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क्या आपके पॉपकॉर्न में नमक है? या चीनी है?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पॉपकॉर्न पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) का जिक्र क्या किया भारत के लोगों का गुस्सा पॉपकॉर्न की तरह उबाल मारने लगा. मीम और जोक बनने लगे. सेकंड कार खरीदने पर भी सवाल उठने लगे.
लेकिन सवाल है कि 7 साल बाद भी जीएसटी में ही देश क्यों उलझा है? सरकार दावा कर रही है कि 2024 में अब तक का सबसे ज्यादा जीएसटी रेवेन्यू कलेक्ट हुआ, साथ ही इनकम टैक्स से लेकर पेट्रोल पर टैक्स से सरकार का खजाना भर रहा है, फिर भी भारत की जीडीपी ग्रोथ 18 महीने के निचले स्तर पर क्यों है? इस आर्टिकल में हम बताएंगे कि मिडिल क्लास कितने टैक्स के मिडिल में फंसा है, 2025 तक 5 ट्रिलियन इकनॉमी का जो वादा हुआ था उसका क्या हुआ?
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अब आते हैं जीएसटी पर. ऐसे तो भारत में साल 2016 में ही वन नेशन वन टैक्स के नारे के साथ जीएसटी लागू किया गया था. लेकिन इस पर कई तरह के भ्रम और बहस आए दिन होती रहती है. फिलहाल इस बार बहस की वजह है फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण के दो बयान. पॉपकॉर्न और पुरानी कार.
पॉपकॉर्न से याद आया. हमने आर्टिकल के शुरुआत में पूछा था कि क्या आपके पॉपकॉर्न में नमक है.
दरअसल, अगर नमक है तो दो बातें होंगी. पैकेट में है या खुला है. खुला है तो 5 फीसदी टैक्स लगेगा. पैकेट में है तो 12 फीसदी. अब अगर नमक से बैर है और मीठे और क्रीम यानी कारमेलाइज्ड पॉपकॉर्न से प्यार है तो दो बातें होंगी. या तो 18 फीसदी टैक्स दो या फिर खाओ ही नहीं..
पॉपकॉर्न कौन सी दाल-रोटी है जिसके बिना काम नहीं चलेगा. लेकिन अगर रोटी खाना है तो दो बातें होंगी. प्लेन रोटी है तो 5 फीसदी टैक्स, पैकेट में फ्रोजेन पराठा बन गया तो फिर 18 फीसदी जीएसटी.
ये सब सुनकर गला सूख रहा होगा, और पानी पीना चाहेंगे तो तीन बातें होंगी.. अगर घर में डायरेक्ट हैंड पंप से पानी मिल गया तो ठीक, लेकिन अगर पीने के पानी का 20 लीटर का पैक्ड बॉटल खरीदा तो 12 फीसदी टैक्स लगेगा. तीसरी बात अगर घर में पीने के पानी के लिए वॉटर प्यूरीफायर लगाया तो फिर 18 फीसदी टैक्स.
कुल मिलाकर भारत में टैक्स आपका पीछा छोड़ने से रहा. कई लोग कह सकते हैं कि इस देश में सिर्फ एक फीसदी लोग ही इनकम टैक्स देते हैं. फिर इतना हंगामा क्यों? लेकिन ऐसा नहीं है.
अब बात निर्मला सीतारमण के जीएसटी से जुड़े बयानों की. निर्मला सीतारमण ने कहा, “12 लाख में खरीदा और 9 लाख में बेच रहे हैं सेकेंड हैंड इस्तेमाल की गई गाड़ी के नाम पर तो इस मार्जिन पर 18 पर्सेंट टैक्स लगेगा. वो चाहे कोई भी इस्तेमाल में लाई गई कार हो. तो यह मार्जिन पर लगेगा न कि उस दाम पर जिस पर कार बेची गई हो.”
