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तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि भारतीय राजनीति किसी खराब बॉलीवुड की तरह भ्रामक हो गयी है. कभी इंदिरा गांधी ‘विदेशी हाथ’ को लेकर जुनूनी हो गयी थीं. बाढ़, अकाल, सूखा सब में विदेशी हाथ की तलाश होती थी. बीते हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप की एक टिप्पणी के कारण बीजेपी विदेशी हाथ को लेकर जुनूनी हो गयी. वोटर टर्न आउट पर 21 मिलियन डॉलर के खुलासे के बाद बीजेपी नेताओं और प्रवक्ताओं ने एक बार फिर जॉर्ज सोरोस को राहुल गांधी से जोड़ने की कोशिश की. नरेंद्र मोदी की जगह राहुल गांधी का नाम डालने की कोशिश दिखलाई. बीजेपी और कांग्रेस की भूमिकाओं में उलटफेर को भी समझना जरूरी है.
तवलीन सिंह लिखती हैं कि जो अहंकार भारतीय जनता पार्टी में दिखता था अब कांग्रेस पार्टी में दिखने लगा है. राहुल गांधी का बर्ताव ऐसा हो गया है मानो प्रधानमंत्री बन गये हों. एक सर्वेक्षण के बाद अगर आज चुनाव हुए तो सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस का होने वाला है. वह सौ से अठहत्तर सीटों पर आ सकती है. राहुल गांधी में इतना अहंकार है कि लोकसभा के अंदर या बाहर बोलते हैं तो हमेशा निशाने पर प्रधानमंत्री को रखते हैं. अडानी-अडानी की रट से जनता ऊब चुकी है. सोशल मीडिया पर ऐसे-ऐसे वीडियो डालते हैं जो सबको पता होता है. भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी ने अपनी छवि सुधार ली थी. एक बार फिर राहुल अपनी छवि खुद ही बिगाड़ रहे हैं. संसद में गांधी परिवार ऐसे पेश आता है मानो भारत पर राज करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो. मोदी बेशक सीख गये हों कि इस देश के आम लोगों को राजनेताओं में अहंकार पसंद नहीं है लेकिन गांधी परिवार इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं दिखता. बीजेपी चौदह राज्यों में सरकारें चला रही है. शायद इसलिए कि लोकसभा में साठ सीटें हारने के बाद भी पार्टी में असली आत्ममंथन हुआ.
प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि दिल्ली में 27 साल बाद बीजेपी की नई सरकार सत्ता में आयी है. यह सवाल हमेशा बना रहता है कि दिल्ली क्या चाहती है? दिल्ली की ऐतिहासिक गहराई, स्थानिक विविधता, आर्थिक ऊर्जा और सामाजिक विविधता असाधरण संपत्ति है. यह केवल सत्ता और दौलत की पहचान से आगे निकल गयी है. दिल्ली इतनी दिलचस्पी जगाती है क्योंकि इसकी सफलताएं और असफलताएं भारत के संभावित भविष्य की ओर इशारा करती हैं. दिल्ली एक मध्यम आय वाले देश की तरह है जिसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से ढाई गुना है. केंद्र सरकार का शहर में सीधा हित है. शायद उसका हित बहुत ज्यादा है. दिल्ली में आधुनिक लोकतंत्र की सारी संगठित शक्ति है- मीडिया की फौज और संस्थानों की भरमार.
एक नई शैली की सरकार का उसका वादा भ्रष्टाचार, विभाजनकारी राजनीति और अपरिपक्व प्रदर्शनकारी दिखावे के आरोपों में खत्म हो गया. इसने अपनी सबसे बड़ी संपत्ति दिल्ली के मतदाताओं की ईमानदारी की भावना को बर्बाद कर दिया. लेखक ने एक सर्वे के हवाले से लिखा है कि मध्यम वर्ग ने आप को छोड़ दिया जिसके वोटों में लगभग आठ प्रतिशत की गिरावट आयी. बीजेपी ने आप को रोक दिया और कांग्रेस ने इसके वोट काट दिए. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आप ने यह सेल्फ गोल किया. सड़कों और नालियों जैसे योग्यता के बुनियादी मानकों पर अपने शासन की साख को बर्बाद कर दिया. इस वोट को कोई कैसे पढ़ सकता है? पहली नज़र में यह दिल्ली के नये दृष्टिकोण के अनुकूलन से ज्यादा हताशा को दर्शाता है.
पवन के वर्मा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि जीवन प्रत्याशा सन् 1800 में 25.4 वर्ष थी. आज यह 70.82 वर्ष है. बेहतर चिकित्सा इसकी वजह है. कुछ लोग मानते हैं कि उन्नत चिकित्सा विज्ञान से यह सुनिश्चित होगा कि अधिकांश लोग 100 से 125 साल तक जीएं. मगर, वैज्ञानिक डेटा हमें बताता है कि जीवन प्रत्याशा जरूरत बढ़ी है लेकिन अधिकतम जीवन अवधि नहीं बढ़ी है. सौ साल से ज्यादा जीने वालों की संख्या हर 10 साल में दुगुनी हो सकती है लेकिन वे अब भी अपवाद हैं, नियम नहीं. बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के अनुसार 85 से ज्यादा जीने की आपकी संभावनाओं में जीन एक तिहाई से भी कम है. इसलिए, जवाब में आनुवंशिकी के साथ-साथ आहार, मेटाबोलिज्म, जीवनशैली, तनाव मुक्त जीवन और हैप्पी कम्युनिटी को भी शामिल किया जाना चाहिए.
