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संडे व्यू: जेडीयू के रंग में बीजेपी? ‘ऊर्जा’ पर खुली पोल!

पढ़ें इस रविवार अदिति फडणीस, आर जगन्नाथ, निखिल दातार, सुनंदा के दत्ता रे के विचारों का सार.

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<div class="paragraphs"><p>पढ़ें इस रविवार अदिति फडणीस, आर जगन्नाथ, निखिल दातार, सुनंदा के दत्ता रे और अरविंद सुब्रह्मण्यन के विचारों का सार.</p></div>
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पढ़ें इस रविवार अदिति फडणीस, आर जगन्नाथ, निखिल दातार, सुनंदा के दत्ता रे और अरविंद सुब्रह्मण्यन के विचारों का सार.

(फोटोः फाइल) 

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जेडीयू के रंग में रंगेगी बीजेपी या जेडीयू का बदलेगा रंग?

बिजनेस स्टैंडर्ड में अदिति फडणीस ने लिखा है कि बीजेपी नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ईमानदारी, त्याग और सामाजिक न्याय के प्रति उनके समर्पण का पूरा सम्मान लोग करते हैं. लेकिन, बीजेपी बिहार में तेजी से आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण भी चाहती है. नीतीश कुमार ने हमेशा बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण का यह कहकर विरोध किया है कि इससे किसानों की आजीविका छिन जाएगी. बीजेपी नेताओं का मानना है कि इसी दृष्टिकोण के कारण बिहार आज शहरीकरण और विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) के मामले में देश के सबसे निचले राज्यों में से एक है.

अदिति लिखती हैं कि वर्तमान राजनीतिक समीकरणों में, 243 सदस्यीय विधानसभा में 89 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी और सरकार में मुख्य निर्णयकर्ता बन गई है. आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में बिहार की लगभग आधी (49.6%) आबादी कृषि और मत्स्य पालन पर निर्भर थी, जबकि विनिर्माण क्षेत्र में केवल 5.7% लोग ही कार्यरत थे. हालांकि, केंद्र सरकार ने हाल ही में राज्य के बुनियादी ढांचे (सड़क और रेलवे) में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का भारी निवेश किया है.

अब राज्य के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कैसे किया जाए. क्या बिहार को बड़े उद्योगों को आकर्षित करने के लिए भूमि अधिग्रहण का कठिन रास्ता चुनना चाहिए या फिर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए? राज्य की 95% औद्योगिक इकाइयां MSME ही हैं जो कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देती हैं. यह लेख इस बात पर विचार करता है कि आने वाले समय में क्या बीजेपी नीतीश कुमार के कृषि और सामाजिक न्याय-केंद्रित मॉडल के साथ चलेगी, या फिर बिहार को अपनी नई औद्योगिक और शहरीकरण की नीतियों के रंग में रंगेगी.

ऊर्जा पर भारत की कमजोरियां उजागर

बिजनेस स्टैंडर्ड में आर जगन्नाथ ने लिखा है कि ईरान-इज़राइल-अमेरिका संघर्ष के संदर्भ में भारत की ऊर्जा निर्भरता को दुनिया के फलक पर सामने लाता है. मुख्य तर्क यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) पर ईरान का नियंत्रण भारत की तेल-गैस आपूर्ति को 'गला घोंट' सकता है, क्योंकि भारत का अधिकांश पश्चिम एशियाई आयात इसी संकरे रास्ते से गुजरता है. बहरीन, कतर, ओमान, यूएई और सऊदी अरब जैसे प्रमुख उत्पादक देशों की आपूर्ति होर्मुज पर निर्भर है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है.

आर जगन्नाथ लिखते हैं कि कि भारत का एलपीजी (60-65%) आयात मुख्यतः पश्चिम एशिया से होता है, जिससे घरेलू रसोई गैस की कमी जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं. 2011 से अब तक घरेलू बजट में पेट्रोलियम उत्पादों (एलपीजी + परिवहन) का हिस्सा 7.5-10.2% तक बढ़ गया है. लेखक का कहना है कि नवीकरणीय ऊर्जा में प्रगति के बावजूद, क्षेत्रीय एकाग्रता और बढ़ती खपत समस्या बनी हुई है.

