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करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि 24 जून को चुनाव आयोग द्वारा बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के आदेश ने गंभीर चिंताएं और परेशान करने वाले सवाल उठाए हैं. क्या इससे संभवतः करोड़ों लोग मताधिकार से वंचित हो जाएंगे? क्या गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होंगे? और क्या इस समय इसकी आवश्यकता थी? हालांकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम आयोग को किसी भी समय और किसी भी तरह से विशेष संशोधन करने का अधिकार देता है, फिर भी क्या बिहार में विधानसभा चुनाव से सिर्फ चार महीने पहले इसे करना उचित था?
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि ऐसे संशोधन अक्सर हाशिए पर रहने वाले समुदायों को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिनके पास नौकरशाही बाधाओं को पार करने के लिए संसाधन या जागरूकता की कमी हो सकती है. उदाहरण के लिए, पहले के संशोधनों में मतदाता सूची में त्रुटियां—जैसे नामों की गलत वर्तनी या गलत पते—के कारण कई लोगों का नाम हट गया, जिससे वे मतदान करने में असमर्थ रहे.
पवन खेड़ा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि पिछले हफ्ते वे बिहार में थे. एक युवा किसान, राजू सिंह, ने हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया, लेकिन उनकी मुस्कान उनकी आँखों तक नहीं पहुँची. “सर, बिजली कभी आती है, कभी नहीं. अब DAP (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) भी गायब है. अब बताइए, क्या उगाएँ? क्यों उगाएँ?” “क्यों खेती करें?” यह सवाल दिल्ली के नीति निर्माताओं को बेचैन कर देना चाहिए. जब किसान यह सोचना बंद कर दें कि क्या उगाना है और क्यों उगाना है, तो यह कृषि संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मनोबल के ह्रास का संकट है. राजू अकेले नहीं हैं.
पवन खेड़ा आगे लिखते हैं कि खरीफ बुवाई के मौसम में DAP और विशेष उर्वरकों की कमी किसानों की कमर तोड़ रही है. आत्मनिर्भर भारत के नारे उठे, लेकिन कृषि जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में यह भावना नहीं दिखती. इसे वैश्विक ताकतों का दोष बताया जाता है, लेकिन यह भारत-विशिष्ट प्रतिबंध है. चीन व्यापार को हथियार बनाकर क्षेत्रीय विवाद सुलझाने की रणनीति अपनाता है. 2010 में, सेनकाकू द्वीप विवाद के बाद, चीन ने जापान को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का निर्यात रोका था. भारत का भी चीन के साथ अनसुलझा क्षेत्रीय विवाद है. यह भारत को दबाने की चीन की रणनीति है. मोदी सरकार ने अभी तक चीन की आलोचना नहीं की. CII ने इंडिया रेयर अर्थ मिशन की सलाह दी, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ किया गया. हाल के महीनों में ही केंद्र ने इस पर कार्रवाई शुरू की—जो बहुत कम और देर से है. भारतीय कृषि को पीक सीजन में नुकसान हो रहा है. पिछले 11 वर्षों में नीतियों के नाम पर केवल पुनर्ब्रांडेड योजनाएँ और नारे मिले.
यह विदेशी ताकतों का नहीं, बल्कि भारतीय नीति निर्माताओं की नाकामी है, जिन्होंने आत्मनिर्भरता का वादा किया और निर्भरता दी. देशभर के किसान, मज़दूर और परिवार BJP की प्रचार रणनीति को समझ रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब वे BJP की उदासीनता का जवाब लोकतंत्र में एक शांत, निर्णायक सबक के साथ देंगे.
इंद्रजीत हाजरा ने द इकोनॉमिक टाइम्स में लिखा है कि पिछले पखवाड़े में अतीत और भविष्य को जोड़ने वाली घटनाएँ घटीं. 4 जुलाई को कार्डिफ में ओएसिस का पुनर्मिलन और 5 जुलाई को बर्मिंघम में ब्लैक सब्बाथ का अंतिम कॉन्सर्ट हुआ. लेकिन 9 जुलाई को कोलकाता में टाटा सन्स के चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुलाकात अधिक महत्वपूर्ण थी. यह 14 साल में टाटा चेयरमैन और बंगाल सीएम की पहली बैठक थी, जो सिंगुर विवाद के बाद हुई, जब ममता ने टाटा मोटर्स को राज्य से बाहर किया था. 16 साल बाद ओएसिस भाइयों और 20 साल बाद ओज़ी ऑस्बॉर्न की वापसी से भी यह मुलाकात बंगाल के आर्थिक इतिहास के लिए अधिक भाग्यशाली लगती है.
टाटा की वैश्विक महत्वाकांक्षाएँ—एयर इंडिया अधिग्रहण, टीसीएस विस्तार—बंगाल को अवसर दे सकती हैं. ममता की राजनीतिक चतुराई और चंद्रशेखरन की व्यावसायिक दृष्टि इस मुलाकात को टर्निंग पॉइंट बना सकती है. लेकिन जब तक वास्तविक निवेश नहीं होता, यह एक और स्वीट एमओयू ही रहेगा. बंगाल को सड़कों, नीतियों और धन के प्रति मानसिकता में बदलाव चाहिए. यह मुलाकात शुरुआत हो सकती है, अगर इतिहास खुद को न दोहराए.
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि 2006 में उन्होंने टाइम आउट मुंबई में लिखा था कि एक शहर को "विश्व शहर" कहलाने के लिए विशाल आकार, ऐतिहासिक गहराई, समृद्ध सांस्कृतिक जीवन, सामाजिक विविधता और आर्थिक शक्ति की आवश्यकता होती है. लेखक मानते हैं कि केवल लंदन, न्यूयॉर्क और मुंबई इस श्रेणी में आते हैं.
रामचंद्र गुहा आगे लिखते हैं कि 1903 में जन्मे मेहरल्ली ने एल्फिंस्टन कॉलेज में पढ़ाई की और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे. 1928 के साइमन कमीशन विरोध और 1930 के नमक सत्याग्रह में उनकी भूमिका उल्लेखनीय थी. उन्हें अपने राजनीतिक विचारों के कारण वकालत का लाइसेंस नहीं मिला. 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता के रूप में, उन्होंने श्रमिक अधिकारों और औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलनों को बढ़ावा दिया.
अमेरिकी पत्रकार बरट्राम वोल्फ के साथ उनकी दोस्ती ने उनके मानवतावादी समाजवाद को उजागर किया, जो गांधी के प्रभाव से प्रेरित था.मेहरल्ली की निःस्वार्थता और मानव कल्याण के प्रति समर्पण ने उन्हें असाधारण बनाया. उनकी मृत्यु ने विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को एकजुट किया. हालांकि, मुंबई की बढ़ती कट्टरता के कारण अब उनके जैसा मेयर चुनना मुश्किल लगता है.
गॉडविन पॉल एडम्स और एंजेलिना चौमुआ ने द हिन्दू में लिखा है कि भारत में ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है. इस जरूरत को पूरा करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढ़ेगा और भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था एवं तेजी से विकसित शहरी परिदृश्य के साथ 2030 तक ऊर्जा खपत दोगुनी होने की उम्मीद है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने ऐसा अनुमान लगाया है.
एडम्स और एंजेलिना लिखते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऊर्जा प्रबंधन को अनुकूलित करने में महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभर रहा है, जिसमें रखरखाव से लेकर ग्रिड संतुलन शामिल है. हालांकि, AI के ऊर्जा क्षेत्र में अपार संभावनाओं के बावजूद, खराब डेटा गुणवत्ता और सीमित AI अवसंरचना जैसे अवरोध इसके प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा हैं.
उदाहरण के लिए, AI एल्गोरिदम उपकरण विफलताओं का पहले से पता लगा सकते हैं, जिससे डाउनटाइम और रखरखाव लागत कम होती है. AI-संचालित स्मार्ट ग्रिड सौर और पवन जैसे रुक-रुक कर चलने वाले स्रोतों को संतुलित कर सकते हैं. AI का पूर्ण लाभ उठाने के लिए, भारत को प्रमुख अवरोधों को दूर करना होगा. प्रभावी AI मॉडल के लिए उच्च-गुणवत्ता, मानकीकृत डेटा आवश्यक है, लेकिन कई उपयोगिताओं में असंगत या अपूर्ण डेटा की समस्या है. सार्वजनिक-निजी भागीदारी, सरकारी प्रोत्साहन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रगति को तेज कर सकते हैं. इन चुनौतियों को पार करके, भारत AI का उपयोग कर अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है, उत्सर्जन कम कर सकता है, और एक टिकाऊ, विश्वसनीय ऊर्जा भविष्य सुनिश्चित कर सकता है.
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