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"ये 2023 की बात है. लगभग 2025 लोग थे. मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और वेणु गोपाल भी थे. तब मीटिंग में मैंने कहा कि बिहार में कांग्रेस की बहुत खराब हालत है. हां, तब नीतीश जी हम लोगों के साथ थे. लेकिन हल्ला ये हो गया था कि नीतीश जी इंडिया गुट से अलग हो रहे हैं. तब मैंने मीटिंग में कहा कि देखिए नीतीश जी को रोकने की कोशिश कीजिए. लेकिन उस दिन के बाद उलटा ये हुआ कि दिल्ली की किसी भी मीटिंग में फिर कभी मुझे नहीं बुलाया गया. एक महीने के बाद नीतीश जी भी गठबंधन से अलग हो गए."
चार दशकों तक कांग्रेस में रहने वाले सीनियर लीडर और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. शकील अहमद पार्टी को अलविदा कहने के बाद राहुल गांधी पर हमलावर हैं. द क्विंट के लिए शादाब मोइज़ी के साथ एक खास बातचीत में अहमद ने अपनी नाराजगी, जाहिर करते हुए कहा कि राहुल गांधी बाहर के लोगों से या दूसरी पार्टी से नहीं बल्कि अपनी पार्टी के बड़े नेताओं से ही डरते हैं.
उन्होंने कहा,
अहमद ने यह भी जोड़ा कि वे पहले ही चुनाव न लड़ने का ऐलान कर चुके थे, इसके बावजूद उन्हें दरकिनार किया गया. उन्होंने कहा,
द क्विंट के साथ एक बातचीत में अहमद ने राहुल बारे में कहते है कि राहुल को समझने की ज़रूरत है. उनके व्यक्तित्व के दो पहलू हैं. एक वो जो विपक्ष के साथ और जनता के सामने दिखता है, और दूसरा वो जो पार्टी के अंदर है.
शकील अहमद कहते हैं कि
जब शकील अहमद से पूछा गया कि क्या कांग्रेस में यह एक बड़ी समस्या नहीं है कि नेता आपस में बात करने के बजाय मीडिया में पार्टी की कमियां गिनाते हैं? आखिर आप लोग 5-10 साल से अंदर बैठकर अपनी बात क्यों नहीं रख पाए?
इस पर शकील कहते हैं, "जब आप किसी अनुभवी आदमी की एंट्री ही बैन कर देते हैं, तो बात क्या होगी? अभी हाल ही में एक पूर्व मुस्लिम विधायक ने खड़गे साहब को एक चिट्ठी लिखी और दो दिन के भीतर उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया."
वे आगे कहते हैं, "मैं खुद जनरल सेक्रेटरी रहा, मंत्री रहा और 12 साल तक पार्टी का प्रवक्ता रहा. अगर मैं पार्टी में रहता, तो शायद ये सब मीडिया में नहीं कहता. मैंने पार्टी छोड़ी ही इसीलिए है ताकि अब लोगों से खुलकर बात कर सकूं."
शकील ने अपनी निष्ठा साफ करते हुए कहा, "अगर मैं आज कड़वा सच कहूंगा तो पार्टी का नुकसान होगा, जबकि मैं अभी भी पार्टी का शुभचिंतक हूं. मैं आज फिर ऑन-रिकॉर्ड कहता हूं कि पूरी जिंदगी किसी दूसरी पार्टी में नहीं जाऊंगा. मेरी जिंदगी का आखिरी वोट भी कांग्रेस या उसके गठबंधन को ही जाएगा."
राहुल गांधी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, "लेकिन एक बात समझ नहीं आती कि राहुल जी दूसरी पार्टियों से आए लोगों को इतनी 'प्रेफरेंस' क्यों देते हैं? उनके इस व्यवहार को 'डिसाइफर' (समझना) मुश्किल है. शायद उन्हें लगता है कि बाहर से आए लोगों की जड़ें कांग्रेस में हैं नहीं, उन्हें जब चाहेंगे हटा देंगे. लेकिन जिनकी जड़ें कांग्रेस में गहरी हैं, राहुल गांधी को शायद वो लोग पसंद नहीं हैं.
जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस में अब सोनिया गांधी की पहले जैसी नहीं चलती, तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि
वर्ष 2009 का जिक्र करते हुए वह कहते हैं, "2014 और 2019 के चुनावों में यह साफ देखा गया कि सिर्फ मुझे रोकने के लिए लालू यादव ने दूसरी पार्टी के ऐसे लोगों को आगे बढ़ाया जिन्हें कोई जानता तक नहीं था.
शकील अहमद ने एक पुराना किस्सा सुनाते हुए सोनिया गांधी और लालू यादव के बारे में कहा,
वह आगे कहते हैं, "आप लालू जी पर कोई भी इल्जाम लगा लीजिए, लेकिन उन पर सियासी नासमझी का आरोप नहीं लगा सकते. वह किसी भी हाल में दूसरी पार्टी के मुस्लिम नेता को खड़ा नहीं होने देंगे. यह विशुद्ध रूप से सियासत का खेल है और शायद मैं भी उनकी जगह होता, तो यही करता."
जब उनसे पूछा गया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे 'मौन' रहते थे. जैसा कि फिल्मों और किताबों में भी दिखाया गया कि वे सिर्फ एक चेहरा थे और असली पावर कहीं और थी तो आप उस दौर के मंत्री होने के नाते इसे कैसे देखते हैं?
इस पर शकील अहमद कहते हैं,
जब उनसे में पूछा गया कि बिहार में आप जैसे बड़े मुस्लिम चेहरों ने अगली पीढ़ी की मुस्लिम लीडरशिप को खड़ा नहीं होने दिया, इस पर उन्होंने कहा,
"कोई किसी को लीडर कैसे बनाता है? मौका देकर, उसे प्रोटेक्शन (राजनैतिक संरक्षण) देकर और टिकट दिलवाकर. हमने भी अपनी तरफ से कई लोगों को मौके दिए. अगर आप सिर्फ मुस्लिम लीडर्स की बात करेंगे, तो मैं दो नाम गिना सकता हूं जिन्हें मैंने टिकट दिलवाया. वैसे तो मैंने बहुतों की पैरवी की, लेकिन ये दो उदाहरण खास हैं."