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संडे व्यू: बेमकसद अनैतिक युद्ध, संसद में महिला आरक्षण का लंबा इंतजार

पढ़ें प्रताप भानु मेहता, ललिता पनिक्कर, जीएन देवी, आरात्रिका भौमिक, जग सुरैया और प्रभु चावला के विचारों का सार

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पढ़ें इस रविवार प्रताप भानु मेहता, ललिता पनिक्कर, जीएन देवी, आरात्रिका भौमिक, जग सुरैया और प्रभु चावला के विचारों का सार

(फोटोः फाइल) 

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बेमकसद अनैतिक युद्ध

प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि एक बेमकसद युद्ध लड़ा जा रहा है. हम सभी ने नैतिक बचाव की नई रणनीतियाँ गढ़ ली हैं. इज़राइल-अमेरिका-ईरान युद्ध वैश्विक नैतिक शून्यता का प्रतीक है. युद्ध की असली भयावहता खुद युद्ध नहीं, बल्कि उसका सामान्यीकरण है, जहां हिंसा प्रदर्शन बन गई है. अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ के बयान से शुरू होकर, लेखक कहते हैं कि यह युद्ध विजय या मुक्ति का नहीं, बल्कि क्रोध को बनाए रखने और तकनीक (मिसाइल, एआई, साइबर) परीक्षण का माध्यम है. कोई सुसंगत उद्देश्य नहीं—परमाणु निरस्त्रीकरण, शासन परिवर्तन या विखंडन—सिर्फ निहिलवादी शक्ति का थिएटर लगता है.

मेहता लिखते हैं कि ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ता है, जैसे राष्ट्राध्यक्षों की हत्या या जहाजों को डुबोना. और, जवाब देता है: "ईमानदारी से कहूं तो, मुझे परवाह नहीं." अमेरिका का अतिरेकी निहिलवाद ईरान के निराशा के निहिलवाद से टकराया है. ईरान का इतिहास जटिल—अमेरिकी ध्यान से कमजोर हुआ, प्रॉक्सी और परमाणु कार्यक्रम विकसित किया, लेकिन अंततः ब्लफ साबित हुआ.

हमास हमले के बाद ईरान की रक्षा क्षमता कमजोर दिखी, जो इसे आसान लक्ष्य बनाती है. ईरान अब निराशा में जवाब दे रहा है, संघर्ष को बढ़ाकर दुनिया को खींचते हुए. दुनिया के नेता नैतिक रूप से लकवाग्रस्त हैं. कीर स्टार्मर, इमैनुएल मैक्रों, मोहम्मद बिन सलमान जैसे नेता भ्रमित हैं. मोदी की चुप्पी अमेरिकी मांगों के सामने समर्पण दिखाती है. चीन लकवाग्रस्त है, अंतरराष्ट्रीय गठबंधन नहीं बना सकता. डेमोक्रेट्स में प्रतिरोध है, लेकिन प्रक्रियागत. सभी ने नैतिक बचाव की रणनीतियां अपनाईं: "मुझे परवाह नहीं. महाशक्तियों के निहिलवाद के बावजूद, बाकी दुनिया हिंसा की राजनीति को अस्वीकार कर सकती है. बेमकसद युद्ध को वैध न मानकर, राज्य नैतिकता की रक्षा करें, अन्यथा सभ्यता का अंत होगा.

युद्ध में ईरानी महिलाओं का दर्द

ललिता पनिक्कर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि युद्ध से ईरान की महिलाओं को कहीं अधिक दर्द के दौर से गुजरना पड़ रहा है. युद्ध चाहे कितना भी वैध या आवश्यक क्यों न माना जाए, यह महिलाओं के लिए पहले से मौजूद दमन और पीड़ा को और गहरा करेगा. आयतोल्लाह खामेनेई की मृत्यु को 'सुप्रीम अप्रेसर' के अंत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन महिलाएँ आंसू नहीं बहा रही हैं. उनकी चिंता है कि उत्तराधिकारी पुराने शासन से अलग नहीं होंगे. अमेरिका 'स्थिरता' को प्राथमिकता दे सकता है, न कि वास्तविक बदलाव को. यदि युद्ध से शासन परिवर्तन होता भी है, तो महिलाओं के अधिकार अमेरिका या इज़राइल की प्राथमिकताओं में शीर्ष पर नहीं होंगे.

पनिक्कर लिखती हैं कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरानी महिलाओं पर लगातार दमन हुआ है: बुर्का अनिवार्य, पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना विदेश यात्रा प्रतिबंधित, अदालत में एक पुरुष की गवाही दो महिलाओं के बराबर, शादी की न्यूनतम उम्र 13 वर्ष (पहले 9), नैतिक पुलिस द्वारा हिंसा, विरासत में असमानता आदि. हाल के विरोध प्रदर्शनों में महिलाएँ मारी गईं, घायल हुईं और जेल में डाली गईं.

