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संडे व्यू : मृत्यु के तरीके चुनने की आजादी, मुफ्तखोरी राष्ट्र नहीं बनाती

पढ़ें इस रविवार प्रताप भानु मेहता, दुव्वुरी सुब्बाराव, गोपालकृष्ण, एम.ए बेबी और रामचंद्र गुहा के विचारों का सार

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नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>संडे व्यू : मृत्यु के तरीके चुनने की आजादी, मुफ्तखोरी राष्ट्र नहीं बनाती</p></div>
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संडे व्यू : मृत्यु के तरीके चुनने की आजादी, मुफ्तखोरी राष्ट्र नहीं बनाती

(Photo: iStock)

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खुद मौत की तारीख चुनना, मौत को गले लगाना

प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने इस लेख में एक गहरे निजी और दार्शनिक दर्द की अभिव्यक्ति की है. कुछ महीने पहले उनके मित्र, भारत में कनाडा के पूर्व हाई कमिश्नर डेविड मैलोन ने दोस्तों को मेल लिखा कि वह नवंबर के पहले हफ्ते में कनाडा के MAiD (Medical Assistance in Dying) कार्यक्रम के तहत स्वेच्छा से जीवन समाप्त कर रहे हैं. अक्टूबर 2024 में दिल्ली में आखिरी मुलाकात में डेविड ने बताया था कि उन्हें बहुत शुरुआती अल्जाइमर है और वे धीरे-धीरे अपने अस्तित्व के लुप्त होने के बजाय एक सुनियोजित, गरिमापूर्ण अंत चुन रहे हैं. उनके शब्द थे: “यह वास्तव में मृत्यु के दो अलग-अलग तरीकों में से एक का चुनाव है.”

मेहता डेविड की अद्भुत स्पष्टता और शांति से अभिभूत हैं. डेविड ने बताया कि कमरे में दो चिकित्सक, एक नर्स और उनके बच्चे होंगे; मोजार्ट की हल्की धुन बजेगी, अच्छी रेड वाइन की आखिरी चुस्की होगी, फिर दर्दरहित नींद. वे इसे कनाडा की उस व्यवस्था के प्रति कृतज्ञता मानते थे जो व्यक्ति को अपनी अंतिम कहानी का लेखक बनने देती है.

लेखक स्वीकार करते हैं कि डेविड का निर्णय प्राचीनतम प्रश्नों को फिर से खोल देता है: क्या स्वायत्तता मनुष्य का अंतिम किला है? या मृत्यु भी ईश्वर, प्रकृति या समाज के सामने समर्पण मांगती है? भारत में हम इसे अब भी घोर अनैतिक मानते हैं, जबकि कनाडा में दस साल में पचास हजार से अधिक लोग यह रास्ता चुन चुके हैं. फिर भी मेहता के मन में एक हल्की-सी ब disquiet बनी रहती है: क्या स्मृति और चेतना के खोने का डर इतना भयावह है कि उसे इतनी सर्जिकल निश्चितता से पहले ही खत्म कर देना चाहिए? क्या डिमेंशिया में भी प्रेम, हास्य और पहचान के क्षण शेष नहीं रहते? क्या हमारी संस्कृति निर्भरता को इतनी बड़ी शर्म मानने लगी है कि “निकास” अब कर्तव्य जैसा लगने लगा है?

आखिरकार लेखक डेविड से बहस नहीं कर पाते. 7 नवंबर को डेविड ठीक उसी समय चले गए जैसे उन्होंने तय किया था. उनकी अंतिम मेल थी: “मित्रता के सौभाग्य के लिए धन्यवाद. आगे बढ़िए.” डेविड ने हमें एक असुविधाजनक, लेकिन अमिट उपहार दिया है: एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण जिसने अपनी मृत्यु को भी विदाई की यात्रा की तरह जिया. अब हम जीवित लोग यह सवाल लेकर जीएंगे कि गरिमा के नाम पर यह चुनाव मानवता को विस्तार देता है या उसकी सीमा को संकरा करता है.

