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राहुल गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि 3 फरवरी को संसद में और नवंबर 2024 में प्रेस कॉन्फ्रेन्स में उन्होंने बेचैनी जाहिर की थी. छोटे पैमाने की धोखाधड़ी नहीं बल्कि राष्ट्रीय संस्थानों पर कब्जा करने वाली इंडस्ट्रियल स्केल पर धांधली की बात वे कर रहे हैं. धांधली का स्तर इतना भयावह था कि इसे छिपाने के सभी प्रयासों के बावजूद बिना किसी गैर आधिकारिक स्रोत पर भरोसा किए आधिकारिक आंकड़ों से स्पष्ट सबूत सामने आए हैं.
दूसरे चरण में फर्जी मतदाताओं के साथ मतदाता रजिस्टर की बात राहुल गांधी ने लिखी है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दरम्यान महज पांच महीने में 41 लाख वोटरों की बढ़ोतरी पर उन्होंने सवाल उठाए हैं. रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या वयस्क आबादी से भी ज्यादा हो गई! तीसरे चरण में मतदान के आंकड़े बढ़ाने की बात राहुल गांधी ने लिखी है. शाम 5 बजे तक मतदान 58.22 प्रतिशत था. अगली सुबह अंतिम मतदान 66.05 प्रतिशत हो गया. 7.83 प्रतिशत की यह वृद्धि 76 लाख मतदाताओं के बराबर है. चौथे चरण में राहुल गांधी ने फर्जी मतदान से बीजेपी को ब्रेडमैन बना देने की बात लिखी है. उन्होंने लिखा है कि 85 निर्वाचन क्षेत्रों में 12 हजार बूथों को लक्ष्य बनाया गया. राहुल गांधी ने सबूतों को मिटाने के आरोप भी लगाया है.
राजनाथ सिंह ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि आतंकवाद पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है. यह मानवता, शांति, सहअस्तित्व, विकास और लोकतंत्र जैसे मूल्यों का शत्रु है. यह एक ऐसी कट्टर सोच का नतीजा है जो सिर्फ विनाश, भय और नफरत को जन्म देता है. इतिहास साक्षी है कि आतंकवाद हर दृष्टि से विध्वंसक है. यह भ्रम ही है कि कोई आतंकी स्वतंत्रता सेनानी हो सकता है. कोई भी मजहबी, वैचारिक या राजनीतिकरण आतंकवाद को जायज नहीं ठहरा सकता. आतंक की कोख से क्रांति नहीं, सिर्फ घृणा, बर्बादी और हताशा जन्म लेती है. कोई मानवीय उद्देश्य कभी भी खून-खराबे और हिंसा से हासिल नहीं किया जा सकता.
अब हम यह भेद भी नहीं करेंगे कि आतंकी राज्य प्रायोजित हैं या किसी संगठन से जुड़े हैं. जो देश आतंक को समर्थन देते हैं उन्हें अब सीधा जवाब दिया जा रहा है. लेखक ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि पाकिस्तान की परमाणु हथियारों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकने का खतरा मजबूत हो रहा है. वे नॉन स्टेट एक्टर्स के हाथ पहुंच सकते हैं. यह समस्त मानवता के लिए अत्यंत गंभीर खतरा है. इसलिए पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में लाया जाए. छद्म युद्ध की चुनौती को भी राजनाथ सिंह ने खतराक करार दिया.
करन थापर ने टेलीग्राफ में लिखा है कि उन्हें लगता था कि कांग्रेस शशि थरूर को अपनी अनमोल संपत्ति, मूल्यवान सदस्यों में एक और गौरव का स्रोत मानती है. लेकिन, ऐसा लगता है कि पार्टी उन्हें एक विद्रोही, शायद बागी या कम से कम एक शरारती व्यक्ति मानती है. ऐसा लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व को शशि पसंद ही नहीं है. इस रुख से कांग्रेस ने एक अवसर खो दिया है. लेखक सवाल करते है कि क्या यह ईर्ष्या है? क्या यह असुरक्षा हो सकती है? या फिर प्रतिद्वंद्विता? लेखक का मानना है कि कई स्तरों पर कई कांग्रेसी नेताओं के लिए शशि खतरा हैं. उनकी परिष्कृत शैली, वक्तृत्व कला इसकी वजह होगी. शशि जितने प्रतिभाशाली और लोकप्रिय हैं वे उन्हें प्रतिद्वंद्वी मान सकते हैं.
