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संडे व्यू: गांधी,नेहरू भी देते देशभक्ति परीक्षा, जाति जनगणना से विपक्ष निहत्था?

पढ़ें इस रविवार प्रताप भानु मेहता, तवलीन सिंह, आसिम अली, अदिति फडणीस और अनु अग्रवाल के विचारों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>पढ़ें इस रविवार प्रताप भानु मेहता, तवलीन सिंह, आसिम अली, अदिति फडणीस और अनु अग्रवाल के विचारों का सार. </p></div>
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पढ़ें इस रविवार प्रताप भानु मेहता, तवलीन सिंह, आसिम अली, अदिति फडणीस और अनु अग्रवाल के विचारों का सार.

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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गांधी, नेहरू को भी देनी होती देशभक्ति की परीक्षा

प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि हरियाणा राज्य बनाम अली खान महमूदाबाद मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से संवैधानिक मूल्यों की परवाह करने वालों को झटका लगना चाहिए. माननीय न्यायाधीशों ने दयापूर्वक प्रोफेसर खान को जमानत दे दी. नागरिक स्वतंत्रता संरक्षण के हमारे निम्न मानकों के हिसाब से भी उनकी गिरफ्तारी निंदनीय है. लेकिन, राहत देने के आदेश से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा मजबूत होने के बजाए कमजोर होती दिखती है. आदेश की शर्तें अपने आप में अधिकारों का अनुचित हनन हैं. एक शिक्षाविद को अपना पासपोर्ट जमा करने और लिखने से परहेज करने के लिए कहा गया है. अली खान का जेल में नहीं होना ही राहत की बात है.

प्रताप भानु मेहता लिखते हैं कि यह कल्पना करना कठिन है कि सर्वोच्च न्यायालय इतना भोला है कि वह यह नहीं समझ सकता कि प्रक्रिया के बहाने किस तरह सामाजिक नियंत्रण का प्रयोग किया जा रहा है और स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है. यदि किसी नागरिक की गिरफ्तारी के मामले में जमानत की शर्त किसी अपराध के लिए नहीं बल्कि अपने सामान्य अधिकारों का प्रयोग करने के लिए बोझिल है तो यह उस अधिकार की रक्षा करने की प्रक्रिया भी फ्री स्पीच के लिए बाधा है.

वे पांच मिनट के भीतर यह तय करने में सर्वोच्च रूप से सक्षम हैं कि खान की पोस्ट का स्पष्ट अर्थ या अस्पष्टता क्या हो सकती है. फिर भी एसआईटी के कठिन मार्ग से जाने का विकल्प चुना गया. कानूनी संस्कृति में बदलाव खतरनाक है. संवैधानिक और कानूनी मामले के तौर पर यह चिंताजनक होना चाहिए जब वादी को यह साबित करने के लिए मजबूर किया जाता है कि उनके भाषण मे देशभक्ति की योग्यता है. देशभक्ति एक अस्पष्ट चीज है. मानक कौन तय करता है? वर्तमान मानकों के तहत महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और संभवत: बीआर अंबेडकर को भी विभिन्न क्षणों में देशद्रोही माना जाता. कई मायनों में देशभक्ति के क्षेत्र को बदलकर न्यायालय जानबूझकर या अनजाने में एक विचारधारा को वैध बना रहा है. वह भाषण या स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर रहा है. देशभक्ति का शिक्षक बनना न्यायालय का काम नहीं है.

देशद्रोह और राजनीति

तवलीन सिंह ने जनसत्ता में अली खान महमूदाबाद से अपने पारिवारिक रिश्ते का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अली खान प्रतीक हैं भारत की मिली जुली संस्कृति के. उनके दादा पाकिस्तान में बस गये जो जिन्ना के करीबी थे. लेकिन, परिवार ने हिन्दुस्तान में रहने का फैसला किया. महमूदाबाद की जायदाद सरकार ने शत्रु कानून के तहत हड़प ली, फिर भी कुछ किले, जमीन बचा पाने में यह परिवार कामयाब रहा. अली का दोष यह है कि उन्होंने याद दिलाया कि हिन्दुत्व के वही सिपाही जो सोफिया कुरैशी की प्रशंसा कर रहे थे, उनको उन आम बेबस मुसलमानों की भी चिंता होनी चाहिए जिनके घर बुलडोजरों से गिराए जाते हैं बिना किसी अदालत में आरोप साबित हुए. क्या ऐसा कहने से देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरा है? क्या सोशल मीडिया पर इस बात को कहने से हिंदुओं और मुसलमानों में द्वेष पैदा होता है?

