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संडे व्यू: मस्क-मोदी और MAGA-MIGA, रणवीर इलाहाबादिया विवाद से सीख

पढ़ें इस रविवार प्रभु चावला, सुनंदा के दत्ता रे, नंदितेश निलय, अदिति फडणीस और करन थापर के विचारों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>पढ़ें इस रविवार प्रभु चावला, सुनंदा के दत्ता रे, नंदितेश निलय, अदिति फडणीस और करन थापर के विचारों का सार.</p></div>
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पढ़ें इस रविवार प्रभु चावला, सुनंदा के दत्ता रे, नंदितेश निलय, अदिति फडणीस और करन थापर के विचारों का सार.

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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मस्क-मोदी और MAGA-MIGA

प्रभु चावला ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि मस्क और मोदी एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं और दोनों के बीच कुछ भी समान नहीं है. दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने डोनेशन के जरिए राजनीति में प्रवेश किया है तो नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार लोकप्रिय जनादेश जीता है. लेकिन, दोनों में एक बात समान है- न्यूनतम शासन और न्यूनतम लागत पर अधिकतम शासन. अगर मोदी मेक इंडिया ग्रेट अगेन या MIGA जैसा कोई नारा गढ़ सकते हैं तो ट्रंप के MAGA या मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के विजयी ब्रांड से यह मेल खाता है. ऐसे में मस्क के अनोखे तरीकों के साथ आंशिक रूप से प्रयोग क्यों नहीं किया जाए?

प्रभु चावला लिखते हैं कि ट्रंप ने मस्क के अधीन एक नये विभाग की घोषणा का है जो सरकारी नौकरशाही को खत्म करेगा, अनावश्यक विनियमनों को कम करेगा, बेकार खर्चों में कटौती करेगा और संघीय एजेंसियों का पुनर्गठन करेगा. उद्देश्य 2 ट्रिलियन डॉलर बचाना है. यह रकम भारत की जीडीपी का करीब आधा है. निस्संदेह भारत को बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता है.

प्रधानमंत्री बार-बार “व्यापार करने में आसानी” के लिए बेहतर माहौल का वादा करते रहे हैं. मगर, कार्यपालिका अभी भी निर्णयों को तेजी से लागू करने में सबसे बड़ी बाधा है. लेखक बताते हैं कि पंडित नेहरू के समय 14 सदस्यीय मंत्रिमंडल का आकार बढ़ते-बढ़ते मोदी मंत्रिपरिषद तक यह 29 कैबिनेट मंत्री, 5 स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री और 36 राज्य मंत्री तक पहुंच चुका है. विभिन्न राज्यों को जोड़कर देखें तो मंत्रियों की संख्या 500 से ज्यादा हो जाती है. शायद मोदी मस्क के विध्वंसकारी मिशन से कोई आइडिया लें. विशेषज्ञों के अनुसार मोदी के सीईओ रहते भारत को 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए 15 मंत्रियों और 25 विश्वसनीय सिविल सेवकों या पेशेवरों से ज्यादा की जरूरत नहीं है.

झूठी चमक

सुनंदा के दत्ता रे ने टेलीग्राफ में लिखा है कि अगर भारत अमेरिकी हथियारों पर अरबों डॉलर बर्बाद करता है तो अमेरिका को इस पर आपत्ति करने की कोई जरूरत नहीं है. लेकिन, क्या भारत को वास्तव में अमेरिका के अबतक के सबसे महंगे रक्षा उत्पाद की जरूरत है? आम भारतीयों को अस्पताल और स्कूल, घर और पीने योग्य पानी ज्यादा जरूरी लग सकता है. यह शिखर सम्मेलन वैलेंटाइन डे सेल की तरह लग रहा है. दिल्ली के उपराज्यपाल ने राजधानी के निवर्तमान मुख्यमंत्री से कहा कि आम आदमी पार्टी “यमुना मां के अभिशाप” के कारण हारी है.

अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा है कि वे भी बहुत बड़े हैं. क्या उन्हें ईश्वर ने अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए बचाया था? नरेंद्र मोदी ने भी कहा था, “मुझे विश्वास है कि परमात्मा ने मुझे एक उद्देश्य के लिए भेजा है. एक बार उद्देश्य पूरा हो जाने पर मेरा काम पूरा हो जाएगा.“

सुनंदा के दत्ता रे पूछते हैं कि क्या उद्देश्य तब पूरा हुआ जब एक ‘देवता’ ने दूसरे को समृद्ध करने का वादा किया? ट्रंप ने विलाप किया, “भारत टैरिफ के कारण व्यापार करने के लिए बहुत कठिन जगह है.“ भारत को किसी विशेष रियायत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. ट्रंप ने अमेरिका में दुकान खोलने वालों को टैरिफ में छूट का वादा किया है. संभवत: इस वादे में ग्रीन कार्ड शामिल हैं जो किसी भी भारतीय दहेज में मिलने वाला इनाम है. भारत को लड़ाकू विमानों से ज्यादा ऐसे पानी की जरूरत है जो घातक विषाणुओं से प्रदूषित ना हो. अनुमान है कि 2030 तक किफायती आवास की कमी 31.2 मिलियन यूनिट तक पहुंच जाएगी. आज हजार बच्चों के बीच भी प्राथमिक विद्यालय नहीं होना निरक्षरता का प्रमुख कारण है.

भारत केवल अमेरिका, सिंगापुर और मालदीव को गोबर निर्यात करने मे ही दुनिया में अग्रणी नहीं है. भारत दुनिया का सबहसे बड़ा जनशक्ति निर्यातक भी है जो सबसे बड़े वैश्विक प्रवासी होने के अपने दावे को एक बहुत आकर्षक आयाम प्रदान करता है. मोदी का ‘मेक इंडिया ग्रेट अगेन’ का नारा ऑस्कर वाइल्ड की इस उक्ति की याद दिलाता है कि “अनुकरण, महानता के लिए औसत दर्जे की चापलूसी का सबसे सच्चा रूप है.”

रणवीर इलाहाबादिया विवाद से सीख

नंदितेश निलय ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि सेक्स, हिंसा, विचलित करने वाले दृश्य, भाषा, ग्राफिक सीक्वेंस, पैरेंटल एडवाइडरी जैसे शब्द आज स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर हर एपिसोड में स्क्रीन के ऊपरी बाएं कोने पर लिखा दिखता है. यदि आपको कुछ भी आपत्तिजनक या अपमानजनक लगता है तो इसका कोई इरादा नहीं है, यह सब आपके दिमाग में है. यह सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर है. रणवीर इलाहाबादिया और उनके भाइयों का समूह ताजा उदाहरण हैं. मजाकिया बनने की कोशिश में बच्चे, माता-पिता और सेक्स पर उनकी टिप्पणियां चर्चा में है. लाखों फॉलोअर्स में कुछ और जुड़ने की उम्मीद इसमें शामिल है. समर्थक कहते हैं; अगर आपको यह पसंद नही है तो स्विच ऑफ कर लें, अगले यू ट्यूब चैनल पर जाएं.

नंदितेश निलय ऑस्कर की याद दिलाते हैं कि कैसे तीन साल पहले प्रतिष्ठित अभिनेता विल स्मिथ मंच पर चढ़े और कॉमेडियन क्रिस रॉक को थप्पड़ जड़ दिया. उन्हें यह पसंद नही आया कि वे अपनी पत्नी जैडा पिंकेट स्मिथ के बारे में ‘उलजलूल’ बातें कर रहे थे. लेखक मानते हैं कि किंडरगार्टन से लेकर स्कूल और घर तक हमें अपने बच्चों को फोन बंद करने में मदद करनी चाहिए.

बच्चों को अपने माता-पिता के आचरण और विकल्पों को भी देखना चाहिए. हमारे बच्चे हमसे सीखते हैं - हम जिस तरह से रहते है और जिस तरह से बातें करते हैं, जिस तरह से हम विश्वास, देखभाल, जिम्मेदारी और सम्मान को महत्व देते हैं. ऐसे समाज में जहां ब्रांड ही सबकुछ है, क्या हम सम्मान, नैतिकता को अपने प्रोफाइल के मुख्य तत्व के रूप में ब्रांड कर सकते हैं? इन मुद्दों पर माता-पिता और बच्चों के बीच, माता-पिता और शिक्षकों के बीच, बच्चों और शिक्षकों के बीच कड़ी बातचीत की जरूरत है. हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि दर्शकों की अगली पीढ़ी को पता हो कि आने वाले समय में अशिष्टता को कैसे खारिज किया जाए.

