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पहलवानों का विरोध और पुरुष प्रधान समाज को चुनौती: सरकार की क्या जिम्मेदारी है?

विरोध प्रदर्शन उस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है, जिसने हमारे पहलवानों से उनका अधिकार छीन लिया है.

संत राम अंतिल
नजरिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>नई दिल्ली में विरोध मार्च के दौरान WFI चीफ बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी की मांग करते पहलवान.</p></div>
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नई दिल्ली में विरोध मार्च के दौरान WFI चीफ बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी की मांग करते पहलवान.

(फोटो- पीटीआई)

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पहलवानों का विरोध प्रदर्शन (Wrestlers Protest) समकालीन भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना है. यह हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय और ओलंपिक स्तर के एथलीटों के सबसे लंबे विरोध प्रदर्शनों में से एक है. इसके जरिये खेलों में महिलाओं के प्रति सरकार के पुरुष प्रधान रवैये को चुनौती दी गई है.

पहलवानों ने 15 जून तक सभी गतिविधियों को स्थगित करने का फैसला किया है. आइये पिछले चार महीनों के विरोध प्रदर्शनों पर एक नजर डालते हैं और हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में लेखक के अपने फील्डवर्क के नतीजे के आधार पर जानने की कोशिश करते हैं कि प्रदर्शन करने वाले पहलवानों का देश पर क्या असर पड़ा है.

पहलवानों के विरोध का असर और नतीजा

नई दिल्ली में जनवरी के अंत में शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने BJP सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रमुख बृजभूषण शरण (Brij Bhushan Sharan Singh) सिंह की तरफ सबका ध्यान खींचा, जो ट्रेनी खिलाड़ियों के साथ ‘लोहे के हाथ’ से पेश आने के लिए मशहूर हैं. राष्ट्रीय और वैश्विक टूर्नामेंटों में उनकी सर्वशक्तिमान भूमिका और सबकुछ नियंत्रण में रखने के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं. कुछ लोग यह कहते हुए कि नेतृत्व के लिए यह ‘जरूरी’ है, ऐसे तौर-तरीकों का बचाव भी करते हैं.

विरोध प्रदर्शन को भारी समर्थन के बावजूद बृजभूषण के खिलाफ कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं हुई है. वो इस दौरान बैठकों में भाग लेते रहे और सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखते रहे.

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ (IOA) द्वारा WFI की मान्यता खत्म किए जाने के खतरे, और खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ लंबी बातचीत के बाद पहलवान 15 जून 2023 तक विरोध प्रदर्शन स्थगित करने पर सहमत हुए हैं.

महिला कुश्ती का अतीत, वर्तमान और भविष्य

ज्यादा पुरानी बात नहीं में है जब भारत ने कुश्ती में अपना पहला ओलंपिक पदक जीतने का जश्न मनाया था. साक्षी मलिक (Sakshi Malik) ने, जो उस समय एक तरह से अनजाना नाम थीं, 2016 में रियो ओलंपिक (Rio Olympics) में महिला कुश्ती में भारत के लिए पहला ओलंपिक पदक जीता था. गीता फोगाट (Geeta Phogat) की 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक की जीत ने भारत (खासतौर से हरियाणा में) में कुश्ती क्रांति की शुरुआत की. साक्षी मलिक के ओलंपिक पदक ने क्रांति की सफलता की पुष्टि की.

अपेक्षाकृत छोटे इतिहास (महिला कुश्ती को 2004 एथेंस ओलंपिक में शुरू किया गया था) के बावजूद महिला कुश्ती 1990 के दशक के अंत से ही स्थानीय दंगलों का हिस्सा रही है. साक्षी मलिक से पहले गीता फोगाट थीं; गीता से पहले अलका तोमर थीं और इससे भी पहले सोनिका कालीरमन.

महिला पहलवानों की इन ‘कामयाबी की कहानियों’ में प्रतिरोध का इतिहास रहा है, और जंतर-मंतर पर पहलवानों का विरोध प्रदर्शन उनका अपने शरीर पर अधिकार और अपना अधिकार वापस पाने की दिशा में एक कदम है.

अखाड़ों में महिलाओं के दाखिले ने ‘पुरुष-प्रधान’ माहौल को निश्चित रूप से प्रभावित किया है. महिला पहलवानों ने अपने लिए जगह हासिल करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा; सबसे पहले अपने घरों में, फिर अखाड़ों में और अब राष्ट्रीय स्तर पर.