समाधान के रूप में लेखक गहन आत्मनिर्भरता की वकालत करते हैं. वे अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के नारे "ड्रिल, बेबी, ड्रिल" को अपनाने की सलाह देते हैं—यानी घरेलू तेल-गैस खोज और उत्पादन को तेज करना, जैसे अंडमान के हालिया खोजों को जल्दी विकसित करना. अगले दो दशकों तक जीवाश्म ईंधन पर जोर देने, बड़े भंडार बनाए रखने, भौगोलिक विविधीकरण और एथेनॉल आधारित कुकिंग स्टोव जैसे विकल्पों की सिफारिश की गई है.

लेखक आगे लिखते हैं कि आत्मनिर्भरता सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं—चीन से दुर्लभ मिट्टी/इलेक्ट्रॉनिक्स, अमेरिका से सॉफ्टवेयर/टेक प्लेटफॉर्म (गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि) पर निर्भरता भी कम करनी होगी. स्वदेशी टेक स्टैक, बाजार विविधीकरण और उत्पाद-केंद्रित व्यवसाय पर फोकस जरूरी है. निष्कर्ष यह है कि भले ही आत्मनिर्भरता महंगी पड़े, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिमों से बचने के लिए यह अनिवार्य है. ईरान युद्ध ने भारत की कमजोरियों को उजागर किया है, इसलिए अब गहरी आत्मनिर्भरता और घरेलू उत्पादन पर ध्यान देना समय की मांग है.

कानूनी नजरिए बदलावकारी क्षण है पैसिव इच्छामृत्यु

निखिल दातार ने हिन्दुस्तान टाइम्स में 13 साल से कॉमा में जी रहे हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यू की अनुमति को कानूनी नजरिए से डिफाइनिंग मोमेंट बताया है. 32 साल के हरीश राणा 2013 में दुर्घटना का शिकार हुए थे और सिर में गंभीर चोट लगने के बाद 13 वर्षों से कॉमा की अवस्था में हैं. उनके माता-पिता ने पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था क्योंकि वे वेंटिलेटर जैसी लाइफ-सपोर्ट मशीन पर नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट ने दो स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड बनाए, जिन्होंने कोई न्यूरोलॉजिकल रिकवरी की संभावना नहीं बताई. कोर्ट ने क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन को मेडिकल ट्रीटमेंट माना, न कि बेसिक केयर. इसे रोकना निष्क्रिय इच्छामृत्यु है, न कि सक्रिय, जो अवैध है).

निखिल लिखते हैं कि कोर्ट ने इसे मरीज की गरिमा और सर्वोत्तम हित के आधार पर अनुमति दी. लेखक बताते हैं कि 2018 के Common Cause फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मरने की गरिमा के अधिकार को मान्यता दी, लिविंग विल (advance directives) की अनुमति दी, लेकिन क्रियान्वयन में कमी है—जैसे होम-केयर मरीजों के लिए मेडिकल बोर्ड न होना, राज्यों में कस्टोडियन नियुक्ति कम होना. 2023 में लिविंग विल पर स्पष्टीकरण आया, लेकिन मेडिकल एथिक्स कोड अभी भी इच्छामृत्यु को अनैतिक मानता है (ब्रेन डेथ को छोड़कर).

लेखक (एक वरिष्ठ डॉक्टर) इसे मेडिकल एथिक्स और एंड-ऑफ-लाइफ केयर पर स्थायी प्रभाव वाला मानते हैं. वे लिविंग विल की व्यापक जागरूकता और उसे अपनाना, मेडिकल एथिक्स में सुधार, पेलिएटिव केयर की पहुंच, मौत पर खुली चर्चा और राज्यों द्वारा कस्टोडियन और बोर्ड की नियुक्ति का सुझाव देते हैं. बिना इन सुधारों के संवैधानिक अधिकार सैद्धांतिक रह जाएगा. हरीश का मामला परिवारों की पीड़ा, वित्तीय बोझ और करुणा की कमी को उजागर करता है. लेखक आशा करते हैं कि यह मौत पर संवाद बढ़ाएगा और मरीजों की गरिमा सुनिश्चित करेगा.

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युद्ध क्षेत्र में ‘हीरो’ बनने की कोशिश से बचना जरूरी

सुनंदा के दत्ता-रे ने टेलीग्राफ में लिखा है कि भारत को वैश्विक युद्धक्षेत्रों में अनावश्यक रूप से शामिल होने और "हीरो" बनने की कोशिश से बचना चाहिए. अतीत में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लाखों भारतीयों ने ब्रिटिश सेना के लिए अपनी जान दी थी, लेकिन आज के समय में भारत को दूसरे देशों के युद्धों में अपने लोगों को नहीं झोंकना चाहिए.

