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संडे व्यू: उर्दू किसी भाषा को चुनौती नहीं, विनाश की ओर विश्वविद्यालय?

पढ़ें इस रविवार फैजान मुस्तफा, पी चिदंबरम, रामचंद्र गुहा, भानु प्रताप मेहता और देवदत्त पटनायक के विचारों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>पढ़ें इस रविवार फैजान मुस्तफा, पी चिदंबरम, रामचंद्र गुहा, भानु प्रताप मेहता और देवदत्त पटनायक के विचारों का सार.  </p></div>
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पढ़ें इस रविवार फैजान मुस्तफा, पी चिदंबरम, रामचंद्र गुहा, भानु प्रताप मेहता और देवदत्त पटनायक के विचारों का सार.

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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उर्दू किसी भाषा के लिए चुनौती नहीं

फैजान मुस्तफा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि भारत की भाषाई विरासत के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है वह यह याद दिलाने का अवसर है कि भारत में उर्दू का विकास समन्वयपूर्ण रहा है. उर्दू न किसी भाषा के लिए चुनौती बनी और न ही किसी भाषा ने इसे अपने लिए चुनौती माना. हिन्दी के साथ उर्दू का रिश्ता मजबूत भी रहा है और जटिल भी. दोनों भारत भूमि पर जन्मी, पली, बढ़ी भाषाएं हैं. उर्दू तो मोहब्बत की जुबान रही है. सियासत ने इसे धर्म से जोड़ दिया. वास्तव में भाषा का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता. यह बात हमेशा से कही जाती रही है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस विषय को गहरा और महत्वपूर्ण बना दिया है.

फैजान मुस्तफा बताते हैं कि जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के विनोद चंद्रन ने उर्दू के विरोधियों को साहस के साथ और स्पष्ट रूप से समझाया है. जस्टिस धूलिया ने एक जरूरी अवधारणा को उपयोगी ढंग से समझाया है, “भाषा धर्म नहीं है. भाषा धर्म का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती. भाषाएं किसी समुदाय, क्षेत्र, लोगों की होती है किसी धर्म की नहीं.” भाषा को धर्म से जोड़ना संकीर्णता है. ऐसा करने से ही भाषा का विकास रुकता है. जब भाषा का विकास रुकता है पूरे समाज का विकास रुक जाता है.

जो बात उर्दू को लेकर हिन्दी बहुल इलाकों में सियासतदां कर रहे हैं वही बात हिन्दी को लेकर दक्षिण में भी की जा रही है. दोनों ही मामलों में स्थानीय सियासत की आवश्यकता हावी है. उर्दू और हिन्दी का विकास गुलाम भारत में हुआ. दोनों ही भाषाएं एक साथ पली-बढीं. कभी एक को, तो कभी दूसरे को शासकीय संरक्षण रहा. अब हिन्दी और उर्दू को परस्पर विरोध की भाषा के तौर पर भी देखा जा रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है. भाषाएं हमेशा एक-दूसरे को बढ़ाने में सहायक होती हैं. उन्हे स्पर्धी के रूप में देखा जाना ही गलत है.

विनाश की ओर विश्वविद्यालय?

पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि विनाश की कगार पर हैं विश्वविद्यालय. उन्होंने हॉवर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष एलन गार्बर के वक्तव्य से बात शुरू करते हुए बताया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के आदेश की परवाह नहीं करते हुए हॉवर्ड विश्वविद्यालय ने अपना संघर्ष जारी रखा है. ट्रंप प्रशासन ने हॉवर्ड विश्वविद्यालय को 2.2 अरब अमेरिकी डॉलर का अनुदान रोक दिया है. भारतीय विश्वविद्यालयों में स्वायत्तता नहीं है कि वे अपनी आवाज बुलन्द कर सकें.

यूजीसी को सर्वोच्च बताए जाने को भी चिदंबरम ने उदाहरण के साथ खारिज किया है. सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालयों पर व्यापक नियंत्रण से उच्च शिक्षा को कोई लाभ हुआ है? कोई भी भारतीय विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष सौ विश्वविद्यालयों में स्थान नहीं बना पाया है. सर्वोच्च रैंक वाला भारतीय विश्वविद्यालय आईआईटी बॉम्बे है जिसने 118वां स्थान प्राप्त किया है.

चिदंबरम लिखते हैं कि 21 अक्तूबर 2024 तक केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिक्त शैक्षिक पदों की संख्या 5,182 थी. शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने पाया कि आईटी स्नातकों के प्लेसमेंट में गिरावट आयी है. 2021-22 और 2023-24 के बीच प्लेसमेंट में दस फीसदी से अधिक की गिरावट आयी है. एनआईटी स्नातकों के प्लेसमेंट में भी 10.77 फीसद की गिरावट आयी है. डॉ स,वी रमन विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले एकमात्र भारतीय विश्वविद्यालय के उत्पाद थे. सबसे अधिक बुरी खबर है कि शैक्षणिक स्वतंत्रता के लिए जगह कम होती जा रही है. असहिष्णु समूहों ने जेएनयू, डीयू, जामिया मिल्लिया, एएमयू, जादवपुर, केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू सहित कई अन्य विश्वविद्यालयों पर मौखिक और शारीरिक हमले किए गये हैं.

