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संडे व्यू: ट्रंप की धुन पर नाचेगी दुनिया? पत्रकारिता भी ‘बॉक्स ऑफिस’ पर निर्भर?

पढ़ें इस रविवार पी चिदंबरम, तवलीन सिंह, आदिति फडणीस, टीएम कृष्णा और आनन्द नीलकंठन के विचारों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>संडे व्यू</p></div>
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संडे व्यू

फोटो: द क्विंट 

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मिस्टर मोदी झुके पर क्या जीतेंगे?

पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि इसी दो अप्रैल को हम जान जाएंगे कि दुनिया आधुनिक ‘पाइड पाइपर’ की धुन पर नाचेगी या नहीं. अगर संयुक्त राज्य अमेरिका अन्य लक्षित देशों से आयातित वस्तुओं पर दंडात्मक शुल्क लगाता है तो वह विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ नियमों, बहुपक्षीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों और सम्मेलनों का उल्लंघन होगा.

हालांकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कानून की परवाह नहीं है चाहे वह अमेरिकी हो या कोई और. वे खुद एक कानून हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने ‘लक्षित’ देशों की पहचान की है और उन देशों से आयातित चुनिंदा वस्तुओं पर वे शुल्क लगाने का इरादा रखते हैं. भारत इस सूची में है.

चिदंबरम लिखते हैं कि संरक्षणवाद को देशभक्ति के साथ भ्रमित किया गया. आत्मनिर्भरता एक मिथक है. कोई भी देश उन सभी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन नहीं कर सकता है जो उसके लोग चाहते हैं और उपभोग करते हैं. एक संरक्षणवादी देश कमतर विकास, कम निवेश, घटिया सामान, सीमित विकल्प और खराब ग्राहक सेवाओं की पीड़ा का सामना करेगा. पिछले पचास वर्षों के इतिहास ने निर्णायक रूप से स्थापित किया है कि खुली अर्थव्यवस्था और मुक्त व्यापार आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है. दुनिया के सबसे अमीर देश वे हैं जो व्यापार और प्रतिस्पर्धा के लिए खुले हैं.

भारत ने लगभग 40 सालों तक संरक्षणवाद को अपनाए रखा. डॉ मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्तमंत्री बनने के बाद संरक्षणवाद को खत्म करने और अर्थव्यवस्था को खोलने का मार्ग चुना. जब 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो भारत ने दिशा उलट दी और संरक्षणवाद को फिर से अपना लिया. संरक्षणवाद को आकर्षक नाम मिला- आत्मनिर्भरता. विश्व व्यापार संगठन के अनुसार भारत का सामान्य औसत अंतिम बाध्य शुल्क 50.8 फीसद है. एमएफएन के साथ व्यापार भारित औसत शुल्क 12.0 फीसद है. ये दो संख्याएं इस बात को बताते हैं कि भारत कितना ‘संरक्षणवादी’ है.

पत्रकारिता भी ‘बॉक्स ऑफिस’ पर निर्भर

तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि पिछले सप्ताह सीबीआई ने स्वीकार किया कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत आत्महत्या थी, हत्या नहीं. याद आया कि किस जोश से एक प्रसिद्ध महिला एंकर ने अपने कार्यक्रम को अदालत में परिवर्तित करके रिया चक्रवर्ती को दोषी ठहराया था.

कई ‘गवाहों’ को अपने कार्यक्रमों में बुलाकर ‘फैसला’ सुनाया था. एक पत्रकार को इसी कार्यक्रम में सुना, “अब तो तय हो गया है कि सुशांत की हत्या की थी उसकी प्रेमिका ने उसके बैंक से पंद्रह करोड़ रुपये चुराने के लिए”. एक स्पर्धा चल पड़ी थी टीवी एंकरों के बीच रिया को दोषी ठहराने की. रोज कोई नया ‘एंगल’ निकाला जाता था, रोज की नया आरोप. देश के जानेमाने टीवी पत्रकारों ने इतना तगड़ा मुकदमा पेश किया कि हम सब मान चुके थे कि सुशांत की मृत्यु आत्महत्या नहीं, हत्या थी.