मुफ्तखोरी चुनाव जीत सकती है, राष्ट्र नहीं बनाती

दुव्वुरी सुब्बाराव टाइम्स ऑफ इंडिया मे लिखते हैं कि हमें एक राष्ट्रीय संहिता चाहिए जो इस तरह की उदारता पर खर्च की सीमा तय करे और सभी दलों को बाध्य करे कि वे बताएं – पैसा कहां से आएगा. हालिया बिहार चुनाव इसके अलावा और कुछ था भी नहीं – प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद का मास्टरक्लास. सत्ताधारी एनडीए ने चुनाव प्रचार के बीच ही करीब 1.2 करोड़ महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये डाल दिए. महागठबंधन ने तुरंत दांव बढ़ाया – हर महिला को 30,000 रुपये और हर परिवार को एक सरकारी नौकरी. जवाब में एनडीए ने मुफ्त बिजली, सब्सिडी वाला गैस सिलेंडर और जाति जनगणना का लॉलीपॉप बढ़ाया ताकि और लक्षित मुफ्तखोरी का रास्ता खुले. नतीजा: एक पागल दौड़ जो नीचे की ओर ही जा रही थी.

सुब्बाराव लिखते हैं कि यह बीमारी बिहार तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र की लाडली बहन योजना, आंध्र की अम्मा वोडी, तेलंगाना की दलित बंदू, दिल्ली की मुफ्त बिजली-पानी – हर राज्य में यही कहानी है. अल्पकाल में ये योजनाएं वोट लाती हैं. बिहार में महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में वोट डाला और एनडीए की झोली भर दी. लेकिन लंबे में ये राजकोष को खोखला कर रही हैं. बिहार का कर्ज-जीडीपी अनुपात पहले ही 40% के पार है; इन वादों के बाद एक साल में 50% तक पहुंच सकता है. पूरे देश में राज्यों का ऑफ-बजट कर्ज इस नाम पर 8 लाख करोड़ के पार जा चुका है.

गरीबी और असमानता के बीच मुफ्तखोरी का लालच समझ में आता है. लेकिन ये पूंजीगत व्यय को खा जाती हैं. पंजाब में किसानों को मुफ्त बिजली देने की होड़ ने भूजल खत्म कर दिया और खजाना खाली. तमिलनाडु में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा अच्छी है, लेकिन उस पैसे से नई मेट्रो लाइन या बेहतर स्कूल बन सकते थे. हर रुपये की मुफ्तखोरी का अवसर लागत होता है – वह रुपया युवाओं को स्किल देने या जलवायु-सहिष्णु खेती में नहीं लग पाता.

लेखक का मानना है कि सबसे बड़ा नुकसान राजनीतिक महत्वाकांक्षा का दिवालियापन है. नेतृत्व अब विजन नहीं, वाउचर बांट रहा है. जनता भी अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक हित गिरवी रख रही है. समाधान एक राष्ट्रीय राजकोषीय संहिता है-

  • मुफ्तखोरी पर खर्च राज्य जीडीपी का अधिकतम 2% तक सीमित हो.

  • हर वादे के साथ फंडिंग सोर्स घोषित करना अनिवार्य हो.

  • चुनाव आयोग हर बड़े वादे का राजकोषीय प्रभाव मूल्यांकन करवाए.

  • चिली की तरह स्ट्रक्चरल बैलेंस नियम अपनाया जाए.

भारत सात दशकों में शून्य से दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था बना. अगर हम मुफ्तखोरी की होड़ में डूब गए तो यह विरासत चौपट हो जाएगी. चुनावी मुफ्तखोरी आईओयू है, राष्ट्र निर्माण आशा है. हमारे नेताओं को याद रखना चाहिए कि जनता को वाउचर नहीं, भविष्य चाहिए.

