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देश में कोरोनावायरस के लगातार बढ़ते मामलों के बीच, बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने 24 मार्च को ट्विटर पर दावा किया कि भारत में COVID-19 स्ट्रेन लेस वेरुलेंट म्यूटेशन है.
स्वामी ने जानकारी अपने 'अमेरिका में बेस्ड दोस्त रमेश स्वामी' के हवाले से दी और लिखा, “विदेशों में स्ट्रेन के मुकाबले, इसे (COVID-19) हमारे शरीर के नैचुरल डिफेंस मैकेनिज्म से ज्यादा बेहतर तरीके से टारगेट किया जा सकता है.”
वायरस को लेकर डर का माहौल है. ऐसे में, इस ट्वीट ने 46,000 लोगों का ध्यान खींचा, और इसे करीब 10,000 लोग रिट्वीट भी कर चुके हैं.
स्वामी के दावे के समर्थन में, एक ट्विटर यूजर ने एक स्टडी भी शेयर की. इस ट्वीट को बाद में सुब्रमण्यम स्वामी ने रिट्वीट भी किया.
लेकिन स्वामी के दावे का आधार क्या है? और क्या ये बात सच है कि वायरस को शरीर के 'नैचुरल डिफेंसिव मैकेनिज्म' के द्वारा हराया जा सकता है? और क्या उन्होंने जो स्टडी शेयर की, वो वाकई स्वामी के दावे का समर्थन करती है? इस पर एक-एक कर नजर डालते हैं.
हमने गोरखपुर के रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर (RMRC) के डायरेक्टर डॉ. रजनी कांत श्रीवास्तव से बात की, जिन्होंने कहा कि अभी तक भारत में ऐसी कोई स्टडी नहीं हुई है, जो ये दावा करे कि भारत में वायरस का स्ट्रेन लेस वेरुलेंट (कम खतरनाक) है.
उन्होंने आगे कहा कि सभी देशों का मौसम और अलग पॉपुलेशन होती है, और ये दावा किसी एक देश के आधार पर नहीं किया जा सकता है. एक व्यक्ति की इम्यूनिटी अलग होगी, जिसके आधार पर उसका शरीर प्रतिक्रिया देगा.
डॉ. रजनी कांत ने कहा, “एक संभावना है, लेकिन अब तक ऐसी कोई स्टडी ऐसा नहीं कहती.”
जाने-मानें वायरोलॉजिस्ट, डॉ. शाहीद जमील ने भी इस दावे को खारिज किया और कहा कि इसके समर्थन में कोई सबूत या आधार नहीं है. उन्होंने कहा कि इस तरह के बयानों से कंफ्यूजन की स्थिति पैदा होती है और ये लोगों का भला करने की बजाय और नुकसान करते हैं.
उन्होंने कहा कि ये दो सीक्वेंस शुरुआत के दो केस- वुहान से लौटे केरल के स्टूडेंट से हैं. उन्होंने कहा, "हमारे पास वायरस को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं है, तो हम ये कैसे कह सकते हैं."
इसके अलावा, भारत में साइंटिस्ट ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि वायरस कैसे खुद को बदल रहा है. इकनॉमिक टाइम्स से बातचीत में, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में माइक्रोबायोलॉजी और सेल बायोलॉजी के प्रोफेसर एस विजय ने कहा कि 'वायरस म्यूटेशन, सीक्वेंस वेरिएशन और इसकी तीव्रता को कोरिलेट के लिए जाना जाता है.'
हालांकि, नोवेल कोरोनावायरस पर स्टडी कर रहे अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एप्लाइड फिजिक्स लैबोरेट्री में मॉलिक्यूलर जेनेटिसिस्ट ने द वॉशिंगटन पोस्ट से कहा कि वायरस की म्यूटेशन रेट से पता चलता है कि एक सिंगल वैक्सीन (डेवलप करने के बाद) को कोरोनावायरस ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, साइंटिस्ट का कहना है कि स्ट्रेन लगभग सभी जगह एक जैसा है और ये साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि कुछ स्ट्रेन दूसरों से ज्यादा खतरनाक हैं.
अब देखते हैं कि जिस स्टडी का हवाला सुब्रमण्यम दे रहे हैं वो क्या कहती है, और क्या वाकई में कहती है कि भारत में कोरोनवायरस कम वेरूलेंट है?
स्टडी को समझने के लिए हमने इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी के ट्रांसनेशनल बायो इन्फॉरमेटिक्स ग्रुप के लीडर दिनेश गुप्ता से बात की. दिनेश गुप्ता ट्वीट में जिस स्टडी का हवाला है, उसे अंजाम देने वालों में से एक हैं. दिनेश गुप्ता ने द क्विंट से कहा कि स्टडी में उन्होंने कहीं भी वायरस की ताकत के बारे में जिक्र नहीं किया है.
उन्होंने आगे बताया कि - ये तो होता ही है कि वायरस जिंदा रहने, चिपके रहने और इंसानों को संक्रमित करने म्यूटेट करते हैं. ये भी ध्यान देने वाली बात है कि स्टडी के ऊपर में ही ये नोट लिखा है कि इस स्टडी को अभी रिव्यू नहीं किया गया है, इसलिए इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं मानना चाहिए और न ही इसके आधार पर कोई इलाज करना चाहिए. यहां तक कि इसे मीडिया में छापने को लेकर भी आगाह किया गया है.
चीन के वूहान से शुरु हुआ कोरोनावायरस अब दुनिया भर में 4.5 लाख लोगों को संक्रमित कर चुका है. जैसा कि आप देख सकते हैं सुब्रमण्यम स्वामी के बयान के समर्थन में बहुत कम सबूत मौजूद हैं, और ऐसी किसी स्टडी या रिसर्च की गैरमौजूदगी में ये बयान भ्रामक है.
जबसे ये महामारी फैली है, इंटरनेट पर बहुत सी झूठी बातें तैर रही हैं. क्विंट लगातार ऐसी झूठ और भ्रामक बातों की सच उजागर कर रहा है. आप यहां हमारे फैक्ट चेक स्टोरीज पढ़ सकते हैं.
(एडिटर नोट: स्वामी के कमेंट के समर्थन में इस्तेमाल की गई स्टडी की डिटेल और स्टडी के एक ऑथर का कमेंट शामिल करने के लिए इस स्टोरी को अपडेट किया गया है.)