
advertisement
"डंपिंग ग्राउंड बनने से खेती से ज्यादा स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा. हम यहां अपनी नस्ल और अपनी फसल बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं." यह कहना है मीरपुर गांव के चेतन त्यागी का.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के बॉर्डर से सटे बदरपुर खादर गांव के ठीक दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है. और इसी इलाके के मीरपुर हिंदू गांव के आसपास इन दिनों हवाओं में ऑक्सीजन कम और अविश्वास की गंध ज्यादा है. यह संघर्ष किसी बड़ी विकास परियोजना या हाईवे के खिलाफ नहीं, बल्कि उस कचरे के खिलाफ है जिसे शहर अपने से दूर फेंक देना चाहता है, और गांव उसे अपने बीच स्वीकार करने को तैयार नहीं है.
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में प्रस्तावित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज हो रहा है. किसानों का कहना है कि यह परियोजना उनकी खेती, भूजल और सेहत पर गंभीर असर डाल सकती है, इसलिए इसे आबादी और कृषि भूमि से दूर शिफ्ट किया जाए.
15 फरवरी को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़प हो गई. ग्रामीणों का आरोप है कि लाठीचार्ज में करीब 50 से 60 लोग घायल हुए, जबकि पुलिस इससे इनकार कर रही है. वहीं नगर निगम ने तोड़फोड़ के आरोप में पांच नामजद समेत 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया है.
लाठीचार्ज की तस्वीरें
फोटो: द क्विंट द्वारा प्राप्त
इसी तरह स्थानीय किसान राजेन्द्र का आरोप है कि पुलिस लाठीचार्ज में उनका हाथ टूट गया और उनके 22 वर्षीय बेटे को बुरी तरह पीटा गया. वो कहते हैं, "उस दिन चार सिपाही मेरे जवान बेटे पर लगातार लाठी बरसा रहे थे."
वहीं प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई नाबालिग बच्चों से लेकर महिलाओं ने भी शरीर पर चोट के निशान दिखाते हुए पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप लगाया.
हालांकि इन आरोपों से इनकार करते हुए ट्रॉनिका सिटी थाने के SHO मनोज कुमार ने द क्विंट को बताया कि प्रदर्शनकारी गेट का ताला तोड़कर निर्माणाधीन प्लांट के अंदर घुस गए थे. समझाने के बावजूद वे नहीं माने, रास्ता जाम किया और पुलिस पर पथराव किया गया.
उन्होंने आगे कहा, "लाठीचार्ज हमारा उद्देश्य नहीं था, भीड़ को हटाने के दौरान हल्का बल प्रयोग हुआ हो सकता है."
चोट के निशान दिखाते हुए ग्रामीण
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
किसान नेता नीरज त्यागी कहते हैं, "प्रस्तावित प्लांट में पूरे गाजियाबाद जिले का कूड़ा लाया जाएगा, जबकि 500 मीटर की दूरी पर कई गांव बसे हैं और दो किलोमीटर के दायरे में करीब 16–17 गांव आते हैं. सरकार कहती है कि कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण होगा, लेकिन हम जानते हैं कि अंत में यहां कूड़े का पहाड़ ही बनेगा."
उनका कहना है कि आबादी के बीच कूड़े का पहाड़ बनने से भारी प्रदूषण फैलेगा, पास में यमुना नदी और मंदिर भी हैं. इसी के विरोध में ग्रामीण पिछले 45 दिनों से मंदिर परिसर में शांतिपूर्वक धरना दे रहे हैं.
विरोध प्रदर्शन को संबोधित करते हुए स्थानीय नेता
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
आंदोलन में शामिल 75 वर्षीय बृजेश देवी कहती हैं, "भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन अपने आसपास डंपिंग ग्राउंड नहीं बनने देंगे. हमारे इलाके में न ढंग का स्कूल है, न अस्पताल, लेकिन उसके बदले सरकार हमें कूड़े का पहाड़ देना चाहती है. ये कैसे विकास है?"
विरोध प्रदर्शन में शामिल महिलायें
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
मीरपुर हिन्दू गांव में प्रस्तावित यह प्लांट शुरुआत में लोनी नगर पालिका की ठोस कचरा प्रबंधन योजना का हिस्सा था, लेकिन संचालन में दिक्कतों के चलते करीब तीन महीने पहले इसे गाजियाबाद नगर निगम को हैंडओवर कर दिया गया.
शुरुआत में 125 मीट्रिक टन प्रतिदिन क्षमता का प्लांट प्रस्तावित था, जिसे 2020 में बढ़ाकर 300 टन करने की योजना बनाई गई. अब नगर निगम के हेल्थ ऑफिसर मिथिलेश कुमार के मुताबिक तैयार प्लांट भविष्य में 1600 से 2000 मीट्रिक टन प्रतिदिन तक कचरा संभाल सकेगा, जबकि शुरुआती चरण में करीब 500 मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस किया जाएगा.
विरोध प्रदर्शन में शामिल किसान
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
मलिक का आरोप है कि इस फैसले से आसपास रहने वाले लोगों की जीवन-स्थितियां बदतर हो जाएंगी और पूरे इलाके का माहौल प्रभावित होगा.
मनीषा त्यागी कहती हैं, "यमुना की पानी बढ़ने पर इस इलकें में बाढ़ आ जाती है. बाढ़ आएगी तो डंपिंग ग्राउंड का कूड़ा हमारे घरों और चूल्हों तक पहुंचेगा. कूड़े से निकलने वाली गैस हमारे बच्चों को बीमार करेगी. यहां लोग वैसे ही लंबी उम्र नहीं जी पा रहे, ऐसे में यह प्लांट हमारी आने वाली पीढ़ियों का क्या भविष्य छोड़ेगा? हमें यह डंपिंग ग्राउंड नहीं चाहिए."