लेखक का मानना है कि जब तक यूजीसी अधिनियम को निरस्त नहीं किया जाता, पुन: परिकल्पित नहीं किया जाता और पुन: लागू नहीं किया जाता, तब तक विश्वविद्यालय की स्वायत्तता एक दूर की कौड़ी ही साबित होगी.

85 साल के गोपाल कृष्ण गांधी

रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि 20 अप्रैल 2020 को उन्होंने लिखा था- ‘गोपालकृष्ण गांधी, लोकसेवक, राजनयिक, लेखक और विद्वान’. पांच साल बाद लेखक महसूस करते हैं कि गोपाल गांधी ने उन्हें और भी ज्यादा ऋणी बना लिया है. गोपाल कृष्ण गांधी ने बेहद शिक्षाप्रद पुस्तक लिखी है. इसमें देश की उथल-पुथल भरी यात्रा में मुख्य पात्रों और घटनाओं की अद्भुत और पहले कभी न देखी गयी तस्वीरों की शृंखला है. पुस्तक में सी रोजगोपालाचारी केद्रीय चरित्र हैं जो स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत में उच्च पद संभाला था. राजगोपालाचारी ने ‘स्वतंत्र’ नामक विपक्षी पार्टी बनायी थी, जिन्होंने अर्थव्यवस्था को राज्य के बंधनों से मुक्त करने की आवश्यकता को जोरदार तरीके से व्यक्त किया था. गोपाल कृष्ण गांधी को प्रभावित करने वाली दूसरी शख्सियत थीं एम.एस सुब्बु लक्ष्मी, जिनसे गोपाल गांधी बचपन से प्यार करते थे और जिनके संगीत और व्यक्तित्व का उन पर स्थायी प्रभाव था.

रामचंद्र गुहा स्मरण कराते हैं कि गोपालकृष्ण गांधी दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में व्याख्यान देने आये थे. उपनिवेशवाद से मुक्ति, आत्म-सम्मान, आत्मनिर्भरता, अहिंसक अवज्ञा से लेकर राष्ट्रवाद पर गोपाल ने बेबाक बोला था. तलवारें लहराना, पड़ोसियों को धमकाने वाली कट्टरतावाद राष्ट्रवाद नहीं हो सकता. गोपाल गांधी ने अपनी पुस्तक में 1960 के दशक में भारत सरकार द्वारा आधिकारिक उपयोग से अंग्रेजी को मिटाने के प्रयासों का विवरण है.

गोपाल गांधी लिखते हैं, “मैं बुरी तरह से टूटा हुआ महसूस कर रहा था. मुझे हिन्दी पसंद थी इसके साम्राज्यवादी दिखावे से नफरत थी. देश की यात्रा कथा पर हावी है जिसमें प्रमुख घटनाओं और विवादों के साथ-साथ टिप्पणी भी है.

‘द अनडाइंग लाइट’ में कई मार्मिक कहानियां हैं. एक कहानी राजाजी और उनकी बेटी नामागिरि द्वारा हैदराबाद की यात्रा से संबंधित है जब वह विद्रोही सामंती राज्य अंतत: भारतीय संघ का हिस्सा बन गया था. निजाम ने गवर्नर जनरल की बेटी को हीरे जड़े हार भेंट किए. राजाजी ने इसे लौटा दिया. बेटी नामगिरि ने अपने पिता को डांटा और कहा कि उन्हें निजाम से कहना चाहिए था कि हम गांधी के अनुयायी हैं और हमारे पास महंगी चीजें नहीं हैं. ईवी रामासामी की दूसरी शादी का गवाह बनने से इनकार करने का भी राजाजी को अफसोस था. इस बारे में गोपाल कहते हैं कि अगर वे सहमत होते तो तमिल ग्रामीण इलाकों में ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण विमर्श में बड़ी राहत मिलती.

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प्रौद्योगिकी से तय होता है शक्ति संतुलन

भानु प्रताप मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में शक्ति संतुलन अक्सर बदलते रहते है और प्रौद्योगिकी द्वारा संचालित होते हैं. चीन और अमेरिका के बीच स्पर्धा के मूल में प्रौद्योगिकी है. जेफरी डिंग की बहुचर्चित पुस्तक “प्रौद्योगिकी और महान शक्तियों का उदय” कई मान्यताओं को उलट देता है. प्रौद्योगिकी के साथ देश नवाचार करते हैं, अग्रता हासिल करते हैं. औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन ने कपड़ा जैसे उद्योगों में महत्वपूर्ण नवाचार किए और अग्रता हासिल की. दूसरी औद्योगिक क्रांति के दौरान जब जर्मनी ने ब्रिटेन को चुनौती दी तो उसने रासायनिक उद्योग जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बढ़त हासिल करके जवाब दिया. 1970 के दशक के उत्तरार्ध में लोगों ने सोचा था कि जापान अमेरिका को कड़ी टक्कर देगा क्योंकि उसने उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और कार उद्योगों पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया था.