डिजिटल ब्लैकआउट ने ऑनलाइन नौकरियों से वंचित कर दिया, जो पहले से ही लिंग भेदभाव के कारण सीमित थीं. राज्य विरोध को इस्लाम-विरोधी बताकर दमन को औचित्य देता है, जबकि महिलाएँ केवल अधिकार मांगती हैं. यूएन विमेन ने चेतावनी दी है कि विस्तारित संघर्ष महिलाओं को हिंसा, सेवाओं की कमी और खतरे में डालता है.लेखक अफगानिस्तान का उदाहरण देते हुए सतर्क आशावाद की बात करती हैं, जहाँ 2021 में तालिबान के वापस आने से महिलाओं की आजादी रातोंरात खत्म हो गई. ईरान में भी महिलाओं के लिए बेहतर भविष्य की संभावना कम है, जब तक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में गहरा बदलाव न आए.

संसद में महिला आरक्षण का लंबा इंतजार

जीएन देवी ने टेलीग्राफ में अपने लेख ‘एक लंबा इंतज़ार’ को भारतीय राजनीति में महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर केंद्रित किया है. यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के संदर्भ से शुरू होता है, जो 1975 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित किया गया था, लेकिन इसकी जड़ें 1922 की रूसी क्रांति में हैं. लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं, जैसे उनकी शादी का दिन और मित्र महाश्वेता देवी की महिला अधिकार संघर्ष की यादें.

मुख्य फोकस महिला आरक्षण विधेयक पर है, जो 1997 से कई बार पेश हुआ (1996, 1998, 1999, 2008, 2010) लेकिन पास नहीं हुआ. 2023 में 106वें संवैधानिक संशोधन के रूप में पास हुआ, लेकिन यह नई जनगणना और परिसीमन के बाद प्रभावी होगा. लेखक इसका कारण बताते हैं कि पुरुष सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र छोड़ने को तैयार नहीं हैं.

लेखिका आगे लिखती हैं कि वर्तमान में लोकसभा में मात्र 15% महिलाएँ हैं, जबकि आबादी में 48.5%. यदि तुरंत लागू होता, तो 180 महिला सांसद होतीं.एनडीए सरकार और आरएसएस की आलोचना की गई है, जिनकी वैचारिकता पितृसत्ता को बढ़ावा देती है और महिलाओं को सीमित भूमिका में देखती है. जनगणना 2021 में होनी थी लेकिन कोविड और राजनीतिक कारणों से टली. अब 2027 तक आंकड़े आने वाले हैं, जिसके बाद परिसीमन होगा. इससे सीटें बढ़ सकती हैं (543 से 700 तक), लेकिन डेटा हेरफेर या अल्पसंख्यक हाशिएकरण का जोखिम है.लेखक महिलाओं से अपील करते हैं कि वे एकजुट हों और जनगणना-परिसीमन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएँ. नागरिक समाज, बुद्धिजीवी और मीडिया को समर्थन देने की ज़रूरत है. भारत के इतिहास में महिलाओं के उत्पीड़न को याद करते हुए, वे समानता की उम्मीद जताते हैं. यह लेख महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानता है, लेकिन देरी और जोखिमों की चेतावनी देता है.

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नफरती भाषण पर सुप्रीम कोर्ट कर क्या रहा है?

आरात्रिका भौमिक ने द हिन्दू में सवालिया अंदाज में लिखा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट नफरत भरे भाषण से निपटने के लिए पर्याप्त कर रहा है? अधिवक्ता शाहरुख आलम और राज्यसभा सांसद हैरिस बीरन के बीच बहस के संपादित अंश प्रस्तुत करते हुए आरात्रिका भौमिक ने अपनी बात लिखी है. बहस हालिया घटनाओं से शुरू होती है, जैसे गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को नोटिस जारी करना, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐसे मामलों को हाई कोर्ट भेजना.

नफरत भरे भाषण की परिभाषा पर चर्चा में शाहरूख आलम कहते हैं कि यह पूर्वाग्रही विमर्श है जो कमजोर समुदायों को हाशिए पर धकेलता है, और इसका विश्लेषण शक्ति के संदर्भ में होना चाहिए. हैरिस बीरन जोड़ते हैं कि यह अक्सर 'डॉग व्हिसल' के रूप में आता है, जो अस्पष्टता के कारण आपराधिक बनाने को कठिन बनाता है. दोनों सहमत हैं कि इसे संवैधानिक अपकृत्य मानना चाहिए, जहां राज्य की निष्क्रियता मुआवजा और जवाबदेही का आधार बने.

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर, बीरन 2018 के तहसीन पूनावाला मामले और 2023 के निर्देशों का उल्लेख करते हैं, लेकिन गैर-अनुपालन पर अवमानना कार्यवाही की कमी की आलोचना करते हैं. आलम कहते हैं कि अदालत ने लंबित मामलों को बंद कर अनुपालन की निगरानी छोड़ दी, जो संवैधानिक कर्तव्य का त्याग है. नए कानून पर, दोनों सावधानी बरतते हैं: मौजूदा प्रावधानों का प्रवर्तन जरूरी है, और नए प्रावधान मनमानी का जोखिम बढ़ा सकते हैं. कर्नाटक के 2025 बिल को अच्छा इरादा माना गया, लेकिन इसकी परिभाषाएं व्यापक हैं, जो भेदभाव के आयाम को पर्याप्त नहीं संबोधित करतीं. कुल मिलाकर, लेख नफरत भरे भाषण की बढ़ती समस्या को राजनीतिक माहौल, संस्थागत विफलता और कानूनी हस्तक्षेप की कमी से जोड़ता है, अदालतों से अधिक सक्रिय भूमिका की मांग करता है.

