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बिहार चुनावों में नरेंद्र मोदी और उनके विरोधियों के बीच हो रहे नकारात्मक प्रचार अभियान की कड़वाहट से राज्य के अधिकांश वोटरों का इन दोनों ही धड़ों से मोहभंग हुआ है. धीरे-धीरे इन दोनों ही विरोधी खेमों में एक-दूसरे के लिए काफी कड़वाहट आ गई है, जो जाहिर तौर पर लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है.
बदलाव के लिए ही सही, जब सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल अगले महीने बिहार दौरे पर हों, तो उन्हें चुनाव प्रचार का एक नया तरीका अपनाना चाहिए. उन्हें मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार में राज्य में आए सकारात्मक बदलावों के बारे में लोगों को बताना चाहिए.
पहली बात कांग्रेस पटना में आईआईटी की स्थापना पर कर सकती है. यह एक ऐसा मुद्दा है, जो निश्चित तौर पर युवाओं को अपील करेगा. 2008 में यूपीए-1 की सरकार ने बिहार को यह उपहार दिया था. अब यह आईआईटी बिहटा स्थित खुद के बड़े से कैंपस में ट्रांसफर हो गई है.
जनता दल (यूनाइटेड) के साथ मिलकर यह चुनाव लड़ रही कांग्रेस नीतीश कुमार को भी इस बात का श्रेय दे सकती है कि कैसे उन्होंने आईआईटी कैंपस के लिए बिहटा में ढेर सारी भूमि उपलब्ध कराई.
इसके अलावा जब राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले चंपारण के रामनगर से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की थी, तब उन्हें यह बात प्रमुखता से बतानी चाहिए थी कि कैसे यूपीए की सरकार ने चंपारण में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना में अपना योगदान दिया था.
उनका भाषण लिखने वाले को, या बिहार कांग्रेस के नेताओं को उन्हें बताना चाहिए था कि यूपीए की सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम पांच वर्षों में बिहार में एक नहीं, बल्कि दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों (दूसरा विश्वविद्यालय गया में) की स्थापना की थी.
राहुल लोगों को यह भी बता सकते थे कि उनकी सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में बिहार को एक आईआईएम भी दिया था. बोध गया में स्थित इस आईआईएम में पढ़ाई-लिखाई भले ही अभी पिछले साल ही शुरू हुई है, लेकिन इसकी स्थापना का काम यूपीए सरकार के अंतिम दिनों में ही शुरू हो गया था.
सोनिया गांधी को बिहार के मतदाताओं को यह भी बताना चाहिए कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार ने किशनगंज में, जहां अच्छी-खासी संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की एक शाखा की स्थापना की थी.
एएमयू की इस शाखा के लिए जमीन जुटाने में नीतीश कुमार ने भी काफी मेहनत की थी, इसलिए उन्हें नीतीश को भी क्रेडिट देने में कंजूसी नहीं दिखानी चाहिए.
इस तरह के सकारात्मक प्रचार अभियान से न सिर्फ मतदाताओं में अच्छा संदेश जाएगा, बल्कि महागठबंधन के नेताओं के पास अपने प्रतिद्वंदी एनडीए के नेताओं के मुकाबले बताने के लिए कहीं ज्यादा उपलब्धियां होंगी. यह सकारात्मक प्रचार अभियान राज्य में विकास के मुद्दे पर एक तगड़ी बहस को जन्म दे सकता है.
जाति के जटिल मुद्दे पर शोर-शराबा करने की बजाय बहस इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि राज्य या केंद्र सरकारों ने वाकई में बिहार को पटरी पर लाने के लिए कुछ किया है या यह सब सिर्फ जुमलेबाजी है.
किन मुद्दों पर बात कर सकती है कांग्रेस?
- यूपीए के शासनकाल में बिहार की राजधानी पटना में 2008 में आईआईटी की स्थापना हुई, जिसे बाद में बिहटा शिफ्ट कर दिया गया
- यूपीए के शासनकाल में ही बिहार को दो केंद्रीय विश्वद्यालय मिले, एक चंपारण में और दूसरा गया में
- बोध गया में यूपीए के ही शासनकाल के दौरान आईआईएम की आधारशिला रखी गई
- किशनगंज में यूपीए के ही शासन के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की एक शाखा की स्थापना की गई
- इनके अलावा कांग्रेस अपनी विद्युतीकरण की योजनाओं का भी उल्लेख कर सकती है, जिन्होंने बिहार की तस्वीर बदलने में मदद की
कांग्रेस मतदाताओं को यह भी बता सकती है कि कैसे उसके शासनकाल के दौरान राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजना के अंतर्गत राज्य में हजारों किलोमीटर पुराने बिजली के तारों को नए तारों से बदला गया और नए ट्रांसफॉर्मर लगाए गए.
भले ही हाल में इस प्रॉजेक्ट का नाम राजीव गांधी से बदलकर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रख दिया गया हो, बिजली की भारी कमी से जूझ रहे लोगों के मन में इस क्षेत्र में नीतीश के किए कामों की याद ताजा होगी.
यह भी एक सच्चाई है कि नीतीश ही वह शख्स थे जिन्होंने तीन साल पहले यह कसम खाई थी कि यदि बिजली की हालत में सुधार नहीं हुआ तो वह वोट मांगने नहीं जाएंगे. कांग्रेस को यूपीए के बिजली सुधार कार्यक्रमों की बात करते हुए बिहार के दूर-दराज के इलाकों में बिजली पहुंचाने के लिए नीतीश (जो खुद बिहार कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग, अब एनआईटी पटना, से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं) को भी क्रेडिट देना चाहिए.
आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के अलावा शिक्षा, एनआईएफटी, चाणक्य लॉ कॉलेज, चंद्रगुप्त इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट जैसे नए कॉलेजों की बात कर कांग्रेस निराश हो चुके युवाओं के मन में आशा की एक लकीर खींच सकती है. ये वही वोटर हैं जो लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी नेताओं के रोजगार की बारिश करने के बड़े-बड़े वादों पर उनके साथ हो चले थे.
यदि महागठबंधन इन चुनावों में जीत चाहता है, तो उसके पास यही समय है जब वह इस सेक्शन के वोटरों को एनडीए के पाले से अपने पाले में खींच सकता है. लेकिन इसके लिए उन्हें नरेंद्र मोदी की नकल उतारने की जरूरत नहीं है, जो हर चुनाव अभियान में जनता से पूछते हैं कि; ‘बिजली आई?’, और जब जनता इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं देती तो शर्मिंदा हो जाते हैं.
कांग्रेस और नीतीश कुमार को लंबे-चौड़े वादे करने की बजाय अपनी उपल्धियों पर बात करनी चाहिए.केवल कुछ समय के लिए जाति की राजनीति से उपर उठिए और एक सकारात्मक बहस को जन्म दीजिए.
(लेखक बिहार में पत्रकार हैं)
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