जियो पॉलिटिक्स में डिंग के तर्क के निहितार्थ को समझना जरूरी है. चीन ने इलेक्ट्रॉनिक कारों के उत्पादन में प्रभावशाली प्रदर्शन किया है. लेकिन, डिंग को लगता है कि जब तक ट्रंप पूरे सिस्टम को खत्म नहीं कर देते तब तक अमेरिका जीपीटी को अपनाने में बढ़त बनाए रख सकता है.

लेखक बताते हैं कि मुद्दा यह नहीं है कि आविष्कार कौन करता है, मुद्दा यह है कि नये आविष्कारों को व्यापक रूप से फैलाने में कौन सक्षम है. डिंग को लगता है कि अमेरिका के पास अभी भी बढ़त है. वह इसके लिए सबूत देने की कोशिश करते हैं जिसमे प्रासंगिक इंजीनियरिंग कौशल का प्रसार भी शामिल है. लेकिन, भारत के लिए सबक स्पष्ट है. जैसा कि डिंग कहते हैं स्पॉटलाइट नवाचार क्लस्टर पर नहीं होना चाहिए. इसे “छोटे आकार की फर्मों, छोटे शहरों, इंजीनियर जो बदलाव करते हैं और प्रौद्योगिकी सीमा को बाकी अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाले चैनलों” पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. हमें मानव पूंजी के व्यापक प्रसार और संस्थागत सुधार की आवश्यकता है.

जाति विरोधी आंदोलनों से जुड़ा है बौद्ध धर्म

देवदत्त पटनायक ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि आज भारत में बौद्ध धर्म सामाजिक सक्रियता और जाति विरोधी आंदोलनों से मजबूती से जुड़ा हुआ है लेकिन तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अशोक काल से लेकर आठवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में पाल काल तक बौद्ध धर्म के फलने-फूलने का कारण व्यापार रहा है. बुद्ध को काव्यात्मक रूप से व्यापारिक कारवां के नेता के रूप में भी वर्णित किया गया है जो बौद्ध धर्म है.

हमें बताया जाता है कि जब बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई तो उन्हें दो व्यापारियों ने भोजन दिया. प्रसन्न होकर उन्होंने उन्हें एक तह किया हुआ वस्त्र दिया जिस पर उन्होंने उलटा कटोरा रखा और इसने स्तूप संरचनाओं को प्रेरित किया. एक अन्य व्यापारी ने प्रसिद्ध जेतवन मठ दान किया जिसे बुद्ध को उनकी उदारता के लिए जाने जाने वाले एक व्यापारी ने उपहार में दिया था. एक अन्य मठ उन्हें विशाखा नाम की एक महिला ने उपहार में दिया था जो एक व्यापारी परिवार से थी. तीसरी और छठी शताब्दी के बीच लिखे गये तमिल महाकाव्यों में अमीर बौद्ध व्यापारियों और वेश्याओं का जिक्र है जिन्होंने बौद्ध प्रतिष्ठानों को दान दिया था.

देवदत्त पटनायक लिखते हैं कि मठों ने व्यापारियों को आश्रय देने, चिकित्सा, सेवा, अनुवाद, नेटवर्किंग, बैलेंस शीट बनाए रखने और ऋण प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस प्रकार वे वित्तीय संस्थान बन गये. बौद्ध धर्म के ग्रंथ इस बात की कहानियों से भरे पड़े हैं कि कैसे बौद्ध भिक्षुओं के धन और खातों का प्रबंधन किया जाता था, खासकर मृत्यु के बाद. बौद्ध धर्म समृद्धि धर्मशास्त्र की तरह था. 19वीं सदी की यह धारणा कि बुद्ध एक भिक्षु थे जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया, पूरी तरह सच नहीं है. वास्तव में बौद्ध शिक्षाओं में कर्म की बात की गयी थी जो बैलेंस शीट से जुड़ा था. हमें बताया गया कि किसी को केवल पिछली उपलब्धियों का लाभ नहीं उठाना चाहिए बल्कि भविष्य में निवेश भी करना चाहिए. यह निवेश उदारता से जुड़ा था.

धम्म के लिए दान करने से व्यापारियों को अमीर बनने में मदद मिलती है. व्यापारियों और मठों की मदद करने से राजा शक्तिशाली और सफल बनता है. ये विचार बाद में मंदिर संस्कृति का हिस्सा बन गये क्योंकि बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हो गया और हिन्दू धर्म बढ़ गया. देवी वसुंधरा या धन की देवी पहले बौद्ध कला मे दिखाई दीं और बाद में हिन्दू परंपराओं का भी हिस्सा बन गईं- देवी लक्ष्मी के रूप में.
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