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अजय छिब्बर ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन को अमेरिकी राष्ट्रपति के समर्थन का रुख भारत की मदद कर सकता है लेकिन कारोबारी जंग और वैश्विक संस्थानों को कमजोर बनाना भारत के लिए मददगार नहीं होगा. विश्व व्यवस्था आज जिस विघटन के दौर से गुजर रही है उसे ‘विशाल विघटन’ के रूप में परिभाषित करना होगा. 2008-2009 के वैश्विक वित्तीय संकट को ‘द ग्रेट डिफ्लेशन’ कहा गया था. 2020 की महामारी को ‘द ग्रेट लॉकडाउन’ का नाम दिया गया. इन घटनाओं ने बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रभाव डाला लेकिन विश्व व्यवस्था को भंग नहीं किया.
अमेरिका 2.2 प्रतिशत टैरिफ लगाता है जो जापान को छोड़कर उसके ज्यादातर साझेदारों से कम है. यूरोपीय संघ में यह टैरिफ 2.7 फीसद, चीन में 3 फीसद, कनाडा में 3.4 फीसद, मैक्सिको में 3.9 फीसद, वियतनाम में 5 फीसद, ब्राजील में 6.7 फीसद, दक्षिण कोरिया में 8.4 फीसद और भारत में 12 फीसद है. ट्रंप ने परिस्थिति उलट दी है. टैरिफ मे भारी इजाफा किया है. उन्होंने स्टील और एल्युमीनियम पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया है. कनाडा और मेक्सिको के साथ व्यापार समझौते के बावजूद उन्होंने उन पर 25 फीसदी का शुल्क लगाया है. चीन पर 10 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगाया गया और भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ पर बराबरी का शुल्क लगाने की घोषणा की है. चीन ने जवाब में अमेरिकी कृषि निर्यात पर 15 फीसद शुल्क लगाया है तो ट्रंप ने प्रतिक्रिया में टैरिफ 10 फीसदी और बढ़ान की घोषणा कर दी है. नतीजतन ब्याज दरें बढ़ने और वैश्विक वृद्धि में सुस्ती के आसार हैं. अनिश्चितता बढ़ी है और शेयर बाजार तेजी से गिर रहे हैं.
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि भारतीय संविधान में बयालीसवें संशोधन के बाद परिसीमन की तलवार 1977 से ही राज्यों की गर्दन पर लटकी हुई है. संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में स्पष्ट भाषा में कहा गया है कि वे ‘एक नागरिक, एक वोट’ के सिद्धांत को अंगीकार करते हैं. इसमें संदेह नहीं कि यह लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है. लेकिन, अमेरिकी लोगों ने 1776 में यह महसूस किया था कि संघवाद के सिद्धांत के विपरीत है ‘एक नागरिक, एक वोट’ का सिद्धांत. भारत में आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी. 2026 के बाद परिसीमन होने का मतलब है कुछ राज्यों को जनसंख्या में तेज वृद्धि के लिए पुरस्कृत करना. वहीं कुछ राज्यों को इसलिए दंडित किया जाएगा क्योंकि उसने जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए प्रयास किया.
लोकसभा के नए कक्ष को 888 सदस्यों के बैठने के लिए चतुराई से डिजाइन किया गया है. अगर सीटों के पुनर्धारण के लिए वह रास्ता अख्तियार किया जाता है तो दक्षिणी राज्यों की आवाज काफी कम हो जाएगी- 129/543 (23.76 फीसद) से 129/888 (14.53 फीसद) तक. इससे कलह और विध्वंस बढ़ता जाएगा. क्या हमारे पास सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान निकालने का विवेक है?
करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि शशि थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच स्पष्ट दरार है. इसे दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि यह दरार दोनों पक्षों के बारे में कुछ बताती है जो एक-दूसरे से बहुत अलग हैं. हालांकि दोनों ही पक्षों ने इसे स्वीकार नहीं किया है. शायद यही समस्या का मूल है. शशि पारंपरिक राजनेता नहीं हैं. वे गुटों में काम नहीं करते बल्कि अपनी प्रतिभा और कौशल पर भरोसा करते हैं. वे खुले हैं, महत्वाकांक्षी भी हैं और पहचान की तलाश में रहते हैं. जाहिर है ध्यान आकर्षित करते रहते हैं. यह आगे बढ़ने का उनका तरीका है और वे इसमें बहुत सफल रहे हैं. ट्विटर पर उनके प्रशंसक और उनकी पहचान इस बात की गवाही है.