तवलीन सिंह लिखती हैं कि ये वे दिन थे जब बालीवुड को बदनाम करने के लिए मुहिम चली थी. हर दूसरे दिन केंद्र सरकार के किसी मंत्री का वक्तव्य आता था कि बालीवुड पर मुसलमानों का कब्जा है इसलिए सिर्फ ‘सेकुलर’ किस्म की फिल्में बनती हैं. बालीवुड का चरित्र बदलने के लिए प्रधानमंत्री ने खुद अपने दफ्तर में फिल्मी दुनिया की जानी-मानी हस्तियों को बुलाया था और जो लोग नहीं गये उन्हें निशाना बनाया गया, कुछ महीनों के बाद शाहरुख खान के बेटे को मादक पदार्थों के झूठे मामले में फंसाया गया.

आखिरकार आर्यन खान निर्दोष पाए गये थे लेकिन जेल में एक महीना रहन के बाद. लेखिका को अफसोस है कि वह इस नये भारत की नई पत्रकारिता में अपने लिए जगह नहीं देखतीं. उनके जमाने के पत्रकार आज भी ईमानदारी से पत्रकारिता करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके सभ्य टीवी शो कौन देखेगा जब सनसनीखेज नाटक चल रहे हों टीवी पर. फिल्मों की तरह पत्रकारिता भी बॉक्स ऑफिस पर निर्भर है.

केरल में भगवा लहरा पाएंगे चंद्रशेखर?

आदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि राजीव चंद्रशेखर पर बीजेपी ने केरल में दांव खेला है. मलयालम पर उनकी पकड़ नहीं. प्रभावशाली वक्ता भी नहीं. न केरल में बहुत ज्यादा वक्त बिताया है. लेकिन, उन्हें बीजेपी की केरल इकाई का प्रमुख नियुक्त किया गया है. उनकी नियुक्ति यह सोचकर की गयी है कि उन्हें खतरा नहीं माना जाएगा और वे पार्टी की गुटबाजी वाली इकाई को एकजुट कर देंगे.

एयर कोमोडोर के पुत्र एम के चंद्रशेखर खुद को फौजी का बेटा कहलाना पसंद करते हैं. चंद्रशेखर ने मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की पढ़ाई का फैसला किया और 1984 में स्नातकोत्तर डिग्री के लिए अमेरिका चले गये. उन्होंने 9 महीने में डिग्री पूरी कर ली. इंटेल में जब जुड़े तो केवल दो इंजीनियर सीपीयू बनाते थे और अगली पीढ़ी के चिप्स पर काम कर रहे थे.

आदिति लिखती हैं कि अमेरिका में ही एमबीए कर रही अंजू से राजीव चंद्रशेखर की मुलाकात हुई और फिर शादी कर ली. अंजू केरल के मशहूर और प्रतिष्ठित उद्यमी टीपी गोपालन नांबियार की बेटी हैं जिन्हें लोग टीपीजी कहते हैं. नांबियार 1963 में पलक्कड़ आए और रक्षा बलों के लिए पैनल मीटर बनाते थे. ससुर के साथ मिलकर चंद्रशेखर ने बीपीएल कम्युनिकेशंस चलाई. चंद्रशेखर ने ज्यूपिटर कैपिटल, एशियानेट न्यूज प्राइवेट लिमिटेड की भी बुनियाद रखी. 2018 में बीजेपी में आने से पहले उन्होंने निदेशक मंडल से इस्तीफा दे दिया.

2006 और 2012 में राज्यसभा के निर्दलीय सदस्य रहे राजीव चंद्रशेखर बीजेपी में जाने के बाद भी राज्यसभा पहुंचे. उन्होंने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 बनाने में अहम भूमिका निभाई. बीजेपी को उम्मीद है कि केरल विधानसभा चुनाव में राजीव चंद्रशेखर का अनुभव काम आएगा.

केरल में आरएसएस की पैठ है. वोट की हिस्सेदारी 2019 के लोकसभा चुनाव में 3.57 फीसद से बढ़कर 2024 में 19.21 फीसद हो चुकी है. वोटों को सीटों में बदलने की कोशिश चंद्रशेखर दिखाएं, इसके लिए महज सालभर का समय बचा है.

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कलाकार की जुबान बंद की जिद

टीएम कृष्णा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की आलोचना करने वाले कुणाल कामरा के स्टैंड अप के बाद हुई बर्बरता और खुली धमकियों ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, रचनात्मक भावना, तीखी आलोचना और भारतीय सार्वजनिक जीवन में व्यंग्य और हास्य की भूमिका से जुड़े सवालों को सामने ला दिया है.

