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भारतीय राजनीति का दिल कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में हमेशा ही सियासी हलचलें तेज रहती हैं, लेकिन इन दिनों यहां की सियासी हवा कुछ ज्यादा ही गर्म हो चली है. पिछले 12 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का अभेद्य किला बना यह राज्य अब उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. वजह बना है वही ब्राह्मण वर्ग, जो हमेशा से मुखर रहकर बीजेपी की जड़ें मजबूत करता आया है. ब्राह्मणों ने बीजेपी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन अब यही वर्ग पार्टी के लिए सिरदर्द बन रहा है. आखिर क्या है इस असंतोष की जड़, और कैसे यह 2027 के विधानसभा चुनाव को प्रभावित कर सकता है? आइए, इस सियासी ड्रामा को रोचक तरीके से समझते हैं.
यूपी में योगी आदित्यनाथ के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से सरकार पर ब्राह्मण वर्ग की उपेक्षा के आरोप लगाने शुरू हो गए थे, लेकिन हाल के महीनो में घटने वाली कुछ घटनाओं ने इस आरोप को और भी पुख्ता कर दिया.
यह बैठक बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की नियुक्ति के ठीक बाद हुई थी और बैठक की खबर बहार आते ही पंकज चौधरी ने विधायको को इस तरह की बैठकों से दूर रहने की नसीहत दे डाली. इस बैठक के बाद का घटनाक्रम और भी दिलचस्प है.
बैठक की खबरें मीडिया में फैलते ही योगी सरकार के एक विशेष अधिकारी ने कुछ विधायकों को फोन कर स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन इससे असंतोष और बढ़ गया. कुछ ब्राह्मण विधायकों ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की, और सोशल मीडिया पर #BrahminRevolt जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे.
यह मामल अभी चर्चा में ही था कि प्रयाग राज के माघ मेलें में मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ प्रशासन का विवाद हो गया. आरोप ये भी लगे कि शंकराचार्य के साथ रहने वाले ब्राह्मण बटुको की शिखा खींच कर उनकी खूब पिटाई की गयी. और इस घटना ने यूपी की राजनीति का पारा गर्म कर दिया.
इसके बाद जिस तरह से प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस देनी शुरू की तो फिर यह मामला सीधे सीधे शंकराचार्य बनाम योगी आदित्यनाथ हो गया और 'कालनेमि' वाले बयान के बाद ब्राह्मणों के प्रति योगी के रवैये को लेकर चल रहा असंतोष और भी मुखर हो गया.
इस पूरे घटनाक्रम ने बीजेपी की हिंदुत्व ब्रांड को नुकसान पहुंचाया साथ ही हिंदुत्व के ब्रांड बन चुके योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण विरोधी साबित करने के प्रयासों को भी खूब बल दिया.
यूपी की राजनीति अभी इस आग के घेरे में ही थी कि UGC ने नए नियमो ने आग में और घी डाल दिया, इस अधिनियम का विरोध भी सवर्ण जाति ने किया लेकिन उसमे भी ब्राहमण समाज ज्यादा मुखर रहा. सोशल मीडिया से ले कर विश्वविद्यालयों के कैपस तक ये आंच फैल गयी और उसकी लपेट में पूरी बीजेपी ही आ गयी.
यूपी की सत्ता और केंद्र की सत्ता के बीच तलवारें खींचने की खबरे हमेशा से चलती रही हैं लेकिन इन दो घटनाओं ने अमित शाह और योगी दोनों को अपने लपेटे में ले लिया है. मोदी खेमे में योगी की हार्डलाइन नीतियों से असंतोष है, जबकि योगी ठाकुर-ओबीसी गठजोड़ पर जोर दे रहे हैं. ब्राह्मण मुद्दे पर केंद्र अधिक समावेशी नीति चाहता है, लेकिन योगी की ओर से कोई नरमी नहीं दिख रही.
यूजीसी मामले में बीजेपी के तमाम नेताओं ने खुल कर बोलना शुरू कर दिया है और कई स्थानीय स्तर के नेताओं के इस्तीफे की झड़ी लग गई है.
लेकिन इसी बीच UGC के नए निर्देशों ने ब्राहमणों के तीर के निशाने पर नरेन्द्र मोदी को भी ले लिया. सियासी जानकारों का कहना है कि इस घटनाक्रम ने योगी को एक बड़ी राहत दी है और अब योगी समर्थक नरेन्द्र मोदी को सवर्ण विरोधी ठहराते हुए उनके खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं.
बीजेपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं नसे व्यक्तिगत बातचीत के दौरान इस परिस्थितियों पर चिंता साफ जाहिर होती है.
प्रदेश स्तर के एक पदाधिकारी ने तो यहां तक कह दिया कि अगर पार्टी कोई बड़ा कदम नहीं उठाती है तो यूपी में सत्ता में वापसी एक सपना ही रह जाएगा.
स्थिति बहुत दिलचस्प हो चली है. बीजेपी के दो सबसे बड़े ब्रांड बीजेपी के सबसे बड़े समर्थको के निशाने पर आ गए हैं. उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण आबादी करीब 10-12 प्रतिशत है, जो चुनावी गणित में निर्णायक साबित होती है. बीजेपी की 2014 ,2017 और 2022 की जीत में ब्राह्मणों का समर्थन अहम था, लेकिन अब वे खुद को सत्ता के गलियारों में हाशिए पर महसूस कर रहे हैं. प्रमुख पदों पर ठाकुरो के बढ़ाते वर्चस्व से ब्राह्मण विधायक और नेता अपनी अनदेखी की शिकायत कर रहे हैं.
पार्टी की अंदरूनी खेमेबाजी भी तेज हो चली है, यूजीसी मामले में प्रदर्शन के दौरान "I love You Yogi ji" के नारे सुनाई देते है और शंकराचार्य मामले में मोदी समर्थक ज्यादा मुखर हैं.
इन सबका योगी आदित्यनाथ पर क्या असर हो सकता है? योगी की छवि अब ब्राह्मण विरोधी के रूप में मजबूत हो रही है, जो उनके लिए राजनीतिक रूप से घातक साबित हो सकती है. पार्टी में उनके प्रतिस्थापन की चर्चाएं हैं, ताकि ब्राह्मणों को शांत किया जा सके. अगर यह विद्रोह जारी रहा, तो योगी की सत्ता पर खतरा मंडरा सकता है.
सनातन के समर्थको के बीच बंटवारा और सवर्णों के विद्रोह की खबरों के बीच यह चुनाव बीजेपी के लिए एक चुनौती बनता दिख रहा है. अगर पार्टी ब्राह्मणों को मनाने में सफल रही, तो जीत संभव है, लेकिन वर्तमान सियासी तपिश बताती है कि योगी को मुख्यमंत्री पद से हटाये बिना यह रास्ता आसान नहीं होगा.
नाम न छापने की शर्त पर पार्टी के एक वरिष्ठ ब्राह्मण पदाधिकारी कहते हैं कि अगर यूपी में मुख्यमंत्री अभी नहीं बदला गया तो नुकसान होना तय है.
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण कार्ड फिर से महत्वपूर्ण हो गया है और आने वाले दिनों में यह सियासी ड्रामा अभी और रोचक मोड़ ले सकता है.
(लेखक डा. उत्कर्ष सिन्हा उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह एक ओपिनियन पीस है, और ऊपर बताए गए विचार लेखक के अपने हैं. द क्विंट न तो इसका समर्थन करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)