लेखक का मानना है कि बेहतर उम्र जीना ज्यादा महत्वपूर्ण है. भले ही वह लंबा जीवन ना हो. लंबी स्वास्थ्य अवधि इस लिहाज से महत्वपूर्ण है. विज्ञान ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जहां घातक रूप से बीमार के जीवन को भी काफी हद तक लंबा किया जा सकता है. लेकिन, यह शायद ही जीने लायक जीवन हो. अमेरिकी सर्जन और बेस्ट सेलिंग लेखक अतुल गवांडे ने लिखा है कि बहुत सेलोग अब लिविंग विल लिखते हैं जो रिश्तेदारों को उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखने से मना करते हैं. लेखक फहमी बदायूंनी को उद्धृत करते हैं- दिल से साबित करो कि तुम जिन्दा हो, सांस लेना कोई सबूत नहीं.
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि पर्यावरण की चिंता से जुड़ना जरूरी है. इस बाबत विशेषज्ञों से रायशुमारी और उन्हें इस मकसद से जोड़ना आवश्यक है. मगर, सरकारें ऐसा नहीं कर पा रही हैं. चिपको आंदोलन पर लेखक के काम ने उन्हें पारिस्थितिकीविद माधव गाडगिल के संपर्क में लाया जिनके पास भारतीय प्रायद्वीप का गहन अनुभव और तेज विश्लेषणात्मक दिमाग था. चिपको आंदोलन के बाद पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार पैटर्न बनाने की जरूरत की ओर ध्यान गया. वैज्ञानिकों, सामाजिक वैज्ञानिकों, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं ने इससे जुड़ी चर्चा में भाग लिया. कभी मार्क्सवादी इतिहासकारों का दावा था कि पर्यावरणवाद वर्ग संघर्ष से बुर्जुआ विचलन है. अब लगता है कि मुक्त बाजार अर्थशास्त्री ही हैं जो पर्यावरणवाद को देश के वर्तमान और भविष्य के लिए कथित रूप से अप्रासंगिक बताकर सबसे ज्यादा निंदा करते हैं.
पश्चिमी घाट और हिमालय जैसी बड़ी पर्वत श्रृंखलाओं में भूस्खलन की बढ़ती तीव्रता इसका स्पष्ट उदाहरण है. तीसरी अहम बात यह है कि प्रदूषण का खामियाजा असमान रूप से गरीबों को भुगतना पड़ता है. झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग सीधे शहर की जहरीली हवा में सांस लेते हैं. खुले खनन से छोटे किसानें द्वारा खेती की जाने वाली आसपास की भूमि नष्ट हो जाती है जबकि शहरी उपभोक्ताओं और दूरदराज के शेयरधारकों को लाभ होता है. दुखद बात यह है कि सत्ता मे बैठे राजनेता शायद ही कभी इन विषयों पर विशेषज्ञों से सलाह लेते हैं.
टीएन प्रकाश कम्मार्डी ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि एमएसपी गारंटी के लिए समर्थन बढ़ रहा है. राजनीतिक दल और कृषि पर संसद की स्थायी समिति इसका समर्थन कर रही है. बढ़ते दबाव के तहत सरकार के पास किसानों के कल्याण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इसके लिए बिचौलियों-व्यापारियों और कुछ कृषि व्यवसाय फर्मो के खिलाफ मजबूत रुख की आवश्यकता होगी जो सरकार के लिए चुनौती पेश करते हैं और कृषि नीतियों में बदलाव को मजबूर करते हैं. केंद्र की ओर से समझौतावादी दृष्टिकोण भी जरूरी होगा. खासकर तब जब वह कृषि विपणन को राष्ट्रीय नीति के तहत आगे बढ़ाएगा जिसे किसान समूह कृषि को कॉरपोरेट बनाने के प्रयास के रूप में देखते हैं.
कानूनी एमएसपी को लागू करने के लिए पहले ही कई पहल की जा चुकी हैं. महाराष्ट्र सरकार और कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग ने इस दिशा में कदम उठाए हैं. 2018 में संसद में एक निजी बिल भी पेश किया गया था. आंद्र प्रदेश किसान उपज समर्थन मूल्य अधिनियम 2023 का मसौदा भी उल्लेखनीय है. यह निजी और सहकारी क्षेत्रों द्वारा बाधा मुक्त लेन-देन की अनुमति देता है. यह सुनिश्चित करता हैकि लेन-देन एमएसपी से नीचे न हो. राज्यों में बाजार के रुझान दिखाते हैं कि फसल की कीमतें कटाई के लगभग तीन महीने बाद एमएसपी से नीचे गिरती हैं. फसल के कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कटाई के तुरंत बाद बाजार में नहीं आता है.
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