यही वो बयान है जिसपर बहस शुरू हुई. लोगों ने कहा कि ये गजब है. हम अपनी पुरानी कार को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच रहे हैं. तो किस बात का टैक्स. एक तो हम पहले ही खरीद से कम दाम में बेच कर घाटे में हैं उसके बाद टैक्स देकर और ज्यादा घाटा. हालांकि एक दिन बात इसपर सरकार की तरफ से सफाई आई.
हालांकि इसपर भी लोगों ने सवाल किए कि कार डीलर जो जीएसटी देगा वह वह कार खरीदने वाले या बेचने वाले व्यक्ति से ही वसूलेगा. यानी इनडायेक्ट ही सही, जीएसटी का भार आम आदमी को भी झेलना पड़ेगा.
11 सितंबर 2024 को ही ले लीजिए. तमिलनाडु के मशहूर होटल चेन श्री अन्नपूर्णा के मालिक श्रीनिवासन ने निर्मला सीतारमण से खाने वाले सामानों पर अलग-अलग GST दरों पर चिंता जताई. श्रीनिवासन ने कहा कि क्रीम से भरे बन पर 18% टैक्स लगता है, जबकि सादे बन पर GST नहीं लगता है. कस्टमर कहते हैं कि आप सादा बन दीजिए, हम क्रीम खुद भर लेंगे. वहां मौजूद सब लोग हंसने लगे. लेकिन एक दिन बाद श्रीनिवासन का एक वीडियो तमिलनाडु बीजेपी ने शेयर किया जिसमें वो वित्त मंत्री से माफी मांगते दिखे.
आप ये भी जान लीजिए कि अप्रैल 2024 में जीएसटी कलेक्शन 2.10 लाख करोड़ रुपये हुआ, जोकि अबतक का सबसे ज्यादा कलेक्शन है. अब सवाल है कि सरकार का खजाना भर रहा है फिर भी आम लोगों को राहत क्यों नहीं है?
आप ये हेडलाइन पढ़िए. भारत 2024 में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेगा.
अब सच्चाई देखिए.
आप पूछेंगे ये जीडीपी क्या है? ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट. मतलब किसी एक साल में देश में पैदा और बनने वाले सभी सामान यानी गुड्स और सर्विसेज की कुल वैल्यू को कहते हैं GDP. इसके जरिए पता चलता है कि कृषि से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, गैस सप्लाई, माइनिंग, होटल, कंस्ट्रक्शन, रियल एस्टेट, इंश्योरेंस सेक्टर ने कैसा परर्फॉर्म किया है.
जीडीपी में गिरावट के पीछे कई वजह हो सकती हैं- जैसे इंडस्ट्रियल स्लो डाउन या इंवेस्टमेंट की मांग में नरमी. जीडीपी का सबसे बड़ा हिस्सा प्राइवेट कंजंपशन से आता है, मतलब जो आम लोग खर्च करते हैं. लेकिन महंगाई और नौकरी की कमी की वजह से आम आदमी के खर्चे में गिरावट आई है.
अब आप में से कोई कह सकता है कि तो सरकार क्या करे. सरकार चाहे तो पेट्रोल-डीजल के बढ़े हुए दाम को कम कर सकती है. पिछले दो सालों से देश के लोग विकास की उम्मीद में 100 रुपए लीटर के करीब पेट्रोल खरीद रहे हैं.
सरकारी तेल कंपनियां फायदे में हैं, लेकिन आम आदमी नुकसान में. इकनॉमी तब ही ग्रो करेगी जब आम लोगों के हाथ में भी पैसा होगा. पैसा होगा तो लोग ज्यादा चीजें खरीदेंगे, खर्च करेंगे. साथ ही सरकार को जीएसटी रेट पर भी काम करना होगा, कंफ्यूजन और बढ़े हुए टैक्स कम करने चाहिए. सरकारी इनवेस्टमेंट को भी बढ़ाना होगा. ऐसे कई रास्ते हैं जिसकी जरूरत है, नहीं तो पॉपकॉर्न की तरह जनता का गुस्सा भी फूट सकता है. फिर लोग पूछेंगे जनाब ऐसे कैसे?