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दिल्ली में नये मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं राह

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करने के साथ ही भारतीज जनता पार्टी लगभग 30 साल बाद सत्ता में लौटती दिखी. इस स्थिति पर बीजेपी के एक पदाधिकारी ने प्रतिक्रिया दी, “मजा आ गया...!” मगर, उस पदाधिकारी ने यह भी कहा कि धमाकेदार जीत के बाद भी नये मुख्यमंत्री की राह आसान नहीं होगी. उनका इशारा दिल्ली में जीत के बाद उभरने वाले नये सत्ता समीकरणों की तरफ था.

जब आपकी सरकार थी बीजेपी को राजधानी दिल्ली पर सख्ती से नियंत्रण रखने की जरूरत महसूस हो रही थी मगर अब उसकी अपनी सरकार और मुख्यमंत्री होंगे तब भी क्या उसके लिए ये अधिकार जरूरी रहेंगे? इस सवाल पर पर बहस होती रहेगी मगर इससे भी जरूरी सवाल यह है कि इतने सारे अधिकारों के स्वामी होकर भी क्या उपराज्यपाल दिल्ली के शासन-प्रशासन में अब नरम रुख अख्तियार करेंगे? एमसीडी फिलहाल आम आदमी पार्टी के नियंत्रण में है.

केंद्र के पास दो विकल्प हैं. पहला, वह एमसीडी भंग करे और नये चुनाव कराए और दूसरा, आयुक्तों के जरिए निगम चलाए. इससे सत्ता एक ही जगह केंद्रित हो जाएगी और आप सोचेंगे कि यही होना है तो एमसीडी के चुनाव कराए ही क्यों जाते हैं. आप 14 सीटों पर जितने वोटों से हारी है उससे ज्यादा वोट उन सीटों पर कांग्रेस को मिले हैं. केंद्र सरकार के समक्ष बीजेपी कमजोर दिखेगी तो आप बिना समय गंवाए उससे मुश्किल सवाल पूछना शुरू कर देगी.

लंदन अंडरग्राउंड की यादें

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि लंदन अंडरग्राउंड को सभी ट्यूब कहते थे क्योंकि यह ऐसा ही दिखता है. लेखक इस ट्यूब की तुलना टूथपेस्ट से करना अधिक उपयुक्त समझते हैं. जब लेखक 16 साल के थे तो पहली बार ट्यूब देखी थी. विक्टोरिया स्टेशन पर एयरपोर्ट कोच से उतरा था तो उन्हें सुरंग से निकलती ट्रेन टूथपेस्ट की तरह ही लगे थे. “हीथ्रो से कोच लें और फिर बॉन्ड स्ट्रीट तक ट्यूब लें”- यही निर्देश लेखक की बहन किरण ने दे रखा था. “मैं दूसरे छोर पर पहुंच जाऊंगी.”

करन थापर लिखते हैं कि बॉन्ड स्ट्रीट किरण के ऑफिस के आसपास था. लेखक के लिए लंदन नया था और उन्हें उत्साहित भी कर रहा था और चिंतित भी. लोगों की भीड़ चौंकाने वाली थी. सभी जल्दी मे लग रहे थे. लेखक को महसूस हो रहा था कि खराब फीटिंग वाले स्कूल ब्लेज़र में वह बाहरी व्यक्ति की तरह दिख रहे थे.

सुरंग की गड़गड़ाहट के साथ ट्रेन दिखी. हाथ दो बैग और भी लगेज, जिसे उठा पाना मुश्किल था. अगर टोपी पहने दाढ़ी वाले व्यक्ति ने मदद न की होती, जो अस्त-व्यस्त कपड़े में था, तो ट्रेन में चढ़ना मुश्किल होता. ट्रेन से उतरने को लेकर भी चिंता थी. मगर, उसी भले व्यक्ति ने उनकी मदद की जिनसे लेखक दूरी बनाए हुए थे. कभी लेखक की उस मददगार से दोबारा मुलाकात नहीं हुई. ऐसी घटनाएं यह मानने को विवश करती है कि लोग शायद ही कभी वैसे होते हैं जैसे वे दिखते हैं. और, हां, पहली धारणा बहुत गलत हो सकती है.

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