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बारीकियों का राजनयिक: राघवन को एक मित्र की अंतिम सलामी

गोपाल कृष्ण गांधी ने हिन्दुस्तान टाइम्स में अपने सबसे प्रिय मित्र और असाधारण राजनयिक पी.एस. राघवन को मार्मिक श्रद्धांजलि दी है. 1992 में लंदन के इंडिया हाउस में पहली मुलाकात से शुरू हुई यह दोस्ती चार दशक तक चली. तमिल में हास्य-व्यंग्य से भरी बातें, सेंट स्टीफंस की साझा स्मृतियाँ, और बौद्धिक गहराई ने इसे जीवनभर का बंधन बनाया. लंदन के बाद प्रिटोरिया में राघवन गुहा के डिप्टी बने, फिर राष्ट्रपति भवन जाने के दुविधा-क्षण में उन्होंने ही समझाया कि भारत के राष्ट्रपति के लिए काम करना सर्वोच्च सम्मान है. बाद में वाजपेयी सरकार में ब्रजेश मिश्र के साथ मिलकर उन्होंने 2003 की नाभिकीय नीति की नींव रखी – “पहले इस्तेमाल नहीं, मगर जवाब जरूर” वाला सिद्धांत.

गांधी लिखते हैं कि रूस के पूर्व राजदूत के रूप में पीएस राघवन ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी संतुलित, बारीक विश्लेषण लिखे – न मॉस्को को क्लीन चिट, न नाटो को बरी. बारीकी, सूक्ष्म भेद और संयम उनकी पहचान थे. न कबूतर, न बाज – बस एक परिपक्व, पूर्वाग्रह-मुक्त दिमाग.

जब २०२५ में राघवन अचानक खामोश हो गए, पहले चिंता हुई, फिर पता चला कि वे गंभीर रूप से बीमार हैं. अब वे नहीं हैं. गुहा लिखते हैं कि जब दुनिया युद्ध को नई अदृश्य और त्वरित मारक क्षमता दे रही है, तब भारत को राघवन जैसा मस्तिष्क और संतुलन सबसे ज्यादा चाहिए था.यह लेख सिर्फ एक मित्र की याद नहीं, एक दुर्लभ राजनयिक बुद्धि के खो जाने का शोकगीत है.

राज्यपालों की भूमिका पर संविधान सभा की बहस और आज का संकट

एम.ए बेबी ने द हिन्दू में लिखा है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपालों की भूमिका पर हालिया फैसला और इसके बाद संविधान पीठ द्वारा 16वीं राष्ट्रपति रेफरेंस पर दी गई सलाह ने संविधान की भावना पर एक जरूरी बहस छेड़ दी है. 26 नवंबर1949 को जिस अंतिम प्रारूप को संविधान सभा ने अपनाया, उसके हर शब्द के पीछे उस महान सभा में चले लंबे, गहन और जीवंत विमर्श की छाप थी. राज्यपाल के पद, भूमिका और अधिकारों पर संविधान सभा में जो बहस हुई, वह गुणवत्ता और गंभीरता की मिसाल थी.

कई सदस्यों ने चिंता जताई कि ब्रिटिश काल के गवर्नर जैसा कोई पद स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के लिए खतरा न बन जाए. क्या राज्यपाल केंद्र का एजेंट बनेगा? क्या वह निर्वाचित राज्य सरकारों को अस्थिर करने का हथियार बनेगा? हर बार बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने धैर्य और स्पष्टता से जवाब दिया. उनका मूल मंत्र था: राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होगा, न कि राजनीतिक खिलाड़ी. भीम राव अंबेडकर ने कहा था:

  • राज्यपाल को कैबिनेट की सलाह से बंधे रहना होगा (अनुच्छेद 163).

  • उसे विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल केवल असाधारण परिस्थितियों में और संवैधानिक नैतिकता के दायरे में करना होगा.

  • वह केंद्र और राज्य के बीच सेतु बनेगा, न कि टकराव का औजार.

एमए बेबी ने आगे लिखा है कि अम्बेडकर ने स्पष्ट चेतावनी भी दी थी कि यदि राज्यपाल राजनीतिक पूर्वाग्रह से काम करेगा तो संघीय ढांचा चरमरा जाएगा. सत्तर वर्ष बाद आज हम उसी चौराहे पर खड़े हैं. केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, पंजाब जैसे राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधेयकों को महीनों-वर्षों तक लटकाना, मंत्रिमंडल की सलाह को नजरअंदाज करना, विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति में हस्तक्षेप, और कभी-कभी सरकार गिराने की कोशिशें – ये सब संविधान सभा के सपने का अपमान हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक यही याद दिलाया है-

  • राज्यपाल कैबिनेट की सलाह से बंधे हैं.