यह स्वीकार किए बिना कि भारतीय समाज आम तौर पर बहुत ही संवेदनशील रहा है, वर्तमान स्थिति के बारे में बात करना बेइमानी होगी. हमने जीवन, मिथकों, धर्म और राजनीति की आलोचनात्मक, कलात्मक व्याख्याओं का पुरजोर विरोध किया है. कुछ विपरीत उदाहरण पेश करने से यह तथ्य नहीं मिटता कि असंख्य कलाकारों पर निजी संगठनों, व्यक्तियों द्वारा हमले किए गये हैं और यहां तक कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उनके काम के लिए उन्हें बहिष्कृत भी किया गया है.

टीएम कृष्णा लिखते हैं कि जो लोग हिंसा मे लिप्त होते हैं वे अपनी प्रतिक्रिया को अस्पष्ट ‘हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं’ जो किसी को भी यह दावा करने की अनुमति देता है कि उसे कला के सबसे सौम्य टुकड़े से भी ठेस पहुंची है. चोट को साबित करना असंभव है. यह सिर्फ एक भावना है जो अक्सर गंभीरता से जुड़ने में असमर्थता से निकलती है. नतीजतन किसी के लिए नाराज होना आसान है. लेकिन नाराजगी मुद्दा नहीं है.

यह हिंसा के रूप में अपमान की अभिव्यक्ति है जो समस्या है. लेखक कलाकारों के प्रति हिंसा की व्यापक पकृति की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं. अपराधी अपने कार्यों को लेकर बेखौफ हैं. जो नया है वह यह है कि आम जनता द्वारा बर्बरता को स्वीकार किया जा रहा है. चौंकाने वाला बदलाव यह भी है कि सरकार या सरकारी एजेंसियां विध्वंसकारी कृत्यों में भाग ले रही हैं.

इस प्रवृत्ति की नींव में सांस्कृतिक अधिनायकवाद निहित है. इन सबके बावजदू कुणाल कामरा मौजूद हैं. यही वजह है कि वे सत्ता प्रतिष्ठान के लिए खतरा हैं. हमें आवाज उठाने की जरूरत है क्योंकि हाशिए पर पड़े लोगों मे कुणाल भी हैं जो प्रतिक्रियावादी क्रूरता को हल्का करके देखने की वह से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं

चेतावनी है नशे मे डूबता भारत

आनंद नीलकंठन ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में नशे में डूबते भारत की ओर सबका ध्यान दिलाया है. भारतीय युवाओं को एक ऐसी महामारी ने जकड़ रखा है जो न केवल उनके भविष्य को बल्कि पूरे देश के भविष्य को ही खतरे मे डाल रहा है. डरावनी बात यह है कि अब तक यह देश मे सबसे ज्यादा चर्चित विषय नहीं बन पाया है.

हम अभी भी उन तानाशाहों की कब्रगाहों में फंसे हुए हैं जो बहुत पहले मर चुके हैं या फिर तीन सौ साल पहले उन्होंने जो किया उसे लेकर चिंतित हैं कि हमारे आसपास क्या हो रहा है. पिछले पांच सालों में 19 अलग-अलग अभियानों में 11,311 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के मादक पदार्थ जब्त किए गये हैं. यह लोकसभा में गृहमंत्रालय की ओर से दी गयी जानकारी है.

आनंद नीलकंठन लिखते हैं कि 2022 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को एक रिपोर्ट सौंपी कि देशभर में 10 से 17 वर्ष की आयु के बीच 15.8 मिलियन युवा मादक पदार्थों की लत से जूझ रहे हैं. भारत में बढ़ते नशीले पदार्थों के उपयोग और अपराध की दर के बीच संबंध तेजी से सप्ष्ट हो रहा है. प्रमुख महानगरीय क्षेत्रों के पुलिस रिकॉर्ड से पता चलता है कि संपत्ति अपराध, हमले और संगठित आपराधिक गतिविधियां नशीले पदार्थों की तस्करी के सीधे अनुपात में बढ़ी हैं.

शैक्षणिक संस्थान ड्रग वितरण नेटवर्क के लिए प्रमुख लक्ष्य बन गये हैं. तस्कर विशेष रूप से स्कूलों और कॉलेजों को निशाना बनाते हैं, छात्रों को ग्राहक और वितरक के रूप में नियुक्त करते हैं. यह पैटर्न शहरी केंद्रों में दोहराया जाता है. दिल्ली से लेकर बेंगलुरू, मुंबई से लेकर कोलकाता तक जहां ड्रग्स परिष्कृत वितरण चैनलों के माध्यम से परिसरों में घुसपैठ करते हैं जो कमजोर युवाओं का शोषण करते हैं.

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