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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 27 मई को बिहार समेत अन्य राज्यों में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की वैधता को बरकरार रखा है. अदालत ने कहा कि इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) को यह काम करने का पूरा अधिकार है.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक उद्देश्य को आगे बढ़ाता है.
बेंच ने आगे कहा कि वह SIR कराने के लिए चुनाव आयोग द्वारा दिए गए कारणों से संतुष्ट है. अदालत ने माना कि पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को चार दशक से अधिक समय बीत चुका है, वर्षों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया हुई है, तेजी से शहरीकरण और पलायन बढ़ा है, जिसके चलते मतदाता सूचियों में दोहराव और त्रुटियों की संभावना पैदा हुई.
क्या ECI किसी व्यक्ति की नागरिकता तय कर सकता है? इस पर कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच कर सकता है, लेकिन केवल इस सीमित उद्देश्य से कि संबंधित व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या हटाया जाए.
कोर्ट ने कहा, “विस्तृत विचार-विमर्श के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रावधानों को देखते हुए, निर्वाचन आयोग मतदाता सूचियों की तैयारी या पुनरीक्षण के दौरान नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच करने के लिए निस्संदेह सक्षम है.”
अदालत ने आगे कहा,
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की दी गई जानकारी से भरोसा नहीं होता या शक होता है, तो चुनाव आयोग को कानून के हिसाब से एनरोलमेंट मना करने या नाम हटाने की कार्रवाई शुरू करने का अधिकार होगा.
गौरतलब है कि पिछले साल ECI ने बिहार में SIR कराने का निर्देश दिया था. इसके खिलाफ ADR और NFIW समेत कई याचिकाएं दायर कर इस प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई. हालांकि, शीर्ष अदालत ने SIR पर कोई रोक नहीं लगाई. बिहार में प्रक्रिया पूरी होने के बाद आयोग ने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल समेत अन्य राज्यों में भी SIR कराया.