तवलीन सिंह लिखती हैं कि समझना मुश्किल है कि अली ने गलत क्या कहा. लेकिन, जब भारतीय जनता पार्टी के अधिकारी चाहते हैं किसी की गिरफ्तारी तो अक्सर होकर रहती है. अली को फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय से अंतरिम जमानत मिल गयी है. सो, कम से कम ये अपनी पत्नी के साथ रह सकेंगे जब उनका पहला बच्चा कुछ दिनों में पैदा होगा. एक गौरवान्वित भारतीय होने के नाते लेखिका को शर्म आती है कि इस देश को इतनी छोटी चीजों से खतरा होने लगा है.

लेखिका ने अपने साथ घटी घटना का भी जिक्र किया है. एक साहित्य सम्मेलन में उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले का समर्थन किया था. उसी सम्मेलन में राधा कुमार भी शामिल थीं जिनकी राय इतर थी. दोनों पर ही देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करा दिया गया. मुकदमा दर्ज कराने वाला आज टीवी चैनल पर भाजपा प्रवक्ता बना बैठता है. लेखिका का कहना है कि छुटभैया भाजपाई नेता और पदाधिकारी इस तरह की हरकतें करते फिरते हैं. आला नेता ऐसे लोगों को कभी ना कभी पार्टी की सीढ़ियां चढ़ाने में मदद करते हैं.

विपक्ष से एजेंडा छीन लेगी जाति जनगणना?

आसिम अली ने टेलीग्राफ में लिखा है कि कई लोग मानते हैं कि जाति जनगणना के फैसले से मोदी सरकार ने विपक्ष का एजेंडा छीन लिया है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जाति की राजनीति को वैध बनाने से भारतीय जनता पार्टी का अपना अखिल हिन्दू समर्थन आधार कमजोर हो जाएगा. दोनों में से कौन सा दृष्टिकोण अधिक सही है? इसका सरल उत्तर यह है कि राजनीति किसी पूर्व निर्धारित मार्ग का अनुसरण नहीं करती. मोदी सरकार द्वारा जाति जनगणना के एजेंडे को खत्म करने को राजीव गांधी सरकार द्वारा बाबरी मस्जिद के ताले खोलने के राजनीतिक समकक्ष के रूप में देखा जा सकता है.

आसिम अली ने लिखा है कि शाहबानो के फैसले को पलटने के ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के बाद एक प्रतिक्रियात्मक ‘हिन्दू तुष्टिकरण’ दिखा था. कांग्रेस के बाबरी पैंतरे को पीछे मुड़कर देखने पर एक रणनीतिक भूल के रूप में आंका जाता है जिसने पार्टी को उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रमुख राज्यों से बाहर कर दिया. इसने कांग्रेस के सामाजिक गठबंधन के धागे खोल दिए. भाजपा ने ऊंची जातियों को हड़प लिया और वामपंथी (मंडल पार्टियों) ने मुसलमानों को.

लेखक ने एंड्रयू व्याट के अध्ययन के हवाले से लिखा है, “द्रविड़ पहचान यह दर्शाती है कि राजनीतिक पहचान कैसे गढ़ी जा सकती है.” यही बात ओबीसी या बहुजन पहचान या एक छत्र हिंदू या मुस्लिम पहचान के बारे में भी कही जा सकती है. 1970 के दशक से भारतीय राजनीति जाति, वर्ग, भाषा और धर्म के गिर्द घूमने लगी. 1980 के दशक में कांग्रेस ने एक बार फिर एक वर्चस्ववादी गुट बनाने की कोशिश की. 1983 में इंदिरा गांधी ने कुरुक्षेत्र में दावा किया कि “हिन्दू धर्म (आस्था) पर सिखों द्वारा हमला किया जा रहा है.” उन्होंने कश्मीर में अल्पसंख्यकों को देश के प्रति कर्तव्यों की याद दिलाते हुए धर्म युद्ध की चेतावनी भी दी. 1984 की कांग्रेस के लिए सहानुभूति की लहर के पीछे ये मूल वजह रहीं.