शशि और राहुल के बीच संक्षिप्त तुलना काफी कुछ बयां करती है. शशि प्रतिभा, बुद्धिमत्ता और कड़ी मेहनत के बल पर आगे बढ़े हैं. राहुल का कॉलिंग कार्ड उनका सरनेम है. उनके करियर की उपलब्धियां सीमित या कम से कम अज्ञात रही हैं. शशि की ताकत उनकी लंबी शब्दावली और उनका आकर्षक व्यवहार है. उनकी तुलना में राहुल अपरिपक्व लगते हैं. शशि 20 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं. वे युवा महत्वाकांक्षी भारत को आकर्षित करते हैं. राहुल की अपील गरीबों और आर्थिक या सामाजिक रूप से दमित लोगों को आकर्षित करती है. वे अलग-अलग दुनिया में चमकते हैं.
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि 28 फरवरी के दिन जब यूक्रेन के राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति अपमानित कर रहे थे तब वे भारत में साहित्यिक पत्रिका ग्रांटा का एक पुराना अंक पढ़ रहे थे. 1990 में प्रकाशित इस पुस्तक का शीर्षक था- “नया यूरोप!” विशेषण, नया और विस्मयादिबोधक चिन्ह दोनों ही एक साल पहले घटी युगांतरकारी घटनाओं की ओर इशारा करने वाली थीं. इनमें बर्लिन की दीवार का गिरना, पोलैंड में दशकों के बाद पहला स्वतंत्र चुनाव होना और आम तौर पर पूर्वी यूरोप में अधिनायकवाद का पतन शामिल हैं. इस पुस्तक में दुनिया के पंद्रह लेखकों को शामिल कराया गया था. उनमें एक आशावाद था जो अब धराशाई हुआ दिख रहा है.
हालांकि, पुतिन की नजर में कुछ छोटे यूरोपीय देश भी हैं. रूसी राष्ट्रवाद के सत्तावादी और विस्तारवादी रूप के आलोचक चाहे वे घर पर हों या विदेश में, पुतिनिस्टों द्वारा ‘रूसोफोब्स’ के रूप में खारिज कर दिए जाते हैं. लेखक ध्यान दिलाते हैं कि हाल की घटनाओं से पता चलता है कि ग्रांटा संगोष्ठी में योगदान देने वालों में जॉर्ज स्टीनर भी यह सोचने में दूरदर्शी थे कि संयुक्त राज्य अमेरिका समय के साथ-साथ यूरोप के प्रति उदासीन हो सकता है. जेलेंस्की के सार्वजनिक अपमान का रूसी राजनेताओं और प्रचारको ने व्यापक रूप से स्वागत किया है. ट्रंप ने शायद यह अनुमान नहीं लगाया होगा कि यूक्रेन के यूरोपीय सहयोगी उस संकटग्रस्त देश की मदद के लिए इतनी जल्दी एकजुट हो जाएंगे.
पुष्पेश पंत ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में राष्ट्रवाद और सीमाविहीन दुनिया की चर्चा की है. इन शब्दों के एक साथ प्रयोग पर लिखा है कि ऐसा करना विरोधाभासी और भ्रामक लगता है लेकिन वास्तव में यह ऐसे मुद्दे उठाता है जिन्हें अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. क्या हम वैश्वीकरण के युग में सीमाविहीन दुनिया में रह रहे हैं? या, एक उभरती हुई विश्वव्यवस्था की दहलीज पर खड़े होकर हमें बेकार चीजों से छुटकारा पाने के लिए तैयार रहना चाहिए- ऐसी पहचानें जो अब प्रासंगिक नहीं रह गयी हैं?
लेखक का मानना है कि दो विश्वयुद्धों के बाद नस्लवाद और सांप्रदायिक संघर्ष के जहरीले प्रसार में और तेजी आयी. राष्ट्रवाद अप्रचलित हो गया है. तकनीकी और सैन्य रूप से शक्तिशाली लोग निर्लज्जता से कमजोर लोगों के पास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का अधिकार जताते हैं. वे अहंकारी रूप से प्रतिद्वंद्वियों और दुश्मनों के साथ साझेदारी करते हैं ताकि वे अपने द्वारा तय की गयी शांति को लागू कर सकें और दूसरे देशों की संप्रभुता पर आघात कर सकें.
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