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फैजान मुस्तफा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि भारत की भाषाई विरासत के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है वह यह याद दिलाने का अवसर है कि भारत में उर्दू का विकास समन्वयपूर्ण रहा है. उर्दू न किसी भाषा के लिए चुनौती बनी और न ही किसी भाषा ने इसे अपने लिए चुनौती माना. हिन्दी के साथ उर्दू का रिश्ता मजबूत भी रहा है और जटिल भी. दोनों भारत भूमि पर जन्मी, पली, बढ़ी भाषाएं हैं. उर्दू तो मोहब्बत की जुबान रही है. सियासत ने इसे धर्म से जोड़ दिया. वास्तव में भाषा का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता. यह बात हमेशा से कही जाती रही है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस विषय को गहरा और महत्वपूर्ण बना दिया है.
जो बात उर्दू को लेकर हिन्दी बहुल इलाकों में सियासतदां कर रहे हैं वही बात हिन्दी को लेकर दक्षिण में भी की जा रही है. दोनों ही मामलों में स्थानीय सियासत की आवश्यकता हावी है. उर्दू और हिन्दी का विकास गुलाम भारत में हुआ. दोनों ही भाषाएं एक साथ पली-बढीं. कभी एक को, तो कभी दूसरे को शासकीय संरक्षण रहा. अब हिन्दी और उर्दू को परस्पर विरोध की भाषा के तौर पर भी देखा जा रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है. भाषाएं हमेशा एक-दूसरे को बढ़ाने में सहायक होती हैं. उन्हे स्पर्धी के रूप में देखा जाना ही गलत है.
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि विनाश की कगार पर हैं विश्वविद्यालय. उन्होंने हॉवर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष एलन गार्बर के वक्तव्य से बात शुरू करते हुए बताया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के आदेश की परवाह नहीं करते हुए हॉवर्ड विश्वविद्यालय ने अपना संघर्ष जारी रखा है. ट्रंप प्रशासन ने हॉवर्ड विश्वविद्यालय को 2.2 अरब अमेरिकी डॉलर का अनुदान रोक दिया है. भारतीय विश्वविद्यालयों में स्वायत्तता नहीं है कि वे अपनी आवाज बुलन्द कर सकें.
चिदंबरम लिखते हैं कि 21 अक्तूबर 2024 तक केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिक्त शैक्षिक पदों की संख्या 5,182 थी. शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने पाया कि आईटी स्नातकों के प्लेसमेंट में गिरावट आयी है. 2021-22 और 2023-24 के बीच प्लेसमेंट में दस फीसदी से अधिक की गिरावट आयी है. एनआईटी स्नातकों के प्लेसमेंट में भी 10.77 फीसद की गिरावट आयी है. डॉ स,वी रमन विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले एकमात्र भारतीय विश्वविद्यालय के उत्पाद थे. सबसे अधिक बुरी खबर है कि शैक्षणिक स्वतंत्रता के लिए जगह कम होती जा रही है. असहिष्णु समूहों ने जेएनयू, डीयू, जामिया मिल्लिया, एएमयू, जादवपुर, केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू सहित कई अन्य विश्वविद्यालयों पर मौखिक और शारीरिक हमले किए गये हैं.
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि 20 अप्रैल 2020 को उन्होंने लिखा था- ‘गोपालकृष्ण गांधी, लोकसेवक, राजनयिक, लेखक और विद्वान’. पांच साल बाद लेखक महसूस करते हैं कि गोपाल गांधी ने उन्हें और भी ज्यादा ऋणी बना लिया है. गोपाल कृष्ण गांधी ने बेहद शिक्षाप्रद पुस्तक लिखी है. इसमें देश की उथल-पुथल भरी यात्रा में मुख्य पात्रों और घटनाओं की अद्भुत और पहले कभी न देखी गयी तस्वीरों की शृंखला है. पुस्तक में सी रोजगोपालाचारी केद्रीय चरित्र हैं जो स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत में उच्च पद संभाला था. राजगोपालाचारी ने ‘स्वतंत्र’ नामक विपक्षी पार्टी बनायी थी, जिन्होंने अर्थव्यवस्था को राज्य के बंधनों से मुक्त करने की आवश्यकता को जोरदार तरीके से व्यक्त किया था. गोपाल कृष्ण गांधी को प्रभावित करने वाली दूसरी शख्सियत थीं एम.एस सुब्बु लक्ष्मी, जिनसे गोपाल गांधी बचपन से प्यार करते थे और जिनके संगीत और व्यक्तित्व का उन पर स्थायी प्रभाव था.
रामचंद्र गुहा स्मरण कराते हैं कि गोपालकृष्ण गांधी दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में व्याख्यान देने आये थे. उपनिवेशवाद से मुक्ति, आत्म-सम्मान, आत्मनिर्भरता, अहिंसक अवज्ञा से लेकर राष्ट्रवाद पर गोपाल ने बेबाक बोला था. तलवारें लहराना, पड़ोसियों को धमकाने वाली कट्टरतावाद राष्ट्रवाद नहीं हो सकता. गोपाल गांधी ने अपनी पुस्तक में 1960 के दशक में भारत सरकार द्वारा आधिकारिक उपयोग से अंग्रेजी को मिटाने के प्रयासों का विवरण है.
