Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Videos Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019PM मोदी की ‘पकौड़ानॉमिक्स’: क्या कहते हैं दिल्ली-NCR के फेरीवाले?

PM मोदी की ‘पकौड़ानॉमिक्स’: क्या कहते हैं दिल्ली-NCR के फेरीवाले?

खोमचा लगाने वालों को नहीं रास आ रही पीएम की ‘पकौड़ानॉमिक्स’

आकिब रजा खान
वीडियो
Published:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पकौड़ा वाले बयान से हर तरफ बवाल मचा हुआ है
i
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पकौड़ा वाले बयान से हर तरफ बवाल मचा हुआ है
(फोटो कोलाज: The Quint)
✕

advertisement

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पकौड़ा वाले बयान पर हर तरफ बवाल मचा हुआ है. उन्होंने जैसे 'पकौड़ानॉमिक्स' ही बना दी है. आइए पहले जानते हैं, सुधीर चौधरी के साथ जी न्यूज के इंटरव्यू में क्या बोले थे पीएम मोदी.

अगर एक टीवी चैनल के बाहर कोई पकौड़े बेच रहा है और वो 200 रुपये कमा के जाता है, तो वो रोजगार है या नहीं?
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक, एक ‘कर्मचारी’ वो व्यक्ति होता है जिसे बुनियादी मेहनताना मिले, जो सीधे तौर पर रोजगार देने वाले की कमाई पर निर्भर न रहे.

तो क्या पकौड़े बेचना रोजगार है? इसलिए ये जानने के लिए क्विंट निकल पड़ा दिल्ली की सड़कों पर ये जानने कि इस 'पकौड़ानॉमिक्स' पर क्या कहते हैं फेरीवाले? हमने ये भी जानना चाहा कि पीएम उन्हें रोजगार कह रहे हैं तो उनका क्या कहना है?

मूंगफली और सोडा बेचने वाली रुखसाना खान कहती हैं, '' हम इतना भी नहीं कमा पाते है कि 1000 रुपये बच जाएं.''

हम जितने में गुजारा कर सकें बस इतना ही कमाते हैं.
रुखसाना खान

सड़क किनारे तंबाकू बेचने वाले विश्वनाथ साहू ने बताया कि वो 9 हजार रुपये प्रति महीना ही कमा पाते हैं. दूसरी तरफ, बिरयानी और कचौड़ी की रेहड़ी लगाने वाले रामरतन कहते हैं कि इस दुकान से उन्हें करीब 5 से 6 हजार रुपये हर महीने मिलते हैं.

हमारी किराए की दुकान है और जो लड़के यहां काम करते हैं, उनको भी पैसे देने होते हैं. मैं अकेले तो सब काम नहीं कर सकता.
रामरतन

जो घरेलू नौकर के तौर पर काम करते हैं, उन्हें नियमित करने के लिए सरकार ने 9 हजार रुपये की न्यूनतम मजदूरी तय करने की योजना बनाई है. इसके अलावा सामाजिक सुरक्षा कवर और छुट्टी जैसी दूसरी सुविधाएं भी मिल सकती हैं.

अगर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले सभी 7.52 करोड़ कर्मचारियों को 9 हजार रुपये हर महीने दिए जाएं तो सरकारी खजाने पर 6 खरब 76 अरब रुपये का बोझ पड़ेगा.

यह भी पढ़ें: हंसी पर बरपा हंगामा: रेणुका लाएंगी विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव

Published: undefined

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT