Members Only
lock close icon
Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Politics Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019CM बनने से CM पद छोड़ने तक...उद्धव ठाकरे की गलतियां भरमार, आखिर में चली गई सरकार

CM बनने से CM पद छोड़ने तक...उद्धव ठाकरे की गलतियां भरमार, आखिर में चली गई सरकार

शिवसेना के लोग इस बात से परेशान थे कि उद्धव ठाकरे उन्हें केंद्र के चंगुल से बचा नहीं पा रहे हैं

विष्णु गजानन पांडे
राजनीति
Updated:
<div class="paragraphs"><p>फोटो- ians</p></div>
i
null

फोटो- ians

advertisement

शिवसेना (Shivsena) प्रमुख तथा महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के इस्तीफे के साथ ही महाराष्ट्र के नाटकीय राजनीतिक (Maharashtra Political Drama) घटना क्रम का पहला अंक समाप्त हो गया है. देखना यह है कि एक राजनेता के रूप में उद्धव ठाकरे कितने परिपक्व हैं और उनकी इस वक्त की राजनीतिक पराजय के क्या कारण हो सकते हैं.

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना ने 2014 में साथ मिलकर सरकार बनायी थी लेकिन इस सरकार के साथ उद्धव ठाकरे के संबंध मधुर नही थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार में शामिल शिवसेना के मंत्री खुलेआम कहते फिरते थे कि वे अपना इस्तीफा जेब में लेकर घूमते हैं.

इससे पहले तक BJP- शिवसेना गठबंधन में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में रहता था लेकिन 2014 में स्थिति बदल गई और BJP मजबूत होकर उभरी. शिवसेना को यह बात पसंद नहीं आ रही थी. 2019 के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चित्र लगाकर BJP- शिवसेना गठबंधन ने मतदाताओं से कौल मांगा था. चुनाव के बाद अचानक उद्धव ठाकरे की ओर से यह कहा गया कि दोनों दलों के बीच ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद बांटने का समझौता हुआ था.

BJP ने इस बात से इनकार किया कि दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं के बीच इस तरह का कोई समझौता हुआ था. इस बात को उद्धव ठाकरे ने प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया और चुनाव पूर्व गठबंधन से नाता तोड़ लिया.

इसी दरमियान देवेंद्र फडणवीस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बागी नेता अजीत पवार के साथ अल्पजीवी सरकार बनाने का प्रयोग किया जो बुरी तरह विफल रहा. इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच NCP नेता शरद पवार और कांग्रेस में बातचीत चल रही थी तथा इसमें BJP मुक्त सरकार के लिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने की तैयारी दर्शायी गई.

शिवसेना की छवि कट्टर हिंदुत्ववादी दल के रूप में थी जो कांग्रेस और NCP को स्वीकार्य नहीं थी.एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार कर कांग्रेस को मनाया गया. अंततः परस्पर वैचारिक- सैद्धांतिक मतभेद रखने वाले तीनों दलों ने मिलकर ‘महाविकास आघाडी’ सरकार बनाई.

BJP ने इस फैसले को जनता के कौल के साथ विश्वासघात बताया. उद्धव के इस निर्णय से वे मतदाता भी खुश नहीं थे जिन्होंने BJP- शिवसेना गठबंधन को वोट दिया था. जनता के बीच यह संदेश गया कि जिस कट्टर हिंदुत्व की शॉल ओढ़ कर शिवसेना जनता के बीच घूमती थी, उस शॉल को उसने NCP और कांग्रेस के कहने पर फेंक दिया.

उद्धव की गलतियां

''कार्यकर्ताओं को वक्त नहीं देते थे''

कोरोना काल और उसके बाद भी ठाकरे की छवि जनता के बीच घुलने मिलने वाले नेता की नहीं रही. शिवसेना के बागी विधायकों का नेतृत्व कर रहे एकनाथराव शिंदे का कहना है कि शिवसेना के विधायकों और नेताओं को मुख्यमंत्री ठाकरे से मिलने नहीं दिया जाता था. जनता और अपनी पार्टी के विधायकों से सीधा संपर्क ना होना एक राजनेता के रूप में ठाकरे के लिए आत्मघाती साबित हुआ.

हिंदुत्व के एजेंडे से पीछे हटना

शिवसेना को पालघर में दो साधुओं की ‘मॉब लिंचिंग’ के मामले में ढीला ढाला रवैया अपनाने, मस्जिदों पर लाउडस्पीकर हटाने, अमरावती से सांसद नवनीत राना और उनके विधायक पति को हनुमान चालीसा पढ़ने से रोकने के लिए की गई उठापटक, तथा उन्हें हिरासत में भेजने के मामले, अभिनेत्री कंगना रानावत के घर में तोड़फोड़,छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ ताउम्र युद्ध करने वाले और बाद में उनके पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज को कैद कर उनको तड़पा तड़पा कर मारने वाले मुगल शासक औरंगजेब की कब्र पर एआईएमआईएम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी द्वारा की गई बात, इबादत के मामले में भी ठाकरे की नीति से लोग नाखुश थे. उनकी अपनी पार्टी के लोग इस रुख को नापसंद करते थे.

ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT

सरकार शिवसेना की, राज NCP-कांग्रेस का?

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष नीतियों को चाहे- अनचाहे में मानकर उद्धव ठाकरे कमजोर प्रशासक के रूप में सामने आए.

