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हाल के दिनों में एक के बाद एक कई चर्चित लोगों की खुदकुशी की खबरें आयी हैं. आध्यात्मिक गुरू भैय्यू जी महाराज, आईपीएस अफसर हिमांशु रॉय, सीएनएन के सेलिब्रिटी शेफ एंथनी बोरडैन और मशहूर फैशन डिजाइनर केट स्पेड - ये चारों अलग-अलग क्षेत्र के नामचीन चेहरे थे. इनमें से कोई भी आर्थिक संकट से नहीं जूझ रहा था. ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के कामयाब लोग थे. इसलिए यह कहना कि लोग आत्महत्या आर्थिक तंगी की वजह से या फिर करियर में नाकामी की वजह से करते हैं, एक गलत सोच है.
चारों उम्र के जिस पड़ाव में थे और कामयाबी के जिस मुकाम पर थे वहां पहुंचने के लिए उन्होंने कई मुश्किल चुनौतियां पार की होंगी. इसलिए यह कहना भी गलत है कि आत्महत्या करने वाले कमजोर होते हैं.
अपने जीवन में व्यक्ति एक साथ कई भूमिकाओं में होता है. पुत्र/पुत्री, भाई/बहन, पति/पत्नी, पिता/माता और दोस्त. कई अन्य भूमिकाएं कारोबार और प्रोफेशन से जुड़ी हुई होती हैं. जब किसी व्यक्ति की सांस टूटती है तो उसके साथ उन सभी रिश्तों को डोर भी टूट जाती है जिन्हें थामे वह जीवन के सफर पर चल रहा था. इसलिए मृत्यु दुख देती है. अगर मृत्यु की वजह खुदकुशी हो तो उस व्यक्ति के करीबी लोगों के दिल में गहरी टीस रह जाती है. वो सभी इस अफसोस को सीने में लेकर जीते हैं कि शायद थोड़ा सतर्क रहते तो वह उनके साथ होता.
आत्महत्या करने वालों के परिवार वाले जीवन का शेष सफर इसी अहसास के साथ पूरा करते हैं. मैंने कुछ करीबी लोगों को इस अहसास के साथ जीते देखा है. ऐसे ही मौकों पर लगता है कि पीड़ा को बयां करने में शब्दों की क्षमता कितनी सीमित है! कोई भी शब्द उन चीखों और सिसकियों को बयां नहीं कर सकता जो भीतर उठती हैं मगर बाहर नहीं निकल पातीं.
अगर आप अखबार पढ़ते हैं तो पाएंगे कि अमूमन हर रोज किसी न किसी की खुदकुशी की खबर छपी होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर 40 सेकेंड में दुनिया में एक व्यक्ति खुदकुशी करता है? WHO के आंकड़ों के मुताबिक विश्व में हर साल 8 लाख और भारत में 1.35 लाख लोग आत्महत्या करते हैं. कुछ अन्य संगठनों के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष खुदकुशी का आंकड़ा 2 लाख से ज्यादा है. मतलब यहां हर घंटे 20-25 लोग अपनी जान ले रहे हैं. समाज, जिसमें हम सभी शामिल हैं और सरकार की संवेदनहीनता देखिए कि इतनी बड़ी संख्या पर होने वाली मौतों पर हम खुलकर चर्चा भी नहीं करते हैं!
आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह तनाव, डिप्रेशन और मानसिक समस्याएं हैं. हमारे यहां डिप्रेशन समेत मानसिक समस्याओं को लेकर वैज्ञानिक नजरिया विकसित ही नहीं हो सका है. अगर कोई डिप्रेशन का शिकार है तो हम उसे कमजोर समझते हैं. अगर हम खुद डिप्रेशन का शिकार हैं तो उसके बारे में दूसरों को बताने से हिचकते हैं और उससे अकेले ही जूझते रहते हैं.
हमारी यह विकृत सोच डिप्रेशन के शिकार व्यक्ति को गहरे अवसाद से भर देती है. उसका डिप्रेशन बढ़ने लगता है. डिप्रेशन का शिकार कोई भी हो सकता है. अमीर और गरीब, आम और खास, मर्द और स्त्री, बच्चे, जवान और बुजुर्ग - कोई भी इसकी चपेट में आ सकता है. इसकी कोई भी वजह हो सकती है.
आर्थिक मोर्चे पर नाकामी, प्रेम में विफलता, विश्वासघात, अपराधबोध, किसी दमित इच्छा से उत्पन्न कुंठा, मां-बाप की महात्वाकांक्षा का बोझ, परिवार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने की हताशा, किसी बीमारी या कमजोरी से उत्पन्न निराशा, नशे की लत, कोई भी वजह ऐसी पीड़ा को जन्म दे सकती है जो व्यक्ति को गहरे अवसाद से भर दे. ऐसे में उसे मदद की जरूरत होती है. मदद नहीं मिलने पर मानसिक पीड़ा बढ़ती जाती है. व्यक्ति को धीमे-धीमे तोड़ने लगती है. यह संघर्ष भयानक होता है. बहुत से लोग इसे सह लेते हैं और खुद को एक प्रक्रिया के तहत बाहर निकाल लेते हैं.
लेकिन बहुत से ऐसे होते हैं जो हालात में उलझते चले जाते हैं और मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है. फिर किसी एक पल के भावनात्मक गुबार में वो आत्महत्या कर लेते हैं. यह भी मुमकिन है कि कोई व्यक्ति मानसिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ हो भावनाओं के किसी तेज आवेग में यह कदम उठा ले.
WHO रिपोर्ट के मुताबिक कई अमीर देशों में खुदकुशी की दर गरीब देशों से ज्यादा है. फिनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल देश है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है फिनलैंड दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां आत्महत्या दर सबसे अधिक है.
अमीर देशों में एक महिला की तुलना में तीन मर्द खुदकुशी करते हैं. लेकिन मध्य और कम आय वाले देशों में यह अनुपात 1.5 का है. यानी एक महिला की तुलना में 1.5 पुरुष खुदकुशी करते हैं. दुनिया में आत्महत्या मर्दों की हिंसक मौत का 50 प्रतिशत और औरतों की हिंसक मृत्यु का 71 प्रतिशत है. उम्र के मामले में आत्महत्या दर सबसे अधिक 70 साल से अधिक आयु के बुजुर्गों में है. जबकि 15 से 29 साल की उम्र के लोगों की मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है.
इसलिए अगर आप किसी गहरे अवसाद से गुजर रहे हैं तो किसी अपने से उसके बारे में बात कीजिए. यदि कोई आपका अपना अचानक गुमसुम रहने लगा हो तो आगे बढ़ कर उससे बात कीजिए. हो सकता है कि उसे मदद की जरूरत हो. युवाओं और बुजुर्गों का खास ख्याल रखिए. बच्चों पर अपने सपनों का बोझ मत लादिए.
खुद भी जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी मत ओढ़िए. दर्द बर्दाश्त करते रहना बहादुरी नहीं है. बहादुरी उसका समझदारी से मुकाबला करने में है.फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को देखिए. उन्होंने डिप्रेशन का डट कर मुकाबला किया है और आज कामयाबी की बुलंदी पर हैं. सच में जिंदगी से अधिक खूबसूरत कुछ भी नहीं.
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार उनके अपने हैं. इसमें क्विंट की सहमति होना जरूरी नहीं है.)
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