इसका एक बड़ा उदाहरण धरना स्थल पर ही देखा जा सकता है, जहां विरोध करने वाले पहलवानों ने अपने प्रशिक्षण से कोई समझौता नहीं किया और उन्हें वर्जिश करते, वेट ट्रेनिंग में सुधार करते, दौड़ते और स्ट्रेचिंग करते देखा जा सकते था. दूसरे लफ्जों में वे अपने हालात के खिलाफ लड़ रहे थे, लेकिन साथ-साथ अपना रुटीन जारी रखे हुए थे- बेपरवाह.

उनका निजी संघर्ष हर बाधा को पार कर गया, मगर इंसाफ के लिए लड़ाई एक कठिन लड़ाई है और उनके हौसले की परीक्षा ले रही है. इसके अलावा नतीजा लाने का बहुत ज्यादा दबाव था. “मुझे पता था कि अगर मैं मेडल नहीं जीती, तो मैं खत्म हो जाउंगी.” यह बात वार्ताकारों में से एक महिला पहलवान ने बताई थी.

हरियाणा में विरोध स्थल पर कड़ा संदेश देता एक पोस्टर.

(सौजन्य: संत राम अंतिल/ द क्विंट)

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हरियाणा में विरोध प्रदर्शनों पर मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई

अकेले सोनीपत में 200 से ज्यादा महिला पहलवानों के साथ तीन कुश्ती अकादमियां सिर्फ महिला पहलवानों के लिए हैं.

एक महिला पहलवान ने मुझे बताया, “मैं साक्षी से प्रेरित थी जिन्होंने सभी बाधाओं को पार करते हुए ओलंपिक मुकाबले में पदक जीता था. जब भी कोई मुझे कुश्ती से हतोत्साहित करता है, मैं हमेशा YouTube पर उस 12 मिनट के वीडियो को देखती हूं. हालांकि जब आप टीवी पर अपने चैंपियन को इस तरह घसीटे जाते देखते हैं और वे अपना मेडल गंगा में फेंकने का फैसला करते हैं, तो सोचना पड़ता है कि हम क्या कर रहे हैं.”

पहलवानों के विरोध प्रदर्शन पर कठोर कार्रवाई से हरियाणा में कुश्ती बिरादरी में बहुत खराब असर गया, जो राज्य में महिला पहलवानों के प्रशिक्षकों और दूसरे रिश्तेदारों के साथ हुई बातचीत से साफ है. कई ने अपनी बेटियों को कुश्ती अकादमियों से वापस बुला लिया है. कई लोगों का मानना है कि विरोध प्रदर्शन से राज्य और महिला पहलवानों की छवि धूमिल हुई है.

प्राइवेट एजेंसियां: पहलवानों के लिए वरदान या अभिशाप?

अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान पहलवानों द्वारा उठाए गए तमाम मुद्दों में फंडिंग, राज्य फेडरेशन पर WFI का नियंत्रण, जिंदल साउथ-वेस्ट फाउंडेशन (JSW) और ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट (OGQ) जैसे निजी प्रायोजकों का प्रभाव और पहलवानों की गतिविधियों की निगरानी शामिल हैं.

साल 2021 में WFI ने JSW और OGQ के साथ एक त्रिपक्षीय व्यवस्था बनाई थी, जो उन्हें WFI की इजाजत से किसी भी पहलवान के साथ कॉन्ट्रैक्ट करने की अनुमति देता है. निजी संगठन ओलंपिक पदक जीतने की ‘क्षमता और संभावना’ रखने वाले ‘उभरते’ पहलवानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट कर सकते हैं.

JSW और OGQ पहलवानों को फिजियोथेरेपिस्ट, न्यूट्रीशनिस्ट, पर्सनल कोच, यात्रा खर्च, इक्विपमेंट, फूड सप्लीमेंट वगैरह मुहैया मदद करते हैं. हालांकि टोक्यो ओलंपिक के बाद WFI और प्राइवेट प्रायोजकों के बीच संबंध खराब हो गए.

साल 2022 में WFI अध्यक्ष ने एक इंटरव्यू में कहा कि OGQ और JSW निजी प्रायोजक ‘पहलवानों को बिगाड़ रहे हैं.’ WFI ने इन स्वतंत्र संगठनों के कामकाज पर अपनी पकड़ कड़ी की और टोक्यो ओलंपिक के फौरन बाद निजी संस्थाओं की तरफ से दिए गए इंटरनेशनल कोच भी हट गए.