शिवसेना से बगावत करने वाले मंत्रियों और विधायकों का कहना था कि NCP और कांग्रेस के मंत्रियों के पास ‘मलाईदार’ विभाग थे। वित्त मंत्री अजित पवार इन विधायकों को विकास निधि नहीं देते थे. विधायक इस बात से दुखी थे कि जब हम अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास काम ही नहीं कर पाएंगे तो आखिर जनता के सामने किस मुंह से जाएंगे?

इन सब बातों से यही साबित हो रहा था कि उद्धव ठाकरे एक कठपुतली मुख्यमंत्री हैं जिसकी बागडोर शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार के हाथों में है. प्रशासनिक अनुभवहीनता और प्रशासन पर पकड़ बनाने में असफलता भी ठाकरे को महंगी पड़ी है.

केंद्र के शिकंजे से अपनों को बचा नहीं पाए उद्धव

शिवसेना के मंत्री, विधायक, सांसद और नेता प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य केंद्र जांच एजेंसियों के द्वारा उनके खिलाफ की जा रही कार्रवाई से परेशान थे. वे शायद इस बात से सबसे ज्यादा परेशान थे कि मुख्यमंत्री ठाकरे उन्हें केंद्र के चंगुल से बचा नहीं पा रहे हैं.

ठाकरे सरकार में शामिल मंत्री अनिल परब के खिलाफ भी जांच जारी है जबकि बागी विधायकों में प्रताप सरनाईक, शिवसेना नेता यशवंत जाधव, अर्जुनराव खोतकर, सांसद भावना गवली सीडी के रडार पर हैं. पार्टी के प्रवक्ता संजय राऊत भी आर्थिक अनियमितता और जमीन खरीदी के मामले में ईडी द्वारा पूछताछ के लिए बुलाए गए थे.

खुद संजय राऊत का कहना है कि बागी विधायकों में से कम से कम 17 या 18 विधायक ईडी के निशाने पर है. इन विधायकों को अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए उद्व ठाकरे से बड़ी उम्मीद थी लेकिन ठाकरे यहां भी विफल ही साबित हुए.

संजय ने और बढ़ाई खाई

बागी विधायकों और नेताओं को अजीत पवार और उनकी अपनी पार्टी के प्रवक्ता तथा राज्यसभा सांसद संजय राउत से सबसे ज्यादा नाराजगी है. राऊत अपने बड़बोलेपन के कारण सेना और BJP के बीच इतनी लंबी खाई खोद चुके हैं कि उसे पाटना नामुमकिन हो गया है.

विधान परिषद चुनाव के बाद पहले सूरत और बाद में गुवाहाटी गए बागी विधायकों के लिए राऊत ने जिस भाषा तथा शब्दों का प्रयोग किया है उसने आग में घी डालने का काम ही किया. ठाकरे ने कभी भी राऊत को रोकने की कोशिश नहीं की और इस तरह पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर ही नजर आयी.

रणछोड़ उद्धव

पिछले कुछ दिनों में मिले राजनीतिक अवसरों को भुनाने में भी उद्धव विफल रहे. मुख्यमंत्री के शासकीय निवास ‘वर्षा’ को छोड़ने का निर्णय ऐसा ही बचकाना कदम था. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुख्यमंत्री पद और विधान परिषद के सदस्य से इस्तीफा देने का फैसला भी एक परिपक्व राजनेता का फैसला नहीं था. एक मंजा हुआ राजनेता विधान सभा का सामना करता, अपनी बात रखता, विपक्ष को चार बातें सुनाता और बाद में इस्तीफा देने के लिए राज्यपाल के पास चले जाते.

ठीक उसी तरह जिस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद में अपनी बात कहने के बाद यह कहकर चले गए थे कि मैं इस्तीफा देने के लिए राष्ट्रपति महोदय के पास जा रहा हूं.

मुख्यमंत्री के नाते उद्धव ठाकरे टेलीविजन और रेडियो पर भी अपनी बात कह सकते थे लेकिन उन्होंने यह मौका भी गंवा दिया. इस्तीफा देने का निर्णय भी उन्होंने जल्दबाजी में लिया. उन्होंने NCP प्रमुख शरद पवार से चर्चा किए बिना ही यह निर्णय लिया. इस बारे में NCP नेता जयंत पाटिल का कहना है कि ठाकरे ने इस्तीफे के बारे में शरद पवार से कोई बातचीत नहीं की.

राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन एक कुशल मंजा हुआ नेता परिस्थितियों से हार नहीं मानता है और विपरीत हालात में भी खुद को और पार्टी को उबारने के लिए संघर्षरत रहता है. कुल मिलाकर उद्धव ठाकरे इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे. आज उनकी स्थिति यह है कि वह दीन (''हिंदुत्व'') के भी नहीं रहे और दुनिया (जनता) के भी नहीं रहे हैं.

(विष्णु गजानन पांडे महाराष्ट्र की सियासत पर लंबे समय से नजर रखते आए हैं. वो दैनिक हिंदी लोकमत समाचार, जलगांव संस्करण का रेजिडेंट एडिटर रह चुके हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और उनसे क्विंट का सहमत होना जरूरी नहीं है)

Become a Member to unlock
  • Access to all paywalled content on site
  • Ad-free experience across The Quint
  • Early previews of our Special Projects
Continue

Published: 30 Jun 2022,08:13 PM IST

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT