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अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पुरानी तस्वीर पोस्ट की, जिसमें युवा नरेंद्र मोदी लालकृष्ण आडवाणी के चरणों में बैठे हैं. सिंह ने भाजपा-आरएसएस की प्रशंसा की कि ये संगठन जमीनी कार्यकर्ताओं को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष पद तक पहुंचने का अवसर देते हैं. साथ ही, उन्होंने राहुल गांधी को संबोधित कर कांग्रेस में विकेंद्रीकरण और व्यावहारिक सुधारों की जरूरत बताई. इससे पार्टी में हलचल मच गई और सवाल उठा कि क्या सिंह पूछ रहे हैं—कांग्रेस भाजपा जैसी क्यों नहीं बन सकती?
लेख कांग्रेस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि याद दिलाता है—कमलापति त्रिपाठी जैसे नेता हिंदुत्व प्रतीकों के पैरोकार थे, जबकि मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकारों ने 1954 में नियोगी समिति गठित की और 1968 में धर्मांतरण-विरोधी कानून पारित किया. इसे 'नर्म हिंदुत्व' कहा जाता है, जो धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करता है. मुख्यमंत्री रहते (1993-2003) सिंह ने पंचायती राज को मजबूत कर विकेंद्रीकरण किया, लेकिन इससे विधायकों में असंतोष बढ़ा. सड़कें, बिजली संकट और मुफ्त बिजली के वादे अधूरे रह गए, जिससे 2003 में कांग्रेस सत्ता हार गई. अंततः, दिग्विजय सिंह न तो छिपे हिंदुत्ववादी हैं न कट्टर आरएसएस-विरोधी. वे कांग्रेस की निरंतर वैचारिक खोज के प्रतीक हैं—एक भड़काने वाले नेता जो पार्टी को आईना दिखाते रहते हैं.
मनोज कुमार झा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि बांग्लादेश से आ रही हिंसा और अराजकता की तस्वीरों को केवल पड़ोसी देश की आंतरिक समस्या मानकर खारिज नहीं किया जा सकता. ये पूरे दक्षिण एशिया के लिए गंभीर चेतावनी हैं, जो बताती हैं कि जब समुदायों के बीच विश्वास टूटता है और समाज की नैतिक नींव कमजोर पड़ती है, तो राष्ट्र धीरे-धीरे अस्थिरता की ओर बढ़ते हैं. विभाजन की विरासत, औपनिवेशिक विघटन और अनसुलझी सामाजिक असमानताओं ने क्षेत्र की राष्ट्रीय संरचना को नाजुक बना दिया है.
बांग्लादेश की घटनाएं दक्षिण एशिया के सभी देशों से नैतिक आत्मनिरीक्षण की मांग करती हैं. आर्थिक विकास सामाजिक विश्वास का विकल्प नहीं बन सकता. समुदायों के बीच संबंधों की मरम्मत राजनीतिक-नैतिक आवश्यकता है, जिसमें भय के बजाय संयम, न्याय और संवाद की जरूरत है. क्षेत्र का भविष्य इस पर निर्भर है कि हम बंधुत्व चुनते हैं या टूटन को आमंत्रित करते हैं.
करन थापर हिन्दुस्तान टाइम्स में साल 2026 में प्रवेश करने की अद्भुत अनुभूति साझा करते हैं. 1960 के दशक के अंत में किशोरावस्था में रहते हुए 21वीं सदी विज्ञान कथा जैसी लगती थी—अकल्पनीय और दूर की कौड़ी. अब 2026 आ गया है, जो कभी अविश्वसनीय लगता था. लेखक को इसमें जादू जैसा लगता है, जैसे टाइम मशीन से दूर के भविष्य में पहुंच गए हों. फिर भी, जीवन आश्चर्यजनक रूप से परिचित है. तकनीक और दुनिया बदली है, लेकिन व्यक्तिगत स्वरूप वही है—बूढ़ा, सफेद बालों वाला, शायद ज्यादा चिड़चिड़ा, लेकिन मूल रूप से अपरिवर्तित. क्या यही समय पर विजय है?
लेखक 18 साल की उम्र से हर साल संकल्प लेते हैं—व्यायाम, धूम्रपान छोड़ना, गुस्सा नियंत्रित करना—लेकिन मार्च-अप्रैल तक टूट जाता है. 2026 के लिए अनोखा संकल्प: छोटे-छोटे झूठ बोलना बंद करना. वे बड़े झूठ नहीं बोलते, लेकिन बातें चमकाना, बढ़ा-चढ़ाना, बहाने बनाना आदत है. यह अनजाने में होता है, जो बातचीत को रोचक बनाता है. अब चुनौती है सटीक और संतुलित रहना बिना बोरिंग हुए. सफल होंगे या नहीं, पाठक पहले जान जाएंगे—अगर कॉलम फीके लगें तो सफलता, अगर रोचक रहें तो संकल्प टूटा. अंत में पूछते हैं: शुभकामनाएं दें या असफलता की कामना करें?
प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि अशांति और खंडित होते विश्व में भारत अभी स्थिर दिखता है. भाजपा के नेतृत्व में सत्ता का केन्द्रीकरण और अधिकारवादी झुकाव के बावजूद अर्थव्यवस्था ने बाहरी झटकों का सामना किया है और सांस्कृतिक रूप से भारत जीवंत बना हुआ है. लेकिन नए साल में भारत का सबसे निर्णायक संघर्ष पार्टियों, व्यक्तित्वों या विचारधाराओं के बीच नहीं, बल्कि फंतासी की मोहकता और वास्तविकता के अनुशासन के बीच है. यह संघर्ष राजनीति, अंतरराष्ट्रीय स्थिति, आर्थिक निर्णय और नैतिक जीवन को निर्धारित करेगा. सतही स्थिरता असंतोष और संस्थागत विफलताओं को छिपा रही है, जिससे राजनीतिक फंतासी को बढ़ावा मिल रहा है. फंतासी यहां झूठी वास्तविकता से बचाव है—कठोर तथ्यों के बजाय भावनात्मक कहानियां, आत्म-बधाई और प्रतीकात्मक विजय. सार्वजनिक जीवन सभ्यतागत मुक्ति की फंतासियों से भर गया है.
लोकतंत्र में भी फंतासी स्थायी लामबंदी और असहमति को अस्तित्व का युद्ध बनाती है. नागरिक स्वतंत्रताओं का ह्रास, संघवाद पर हमला, संस्थाओं की गिरती विश्वसनीयता को “लोकतंत्र की जननी” की फंतासी से ढका जाता है. विपक्ष, खासकर कांग्रेस, भी अपनी अवास्तविकता में फंसा है.फंतासी सत्ता का मंचन है—कल्पना को वास्तविकता से पहले लाना. लेकिन ऊर्जा, तकनीक, जनसांख्यिकी और पारिस्थितिकी का प्रतिरोध अंततः टकराएगा. भारत असमान मानव पूंजी, बेरोजगारी और कम उत्पादकता से जूझ रहा है. आने वाला साल तय करेगा कि संयमित यथार्थवाद मार्गदर्शन करेगा या भ्रम जारी रहेगा. भर्तृहरि की चेतावनी याद आती है—मरीचिका का जल प्यास नहीं बुझाता, दुख बढ़ाता है. आशा है, भारत भ्रम का पीछा छोड़ देगा.
देवदत्त पटनायक ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने इस लेख में सवाल उठाते हैं कि जब ‘जन गण मन’ पहले से राष्ट्रीय गान है, तो ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत बनाने पर इतना विवाद क्यों? उनका मानना है कि इसका कारण दोनों रचनाकारों की जातिगत पृष्ठभूमि से जुड़ा है—दोनों बंगाली ब्राह्मण, लेकिन अलग-अलग स्तर के.बंगाल में 11वीं सदी में सेना राजाओं ने कन्नौज-काशी से ब्राह्मण लाए. उसके बाद मुस्लिम (अफगान-मुगल) और फिर ब्रिटिश शासन रहा. इस लंबे काल में बंगाल ब्राह्मण जमींदारों, मुस्लिम शासकों और किसानों का तरल समाज रहा, जहां सांप्रदायिक तनाव कम थे. 19वीं सदी के ब्रिटिश जनगणना ने धार्मिक पहचानों को कठोर बनाया, जो बंगाल विभाजन तक पहुंचा.
रवींद्रनाथ टैगोर (1861) कलकत्ता के पीराली ब्राह्मण परिवार से थे, जिनके पूर्वज इस्लाम अपनाने के कारण सदियों तक सामाजिक बहिष्कार झेलते रहे. इससे परिवार सुधारवादी ब्राह्म समाज और मानवतावादी विचारों की ओर मुड़ा. ‘जन गण मन’ में मातृभक्ति नहीं, बल्कि सभी लोगों के मन के नियंता और भाग्य-विधाता की स्तुति है, जहां विभिन्न क्षेत्र और लोग साझा आंदोलन के भागीदार हैं. लेखक का तर्क है कि विवाद सिर्फ देशभक्ति का नहीं, बल्कि जाति और ब्राह्मणवाद के प्रकार का है. एक कवि (बंकिम) मुस्लिम शासकों से लड़ने वाले पूर्वजों वाला, लोगों से देवी के सामने झुकने को कहता है. दूसरा (टैगोर) मुस्लिम संबंधों वाला, सबको एक स्वर में साथ चलने को कहता है. यह भारत किस ब्राह्मणवाद को अपनाना चाहता है, इस सवाल को उजागर करता है.
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