लेख में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा इज़राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की अत्यधिक प्रशंसा और अमेरिका की निकटता पर चिंता व्यक्त की गई है. लेखक का तर्क है कि अपनी घरेलू चुनौतियों के कारण भारत, अमेरिका या इज़राइल की अंधी नकल नहीं कर सकता.

सुनंदा के दत्ता रे बताते हैं कि अमेरिका की विदेश नीति मुख्य रूप से तेल और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण से प्रेरित रही है; इसका ऐतिहासिक उदाहरण 1950 के दशक में ईरान के मोसादेक का तख्तापलट और मध्य एशिया के कैस्पियन बेसिन में संसाधनों की होड़ है. हाल ही में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए घातक हमलों से भारी तबाही हुई है और कई निर्दोषों की जान गई है. लेखक का स्पष्ट मानना है कि इन हमलों का असली मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना नहीं, बल्कि वहां सत्ता परिवर्तन (Regime Change) करना है. लेखक इस बात पर जोर देते हैं कि भारत को पश्चिमी देशों के संसाधन और तेल हड़पने की इस नई भू-राजनीतिक लड़ाई का मोहरा बनने से बचना चाहिए और अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए.

अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति छिपाई गयी

अभिषेक आनंद, जोशुआ फेलमैन और अरविंद सुब्रमण्यन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि जीडीपी डेटा की गलत व्याख्या की जाती रही और पुरानी मेथडोलॉजी की कमियों से ध्यान हटाया जाता रहा. ऐसा करते हुए अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति छिपाई जाती रही और नीतिगत फैसलों को जटिल बना दिया गया. मुख्य तौर पर थीसिस यह कहती है कि 2015 में संशोधित जीडीपी सीरीज ने 2011-12 से 2023-24 तक वृद्धि को औसतन 1.5-2 प्रतिशत अंकों से अधिक आंका, जबकि वास्तविक औसत वृद्धि 6% की बजाय 4-4.5% रही. इससे 2000 के दशक की 'इंडिया शाइनिंग' बूम और उसके बाद की मंदी मिट गई और स्थिर गति से 6-7% वृद्धि का भ्रम पैदा हुआ.

लेखकों ने बताया है कि अनौपचारिक क्षेत्र (2011-12 में अर्थव्यवस्था का 45%+) के प्रदर्शन को औपचारिक क्षेत्र के डेटा से प्रॉक्सी किया गया जो डेमोनेटाइजेशन, जीएसटी और कोविड जैसे झटकों से बुरी तरह प्रभावित हुआ. इतना ही नहीं अनुचित डिफ्लेटर्स का उपयोग हुआ. जैसे सेवाओं के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI), जो सेवा मूल्यों को नहीं दर्शाता. तेल कीमतों में गिरावट से मुद्रास्फीति कम दिखी और वास्तविक वृद्धि अधिक. 2004-05 से 2011-12 तक वृद्धि 1-1.5 अंकों से कम आंकी गई.

नतीजा यह हुआ कि मैक्रो इंडिकेटर्स 1990-2000 के दशक में तेज बढ़े फिर गिरे, लेकिन जीडीपी आंकड़े स्थिर दिखाए जाते रहे. इससे आर्थिक पहेलियाँ उभरीं. मजबूत वृद्धि के बावजूद निजी निवेश कमजोर दिखी, एफडीआई घटता रहा, क्षमता उपयोग भी घटा, मजदूरी और रोजगार वृद्धि सुस्त रही, और कहने की जरूरत नहीं कि रुपये पर दबाव भी बढ़ता चला गया. डेटा ने कमजोर अर्थव्यवस्था में मजबूती का संकेत दिया और मजबूत वृद्धि में ढील की सलाह दी, जिससे 2014-19 में सुधारों की जरूरत कम महसूस हुई. लेखक नई जीडीपी सीरीज की सराहना करते हैं. उनका विश्लेषण ऐतिहासिक डेटा सुधारता है और भविष्य के लिए बेंचमार्क देता है. भारत की तेज वृद्धि पर गर्व वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए, सांख्यिकीय सहारे पर नहीं. इससे नीतियाँ अधिक सटीक होंगी और अतीत भी स्पष्ट होगा.

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