  • विधेयकों पर अनावश्यक देरी असंवैधानिक है.

  • विवेकाधीन शक्तियों का मतलब मनमानी नहीं.

यह फैसला सिर्फ कानूनी नहीं, संवैधानिक नैतिकता की पुनर्स्थापना है. अब जरूरत है कि केंद्र सरकार और राज्यपाल इस भावना का सम्मान करें. यदि नहीं, तो संविधान संशोधन कर राज्यपाल को नाममात्र का संवैधानिक प्रमुख बनाने का समय आ गया है – जैसा ब्रिटेन में राजा है, या जर्मनी में राष्ट्रपति.अम्बेडकर का सपना था एक सहकारी संघवाद. आज उसकी रक्षा करना हर नागरिक, हर न्यायाधीश और हर संवैधानिक पदाधिकारी का कर्तव्य है. 26 नवंबर को हम संविधान दिवस मनाते हैं. इस बार यह दिवस हमें याद दिलाए कि संविधान जीवंत दस्तावेज है – उसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है.

क्रिकेट को राष्ट्र से जोड़ता है टेम्बा XII

रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में अपनी बात 1995 के रग्बी विश्व कप की याद से शुरू करते हैं, जब नेल्सन मंडेला ने गोरे अफ्रीकानरों के खेल को अपनाकर रंगभेद के बाद के दक्षिण अफ्रीका को एक सूत्र में बांधा था. ठीक तीस साल बाद, 2025 में टेम्बा बावुमा के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट टीम ने वैसा ही चमत्कार दोहराया, पर कहीं अधिक बहु-नस्लीय और प्रतीकात्मक रूप से समृद्ध.टीम ने पहले लॉर्ड्स पर विश्व टेस्ट चैंपियनशिप जीतकर ऑस्ट्रेलिया को हराया. फिर बिना कागिसो रबाडा के भारत आई और घरेलू परिस्थितियों में भारत को दो टेस्ट की सीरीज में 2-0 से हरा दिया.

गुहा लिखते हैं कि कलकत्ता और गुवाहाटी में बावुमा की कप्तानी, मार्को यान्सेन की हरफनमौलाई और पूरी टीम की अनुशासित बल्लेबाजी-गेंदबाजी ने भारत को करारी शिकस्त दी. यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक थी क्योंकि बीसीसीआई लंबे समय से दक्षिण अफ्रीका को तुच्छ समझता रहा है: 2012–13 में सचिन के 200वें टेस्ट के लिए दौरा छोटा करना, इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया को पांच टेस्ट और दक्षिण अफ्रीका को केवल दो टेस्ट देना, तथा WTC फाइनल की ‘स्मृति’ में जय शाह का स्वयं को नायक बनाने वाला घोर असभ्य वीडियो – ये सब “बिग थ्री” के औपनिवेशिक घमंड और नस्लीय पक्षपात के प्रमाण हैं.

गुहा की मांग स्पष्ट है: अब भारत दक्षिण अफ्रीका में चार-पांच टेस्ट की पूरी सीरीज खेले और अपना असली कद साबित करे, क्योंकि वहाँ आज तक भारत कभी सीरीज नहीं जीत सका. अंत में वे पोस्ट-अपार्थीड युग की सर्वकालिक दक्षिण अफ्रीकी XI प्रस्तुत करते हैं, जिसमें टेम्बा बावुमा को नंबर ५ पर रखकर कप्तान बनाते हैं – खेल की महानता और सामाजिक सुलह दोनों का जीता-जागता प्रतीक. 1995 में मंडेला ने रग्बी से राष्ट्र को जोड़ा था; 2025 में बावुमा ने क्रिकेट से. यही इस लेख का मूल संदेश है.

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