उन्होंने बताया कि दो साल पहले उनके घर में बाढ़ का पानी घुस चुका है और लोगों को अपने स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है.
इस परियोजना के लिए करीब 120 एकड़ भूमि साल 2012 में चिन्हित कर ली गई थी, लेकिन स्थानीय विरोध के चलते प्रशासन वर्षों तक जमीन का कब्जा नहीं ले सका. बाद में 12 जून 2020 को पुलिस की मौजूदगी में जमीन अपने कब्जे में ली गई और लगभग 8.2 हेक्टेयर क्षेत्र में प्लांट का काम शुरू किया गया. नगर निगम के हेल्थ ऑफिसर मिथिलेश कुमार के मुताबिक, प्लांट का काम फिलहाल करीब 70 फीसदी तक पूरा हो चुका है.
निर्माणाधीन वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
कोर्ट ऑर्डर
फोटो:स्क्रीनशॉर्ट
किसान नेता नीरज त्यागी का आरोप है, "यहां डिग्री कॉलेज बनाने के लिए शिलान्यास किया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि यहां कूड़ा घर बनाया जा रहा है."
त्यागी का कहना है कि ग्रामीण शुरू से इसका विरोध कर रहे हैं और उनका सवाल है कि शहर का कूड़ा गांव के बीच क्यों लाया जा रहा है, जबकि यहां लोग खेती और हरियाली पर निर्भर होकर जीवन यापन कर रहे हैं.
वहीं नगर निगम का कहना है कि शहर के कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए यह प्लांट जरूरी है और इसे सभी पर्यावरणीय मानकों के तहत बनाया जाएगा.
Solid Waste Management Rules, 2016 के अनुसार किसी भी लैंडफिल साइट को पिछले 100 वर्षों के रिकॉर्डेड फ्लड प्लेन क्षेत्र के भीतर अनुमति नहीं दी जा सकती.
लैंडफिल नदी से कम से कम 100 मीटर, तालाब से 200 मीटर और हाईवे, आबादी, पार्क तथा जल स्रोतों से 200 मीटर दूर होना चाहिए. एयरपोर्ट से इसकी दूरी 20 किलोमीटर अनिवार्य है. पांच टन प्रतिदिन से अधिक क्षमता वाले प्लांट के चारों ओर पर्याप्त बफर जोन जरूरी है.
ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 – सुरक्षित कूड़ा भराव स्थल (लैंडफिल) के नियम और मानक
फोटो:स्क्रीनशॉर्ट
देश के कई शहरों में ठोस कचरा प्रबंधन और लैंडफिल साइटें मौजूद हैं. इनके आसपास रहने वाले लोगों पर क्या असर पड़ता है, इसे समझने के लिए द क्विंट वैज्ञानिक अध्ययन देखे और फिर एक्सपर्ट से बात की.
दिल्ली के गाजीपुर, भलस्वा और ओखला लैंडफिल के पास रहना हर साल और मुश्किल होता गया है. इंडियन जनरल ऑफ क्लीनिकल प्रैक्टिस के जून 2018 के एक अध्ययन के मुताबिक लैंडफिल से दो किलोमीटर के दायरे में PM2.5 और PM10 का स्तर ज्यादा पाया गया, जबकि लोगों की फेफड़ों की क्षमता कम दर्ज की गई.
पानी में बढ़ा हुआ TDS और कठोरता भूजल प्रदूषण की ओर इशारा करते हैं. यानि लैंडफिल के पास रहना सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है.
University College Dublin में सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट, डॉ ऋचा सिंह कहती हैं कि कृषि भूमि के पास या 500 मीटर बफर जोन के भीतर वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट लगाना गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है. ऐसे प्लांट, खासकर जहां मिश्रित कचरा जलाया जाता है, वहां से डाइऑक्सिन, फ्यूरान, भारी धातुएं, पार्टिकुलेट मैटर और सल्फर-नाइट्रोजन के ऑक्साइड जैसे खतरनाक प्रदूषक निकलते हैं, जिनमें कई कैंसरकारी होते हैं और लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं.
कृषि भूमि के बीच निर्माणाधीन वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
उनका कहना है कि भारत में निगरानी और नियमों के पालन की कमी के कारण जोखिम और बढ़ जाता है, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले भी कई प्लांटों पर गैर-अनुपालन के लिए जुर्माना लगा चुका है. ऐसे प्लांटों से निकलने वाली बदबू भी आसपास रहने वाले लोगों में तनाव, नींद की कमी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट से जुड़ी पाई गई है.
उन्होंने बताया कि यूरोप में किए गए ह्यूमन बायोमॉनिटरिंग अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे प्लांट से 1 से 3 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों के खून और पेशाब में भारी धातुओं और स्थायी ऑर्गेनिक प्रदूषकों का स्तर अधिक था — और भारतीय संदर्भ में भी इसी तरह के संकेत मिलते हैं.
प्रदर्शन में शामिल महिलायें
फोटो: The Quint/ Shiv Kumar Maurya
मीरपुर हिंदू का यह विरोध सिर्फ एक गांव की लड़ाई नहीं है, बल्कि विकास और लोगों की सेहत के बीच संतुलन का सवाल है. कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की जरूरत है, लेकिन प्रभावित ग्रामीणों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अब देखना है कि प्रशासन ऐसा समाधान निकाल पाता है या नहीं, जो विकास और पर्यावरण दोनों को साथ लेकर चले.