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शशि थरूर ने इंडियन एक्सप्रेस में महिला आरक्षण और परिसीमन के बीच छिपे संभावित राजनीतिक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं. वे लिखते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक सतही तौर पर महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में एक सकारात्मक कदम लगता है लेकिन इसके साथ जुड़ी परिसीमन की प्रक्रिया इसे एक ट्रोजन हॉर्स यानी छिपे हुए खतरे में बदल देती है. थरूर के अनुसार, इस कानून को लागू करने के लिए 2026 के बाद होने वाली नई जनगणना और परिसीमन का इंतजार जरूरी है, जिससे इसके लागू होने में देरी भी होगी और इसके राजनीतिक निहितार्थ भी गहरे होंगे.
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में डोनाल्ड ट्रंप केंद्रित लेख में उन्हें अमेरिकी लोकतंत्र और संस्थाओं के लिए एक विनाशकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है. गुहा लिखते हैं कि ट्रंप की राजनीति पारंपरिक लोकतांत्रिक मूल्यों से अलग है. वे संस्थागत नियमों, संवैधानिक मर्यादाओं और स्थापित राजनीतिक परंपराओं को अक्सर चुनौती देते हैं. उनके नेतृत्व में व्यक्तिगत सत्ता, आक्रामक राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा मिला है, जिससे अमेरिकी समाज में गहरे विभाजन पैदा हुए हैं. लेख में ट्रंप को अमेरिकी लोकतंत्र के लिए एक गहरे खतरे के रूप में चित्रित किया गया है. तर्क दिया गया है कि ट्रंप का राजनीतिक दृष्टिकोण संस्थाओं को कमजोर करने वाला है.
ट्रंप की राजनीति “पोस्ट-ट्रुथ” युग का प्रतिनिधित्व करती है, जहां तथ्यों से ज्यादा भावनाओं, राष्ट्रवादी नारों और गलत सूचनाओं का प्रभाव होता है. इससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है—लोग राजनीतिक रूप से दो धड़ों में बंट गए हैं, और संवाद की जगह टकराव ने ले ली है. विशेष रूप से 2020 के चुनावों के बाद ट्रंप द्वारा परिणामों को न मानना और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल है. इससे शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की परंपरा को झटका लगा, जो किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला होती है.
ट्रंप केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रतीक हैं—जहां मजबूत नेता की छवि, जनभावनाओं को भड़काने की रणनीति, और संस्थाओं को दरकिनार करने का रवैया प्रमुख होता है. यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह न केवल अमेरिका के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोकतंत्र की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है.
श्याम शरण ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों के कारण दुनिया भर के देश अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं. संकट के समय 'सुरक्षित निवेश' माने जाने वाले डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में भी निवेश घटा है. इसके विपरीत, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने रिकॉर्ड स्तर पर सोने की खरीदारी की है, जिससे सोने की कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गई हैं. अमेरिका का 36 ट्रिलियन डॉलर का भारी राष्ट्रीय कर्ज और रक्षा खर्च में वृद्धि उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रही है. इसके साथ ही, अमेरिकी शेयर बाज़ार में एक वित्तीय बुलबुला फूटने का जोखिम भी मंडरा रहा है.
हालांकि सीमित परिवर्तनीयता के कारण युआन को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनने में कुछ बाधाएं हैं. फिर भी, इन बदलावों से स्पष्ट है कि दुनिया एक 'बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था' की ओर बढ़ रही है, जिसमें विशेषकर एशिया में युआन की भूमिका प्रमुख होगी. निष्कर्ष यह है कि पश्चिम एशिया का यह संघर्ष न केवल भू-राजनीतिक समीकरण बदल रहा है, बल्कि डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को कम करके एक नई और बहुध्रुवीय आर्थिक प्रणाली की नींव भी रख रहा है.
अजय बिसारिया ने टाइम्स ऑफ इंडिया में डोनाल्ड ट्रंप और आसिम मुनीर के बीच उभरते रिश्ते और उसके भू राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण किया है. पाकिस्तान के सैन्य नेताओं का अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ नज़दीकी संबंध रखना कोई नई बात नहीं है. जनरल असीम मुनीर ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खुद को एक महत्वपूर्ण “मध्यस्थ” के रूप में स्थापित किया है. विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच हालिया वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका अहम रही, जहां इस्लामाबाद ने दोनों देशों के बीच बातचीत का मंच और कूटनीतिक चैनल उपलब्ध कराया.
बिसारिया लिखते हैं कि ट्रंप की व्यक्तिगत शैली मुनीर जैसे नेताओं के लिए अवसर पैदा करती है जहां वे संस्थागत कूटनीति से ज्यादा व्यक्तिगत रिश्तों और सौदों पर भरोसा करते हैं. इस रिश्ते में चापलूसी, व्यक्तिगत तालमेल और आपसी लाभ की भूमिका महत्वपूर्ण है. भारत के संदर्भ में लेखक मानते हैं कि भले ही पाकिस्तान की यह बढ़ती भूमिका भारत के लिए रणनीतिक चुनौती हो सकती है, लेकिन यदि इससे अमेरिका-ईरान या अन्य क्षेत्रीय तनावों में कमी आती है, तो यह भारत के लिए भी सकारात्मक हो सकता है. यानी, किसी भी प्रकार की शांति वार्ता अंततः क्षेत्रीय स्थिरता के लिए फायदेमंद है. लेख बताता है कि ट्रंप-मुनीर संबंध केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है, जिसमें पाकिस्तान फिर से एक अहम कूटनीतिक खिलाड़ी बनने की कोशिश कर रहा है. ॉ
पवन के. वर्मा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखे अपने लेख में लिखा है कि एक सभ्यतागत-राज्य को हराना क्यों मुश्किल है. उन्होंने एक 'राष्ट्र-राज्य' (Nation-State) और 'सभ्यतागत-राज्य' (Civilisational-State) के बीच के मूलभूत अंतर का विश्लेषण किया गया है. आधुनिक राष्ट्र-राज्य संधियों, युद्धों या उपनिवेशवाद के खत्म होने का परिणाम हैं, जिनकी केवल राजनीतिक सीमाएं तय होती हैं. इसके विपरीत, एक सभ्यतागत-राज्य हजारों वर्षों के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अनुभवों का एक निरंतर प्रवाह होता है. इसकी मूल पहचान भाषा, साहित्य, दर्शन और लोगों की साझी चेतना में बसती है.
अरब आक्रमणों के बावजूद ईरान ने अपनी भाषा (फारसी), साहित्य और कला को सफलतापूर्वक सहेज कर रखा. यही सभ्यतागत गहराई कारण है कि ईरान भारी आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य दबावों के बावजूद डटकर खड़ा है. अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश ताकत को केवल सैन्य और आर्थिक प्रभुत्व से तौलते हैं और सभ्यताओं की इस आंतरिक शक्ति व लचीलेपन को कम आंकने की भूल करते हैं. भारत और ईरान जैसे सभ्यतागत-राज्यों की जड़ें इतनी गहरी, शाश्वत और सनातन हैं कि बाहरी दबावों के बावजूद उनका अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता. अल्लामा इकबाल की पंक्तियों के अनुरूप, सदियों की दुश्मनी के बाद भी इन सभ्यताओं का अस्तित्व आज भी कायम है.