह तेलंगाना मुद्दे को लेकर पार्टी के भीतर चल रहा विरोध प्रदर्शन था.
सुमित्रा महाजन के दौर में: निलंबन का सबसे बड़ा हिस्सा AIADMK के सांसदों का रहा, जिसके बाद कांग्रेस और TDP के सांसदों का नंबर आता है.
लोकसभा में होने वाले ज्यादातर निलंबन नियम 374A के तहत होते हैं, जिसे साल 2001 में लाया गया था. यह नियम स्पीकर को यह ताकत देता है कि वे उन सांसदों को सीधे सस्पेंड कर सकें जो सदन के बीचों-बीच (वेल में) आते हैं या कार्यवाही में बाधा डालते हैं.
शुरुआत में इस नियम को इसलिए बनाया गया था ताकि सदन में अनुशासन बना रहे, लेकिन अब इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर निलंबन के लिए होने लगा है, जहां एक साथ दर्जनों सांसदों पर गाज गिरती है.
पहले के स्पीकर्स आमतौर पर किसी एक सांसद या छोटे समूहों को सस्पेंड करते थे, लेकिन हाल के सालों में ऐसा अक्सर देखा गया है कि पूरे के पूरे विपक्षी गुट को एक साथ सदन से बाहर कर दिया जाता है.
निलंबन के बढ़ते आंकड़े संसदीय राजनीति में आए एक बड़े बदलाव को दिखाते हैं.
आजकल विपक्षी दल विवादित मुद्दों पर चर्चा करवाने के लिए सदन के भीतर विरोध-प्रदर्शन का सहारा ज्यादा लेने लगे हैं. वहीं दूसरी तरफ, सरकार विरोध के बीच भी विधेयकों को पारित कराने के लिए पहले से अधिक दृढ़ दिखाई दे रही है.
इस खींचतान भरे माहौल में, स्पीकर की 'अनुशासनात्मक शक्तियां' (disciplinary powers) संसद में टकराव को संभालने का मुख्य औजार बन गई हैं.
और स्पीकर ओम बिरला के कार्यकाल में निलंबन का यह पैमाना उस स्तर पर पहुंच गया है जो पहले कभी नहीं देखा गया.
(ट्रांसलेशन: नौशाद मलूक)