‘द अनडाइंग लाइट’ में कई मार्मिक कहानियां हैं. एक कहानी राजाजी और उनकी बेटी नामागिरि द्वारा हैदराबाद की यात्रा से संबंधित है जब वह विद्रोही सामंती राज्य अंतत: भारतीय संघ का हिस्सा बन गया था. निजाम ने गवर्नर जनरल की बेटी को हीरे जड़े हार भेंट किए. राजाजी ने इसे लौटा दिया. बेटी नामगिरि ने अपने पिता को डांटा और कहा कि उन्हें निजाम से कहना चाहिए था कि हम गांधी के अनुयायी हैं और हमारे पास महंगी चीजें नहीं हैं. ईवी रामासामी की दूसरी शादी का गवाह बनने से इनकार करने का भी राजाजी को अफसोस था. इस बारे में गोपाल कहते हैं कि अगर वे सहमत होते तो तमिल ग्रामीण इलाकों में ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण विमर्श में बड़ी राहत मिलती.
भानु प्रताप मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में शक्ति संतुलन अक्सर बदलते रहते है और प्रौद्योगिकी द्वारा संचालित होते हैं. चीन और अमेरिका के बीच स्पर्धा के मूल में प्रौद्योगिकी है. जेफरी डिंग की बहुचर्चित पुस्तक “प्रौद्योगिकी और महान शक्तियों का उदय” कई मान्यताओं को उलट देता है. प्रौद्योगिकी के साथ देश नवाचार करते हैं, अग्रता हासिल करते हैं. औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन ने कपड़ा जैसे उद्योगों में महत्वपूर्ण नवाचार किए और अग्रता हासिल की. दूसरी औद्योगिक क्रांति के दौरान जब जर्मनी ने ब्रिटेन को चुनौती दी तो उसने रासायनिक उद्योग जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बढ़त हासिल करके जवाब दिया. 1970 के दशक के उत्तरार्ध में लोगों ने सोचा था कि जापान अमेरिका को कड़ी टक्कर देगा क्योंकि उसने उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और कार उद्योगों पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया था.
लेखक बताते हैं कि मुद्दा यह नहीं है कि आविष्कार कौन करता है, मुद्दा यह है कि नये आविष्कारों को व्यापक रूप से फैलाने में कौन सक्षम है. डिंग को लगता है कि अमेरिका के पास अभी भी बढ़त है. वह इसके लिए सबूत देने की कोशिश करते हैं जिसमे प्रासंगिक इंजीनियरिंग कौशल का प्रसार भी शामिल है. लेकिन, भारत के लिए सबक स्पष्ट है. जैसा कि डिंग कहते हैं स्पॉटलाइट नवाचार क्लस्टर पर नहीं होना चाहिए. इसे “छोटे आकार की फर्मों, छोटे शहरों, इंजीनियर जो बदलाव करते हैं और प्रौद्योगिकी सीमा को बाकी अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाले चैनलों” पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. हमें मानव पूंजी के व्यापक प्रसार और संस्थागत सुधार की आवश्यकता है.
देवदत्त पटनायक ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि आज भारत में बौद्ध धर्म सामाजिक सक्रियता और जाति विरोधी आंदोलनों से मजबूती से जुड़ा हुआ है लेकिन तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अशोक काल से लेकर आठवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में पाल काल तक बौद्ध धर्म के फलने-फूलने का कारण व्यापार रहा है. बुद्ध को काव्यात्मक रूप से व्यापारिक कारवां के नेता के रूप में भी वर्णित किया गया है जो बौद्ध धर्म है.
देवदत्त पटनायक लिखते हैं कि मठों ने व्यापारियों को आश्रय देने, चिकित्सा, सेवा, अनुवाद, नेटवर्किंग, बैलेंस शीट बनाए रखने और ऋण प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस प्रकार वे वित्तीय संस्थान बन गये. बौद्ध धर्म के ग्रंथ इस बात की कहानियों से भरे पड़े हैं कि कैसे बौद्ध भिक्षुओं के धन और खातों का प्रबंधन किया जाता था, खासकर मृत्यु के बाद. बौद्ध धर्म समृद्धि धर्मशास्त्र की तरह था. 19वीं सदी की यह धारणा कि बुद्ध एक भिक्षु थे जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया, पूरी तरह सच नहीं है. वास्तव में बौद्ध शिक्षाओं में कर्म की बात की गयी थी जो बैलेंस शीट से जुड़ा था. हमें बताया गया कि किसी को केवल पिछली उपलब्धियों का लाभ नहीं उठाना चाहिए बल्कि भविष्य में निवेश भी करना चाहिए. यह निवेश उदारता से जुड़ा था.
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