कई पहलवानों और कोचों का मानना है कि ऐसे संगठनों का आना उनके लिए सही है क्योंकि वे पेशेवर और कुशल प्रशिक्षण देते हैं. संगठन की स्पॉन्सरशिप हासिल करने वाले एक नौजवान पुरुष पहलवान ने कहा, “मेरे पिता एक दूधवाले हैं; मेरे पदक के बाद OGQ और JSW जैसी कंपनियों ने बहुत मेरा साथ देकर काफी मदद की, जो मैं खुद नहीं कर सकता था.” दूसरी तरफ बहुत से लोग इन संगठनों को शक की नजर से देखते हैं.

पहलवानों के एक रिश्तेदार ने मुझे बताया, “मैं इन निजी कंपनियों को पसंद नहीं करता, क्योंकि वे शुरुआती तौर पर किसी भी पहलवान की मदद नहीं करते हैं, और वे आपको तभी साइन करते हैं जब आप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ उपलब्धि हासिल करते हैं. हालांकि, साथ ही यह नौजवान पहलवानों को ऐसी कंपनियों की तरफ से कॉन्ट्रैक्ट किए जाने के लिए कड़ी मेहनत करने को प्रेरित करता है ताकि वे भी ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन कर सकें. यह कामयाबी की एक सीढ़ी है.”

हरियाणा की ‘खेल नर्सरी स्कीम 2022-23’ में सरकार खिलाड़ियों को अंडर-15 के लिए 1500 रुपये महीना और अंडर-20 के ट्रेनी के लिए 2000 रुपये देने के लिए शिक्षा संस्थानों (निजी और सरकारी) की मदद कर रही है. इस योजना का हवाला देते हुए एक रिश्तेदार ने हंसते हुए कहा, “मेरे 16 साल के बेटे के लिए दूध का खर्च ही लगभग 10,000 रुपये महीना है.”

प्रमुख मुद्देः फंडिंग, पैसा, नौकरी

निजी और सरकारी संस्थाओं दोनों की तरफ से जमीनी स्तर पर बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, मगर यह विरोध प्रदर्शन उचित सुविधाओं की कमी, तालमेल, पारदर्शी कामकाजी माहौल और भारतीय खेलों को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं के बीच सत्ता के विकेंद्रीकरण की कमी को उजागर करता है.

ज्यादातर पहलवान गरीब घरों से आते हैं; खेलों के लिए शरीर के रखरखाव के लिए उन्हें आर्थिक मदद की जरूरत होती है. इसके अलावा, भारतीय कुश्ती की शैली और शारीरिक रखरखाव अभी भी पारंपरिक कुश्ती की शैली और शारीरिक रखरखाव में उलझी हुई है. इसे ध्यान में रखते हुए जमीनी पर मौजूदा कुश्ती के खेल की हकीकतों को स्वीकार करना होगा और पहलवानों को उनकी जरूरतों के हिसाब से मदद देनी होगी.

यह विरोध प्रदर्शन जमीनी स्तर पर पहलवानों की जरूरतों को समझने और इंसाफ के लिए उनके संघर्ष में उनका साथ देने में सरकार की नाकामी का नतीजा है. प्रदर्शन को दबाने से ज्यादा जरूरी है उनके सवालों को हल करना, चाहे वह सामाजिक हों या आर्थिक.

आंदोलनकारी पहलवानों की मांग सुन लेने भर से ही सरकार की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती. चाहे वह पुरस्कार वितरण राशि के बारे में हो या द्रोणाचार्य पुरस्कार राशि के बारे में, इस खेल में भागीदारी बनाए रखने और फलने-फूलने के लिए खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और परिजनों को उचित आर्थिक मदद दी जानी चाहिए.

(संत राम अंतिल शिव नाडर विश्वविद्यालय (SNU) में समाजशास्त्र विभाग में रिसर्च स्कॉलर हैं. वह फिलहाल एक ऐसी परियोजना में लगे हुए हैं जो एंथ्रोपॉजिकल फील्ड में खेल और शरीर के बीच संबंध खोजने का प्रयास करती है. यह एक ओपिनियन पीस. यहां जाहिर किए गए विचार लेखक के अपने हैं. द क्विंट न तो उनका समर्थन करता है और न ही उनके लिए जिम्मेदार है.)

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