नंगे होकर विरोध की हिम्मत

द टाइम्स ऑफ इंडिया में जग सुरैया ने व्यंग्यात्मक शैली में राजनीतिक प्रदर्शनों में नग्नता या अर्ध-नग्नता के उपयोग पर चर्चा की है. दिल्ली में हालिया एआई समिट से बात शुरू होती है जहां युवा कांग्रेस के सदस्यों ने इंडो-यूएस व्यापार प्रस्ताव और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विरोध जताने के लिए गेट-क्रैश किया और अपनी कमीजें उतारकर अर्ध-नग्न हो गए. यह 'नंगे होकर हिम्मत दिखाने' का प्रतीक था, जो उनकी नीतियों से 'गर्म' होने का संकेत देता था.

सुरैया इसकी ‘नंगे होकर हिम्मत दिखाने’ की तुलना महात्मा गांधी से करते हैं, जिन्होंने ब्रिटिश कपड़ों का बहिष्कार कर चरखा आंदोलन चलाया, जो स्वतंत्रता का प्रतीक बना. हालांकि, सरकारी पक्ष ने इसे अशोभनीय बताया, खासकर विदेशी मेहमानों के सामने, जो राष्ट्रीय सम्मान को कलंकित करता है. व्यंग्य में जुआ या घुड़दौड़ में 'शर्ट गंवाने' की बात की गई है, लेकिन राजनीति में यह पॉइंट्स कमा सकता है.

ऐतिहासिक उदाहरणों में अर्जेंटीना के जुआन पेरोन को 'डेस्कामिसाडोस' (शर्टलेस मजदूरों) का समर्थन मिला, जो गरीब वर्ग के प्रतिनिधि थे. फ्रांसीसी क्रांति के 'सांस-कुलॉट्स' भी कुलीन कपड़ों के बजाय साधारण पैंट पहनकर विरोध जताते थे. लेखक माओरी लोगों की 'मूनिंग' परिष्कृति का जिक्र करते हैं, जहां पिछवाड़ा दिखाकर विरोध किया जाता है, जो 'बम डील' का प्रतीक है. सौभाग्य से, समिट प्रदर्शनकारी इससे अनजान थे. कुल मिलाकर, लेख प्रदर्शनों की साहसिकता और हास्यास्पदता पर प्रकाश डालता है, जो इतिहास से जुड़कर वर्तमान राजनीति की आलोचना करता है.

संघवाद का नाजुक संतुलन बनाए रखना जरूरी

प्रभु चावला ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में राज्यपालों की भूमिका और केंद्र सरकार की राजनीतिक रणनीति पर केंद्रित लेख लिखा है. इसमें हाल के राज्यपालों के फेरबदल को केंद्र की राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का माध्यम बताया गया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा सात प्रमुख पदों पर नए चेहरे नियुक्त किए गए, जैसे आर एन रवि का तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल स्थानांतरण, जो ममता बनर्जी के क्षेत्र में निगरानी बढ़ाने का संकेत है. सैयद अता हसनैन बिहार, नंद किशोर यादव नागालैंड, और अन्य बदलाव पूर्वोत्तर व विपक्षी राज्यों में भाजपा की मजबूती दर्शाते हैं.

लेख भारतीय संघवाद की चर्चा करता है, जहां राज्यपाल को संवैधानिक प्रहरी माना जाता है, लेकिन वे राजनीति से मुक्त नहीं रह पाते. मोदी सरकार ने परंपरा बदल दी है—राजनीतिक दिग्गजों के बजाय सेवानिवृत्त सिविल सेवक, सैन्य अधिकारी और अकादमिकों को चुना जा रहा है, जो वैचारिक रूप से अनुकूल हैं. 2014 से 50+ नियुक्तियों में 40% संघ पृष्ठभूमि वाले, 30% सिविल सेवा से, 15% रक्षा से हैं. यह प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता देता है.

विपक्षी राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल में राज्यपालों और राज्य सरकारों के टकराव बढ़े हैं, जहां राज्यपाल विधेयकों को रोकते या राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करते हैं. लेख चेतावनी देता है कि केंद्र की सत्ता संयम और विश्वास पर टिकी है, न कि केवल अधिकार पर. फेरबदल पद की गरिमा को कमजोर करते हैं, और संघवाद का नाजुक संतुलन विवेक से बनाए रखना जरूरी है. यह परिवर्तन राजनीतिक केंद्रीकरण या आधुनिकीकरण है, बहस जारी है, लेकिन भारत की विविधता में सत्ता का दुरुपयोग खतरनाक साबित हो सकता है.

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