दूसरी बात यह है कि इससे देश में कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा नहीं हुई. कांग्रेस ने खुद के पैर पर गोली मारी जबकि शशि को ढेर सारी सहानुभूति मिली. कांग्रेस ने थोड़ी चालाकी से काम किया होता तो वह अपार सम्मान प्राप्त कर सकती थी. वह सरकार को चिढ़ाने का मजा भी ले सकती थी. लेखक सलाह देते हैं कि कांग्रेस प्रवक्ता कह सकते थे, “बीजेपी में कोई भी हमारा मुकाबला नहीं कर सकता. बीजेपी को पता है कि जब भारत की आवाज़ सुनाने की जरूरत होती है तो कांग्रेस की आवाज ही मायने रखती है. यही कारण है कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देश, अमेरिका, में प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व एक कांग्रेसी ने किया.” आखिर में करन थापर लिखते हैं कि शशि को नापसंद करने के चक्कर में कांग्रेस ने मौका गंवा दिया. मूर्ख कांग्रेस!
अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि कमल हासन सर्वाधिक 19 फिल्मफेयर अवार्ड जीत चुके हैं जिनकी सात फिल्मों को ऑस्कर की विदेशी भाषा कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया. वे अंग्रेजी और कन्नड़ सहित करीब आधा दर्जन भाषाएं बोलने में दक्ष हैं. मगर, कमल हासन राजनीति में भ्रमित हैं और चुनावी प्रदर्शन उनका कमजोर है. अब डीएमके की मदद से राज्यसभा के सदस्य बनने जा रहे हैं. उनकी मक्काल नीति माइम (एमएनएम) पूरी तरह विफल साबित हुई है. 2019 के लोकसभा चुनाव में एमएनएम को 3.7 फीसदी वोट मिले थे. 2021 के विधानसभा चुनाव में यह समर्थन घटकर 2.6 फीसदी रह गया. खुद कमल हासन कोयंबटूर दक्षिण की सीट बीजेपी से हार गये. एमएनएम को 2022 में तमिलनाडु के नगर निकाय चुनावों मे एक भी सीट नहीं मिली.
अपनी नीतियों से असहमत लोगों के लिए वह अपने गठबंधन साझेदार की मदद से थोड़ा हल्का संस्करण पेश करती है. एमएनएम उनमें से ही एक है. मरुलमलारची द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम यानी एमडीएमके जैसे दल भी हैं जो लिट्टे समर्थक रहे हैं. उन्होंने स्टालिन का कद बनाए जाने के विरोध में द्रमुक छोड़ दिया था लेकिन बाद में साथ आ गये. जनता कमल हासन को सुनना और देखना चाहती है. द्रमुक के लिए एक राज्यसभा के बदले यह समर्थन हासिल करना बहुत छोटी कीमत चुकाना है.
सुनन्दा के दत्ता रे टेलीग्राफ में लिखा है कि बांग्लादेश में मौजूदा घटनाओं का असर पाकिस्तान के मुकाबले भारत पर अधिक संभावित है. चीन से नजदीकी के बावजूद बांग्लादेश की भारत को नुकसान पहुंचाने की क्षमता सीमित है. बांग्लादेश में तेजी से घट रही हिन्दू आबादी के खिलाफ गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और युनूस शासन द्वारा भारत के प्रति सकारात्मक स्थानीय तत्वों के खिलाफ कार्रवाइयों से भारत को नुकसान हो सकता है. बांग्लादेश की ओर से सीमा टूटी तो भारत की ओर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रतिशोध संभव है. उपमहाद्वीप के हिन्दुओं और मुसलमानों के बारे में कोई भी सिद्धांत साबित करने के लिए दोनों पक्षों के पास पर्याप्त सबूत हैं.
नेहरू-लियाकत अली समझौते का जिक्र करते हुए लेखक ने बताया है कि इसका मकसद बदल दिया गया. शरणार्थियों को उनके मूल घरों में लौटने से रोकने, अपहृत महिलाओं की वापसी और लूटी गई संपत्ति की बहाली को बाधित करने की प्रवृत्तियां बढ़ीं. जबरन धर्मांतरण को प्रोत्साहन दिया गया और पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं पर और दबाव डाला गया. भारत में आए शरणार्थियों को भेदभाव का सामना करना पड़ा. लेखक ने पंडित नेहरू को उद्धृत किया है, “बहुसंख्यक की सांप्रदायिकता अल्पसंख्यक की सांप्रदायिकता से कहीं अधिक खतरनाक है.”
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