लेखक का मानना है कि 2025 की मोदी सरकार 1986 की राजीव गांधी सरकार की तरह ही एक ऐसे शासन की शक्ल और सूरत है जो अपने चरम से गुजर चुकी है. विधानसभा चुनावों में चंद जीत से 2024 के लोकसभा चुनावों में हुए अपमानजनक उलटफेर को खत्म नहीं किया जा सकता, न ही गठबंधन के दबाव की नई वास्तविकता को.
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बिहार की सियासत का ‘चिराग’

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि गृहमंत्री अमित शाह एलान कर चुके हैं कि एनडीए गठबंधन के विजयी होने पर नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहेंगे. मगर, बिहार में इधर-उधर दिख रहे पोस्टर में चिराग पासवान की दावेदारी नजर आ रही है- ‘नेक्स्ट सीएम चिराग पासवान’. एक अन्य पोस्टर में लिखा है, “न दंगा होगा, न फसाद होगा, न बवाल होगा क्योंकि हमारा मुख्यमंत्री चिराग पासवान होगा.” चिराग भी इस बात से इनकार नहीं कर रहे हैं कि उनमें मुख्यमंत्री बनने और यह पद संभालने की योग्यता है. वह कह चुके हैं कि उनकी सोच उनके पिता से अलग है जिनकी राज्य के बजाए राष्ट्रीय राजनीति मे अधिक दिलचस्पी थी. रामविलास पासवान छह प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री रहे.

अदिति लिखती हैं कि बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव में चिराग का नारा ‘बिहार प्रथम’ और ‘बिहारी प्रथम’ है. विधानसभा चुनाव लड़ने की संभावना से चिराग ने इनकार किया है. केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री चिराग पासवान ने कहा है कि कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक बयान देने वाले मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह को पार्टी से निकाल देते अगर वे उनकी पार्टी में होते. वास्तव में चिराग मुस्लिम मतदाताओं को एनडीए से जोड़ने का जरिया बने रहना चाहते हैं.

2020 के विधानसभा चुनाव में 137 सीटों पर चुनाव लड़कर चिराग की पार्टी ने 5.7 प्रतिशत वोट हासिल किया था. 25 से अधिक सीटों पर जेडीयू के वोट में सेंधमारी की थी. 2024 में केवल पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़कर सभी पर जीत हासिल करना भी बड़ी उपलब्धि रही. चिराग की पार्टी को 7 प्रतिशत वोट मिले. चिराग खुद को दलितों का भरोसेमंद चेहरा मानते हैं. मगर, भाजपा में कई लोग ऐसा नहीं मानते. ऐसे लोग चिराग की चुनावी सफलता को बीजेपी की सफलता के तौर पर देखते हैं. गठबंधन में चुनाव लड़ने के लिए चिराग को पर्याप्त सीटें मिलना महत्वपूर्ण होगा. पिछले दिनों तेजस्वी यादव के साथ चिराग की मुलाकात गर्मजोशी के साथ हुई थी.

शांत पानी के भीतर बवंडर

अनु अग्रवाल ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि शांत पानी के भीतर भी बवंडर बन रहा होता है जो तत्क्षण दिखाई नहीं देता है. यह बात भावनाओं पर भी लागू होती है. अधिक दिन नहीं हुए जब शांतिपूर्ण वातावरण और मैत्रीपूर्ण कश्मीरियों के बीच लेखिका ने फोटो सूट के बीच कश्मीर के डल झील में स्वादिष्ट पका हुआ कमल का तना खाया था. कमल से भरी झील के बीचो-बीच नाव पर फैशन के साथ बैठे हुए डल के शांत पानी पर लेखिका की मौजूदगी कश्मीर की सुंदरता और महिमा की याद दिलाती है. 22 अप्रैल को पहलगाम में सीमा पार से आतंकवादी हमला हुआ जिसमें 26 निर्दोष नागरिक मारे गये. इसने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया और भारत से मजबूत व निर्णायक प्रतिक्रिया को प्रेरित किया.

अनु अग्रवाल लिखती हैं कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर किया जिसकी एक व्याख्या यह थी कि महिलाओं के पतियों की जान चली गईं जो उनका सिंदूर थे. मीडिया ने पूर्व मॉडल व पूर्व अभिनेत्री लेखिका से पूछा कि “ऑपरेशन सिंदूर के बारे में ज्यादातर सितारे चुप क्यों हैं?”

ब्लॉक बस्टर फिल्म आशिकी से कुछ साल पहले की बात याद करती हुई अनु लिखती हैं कि उस समय में उन पहली मॉडलों में वह थीं जिनका मीडिया पीछा करता था जैसे वह कोई स्टार हो. हिंसक उग्रवाद से अलग होना आगे बढ़ने का सकारात्मक तरीका है. फिर भी “घृणा कभी घृणा से समाप्त नहीं होती, केवल प्रेम से ही इसका समाधान होता है.” सहस्राब्दियों से, संस्कृतियों और सभ्यताओं में, ऋषियों और दार्शनिकों और परमहंस योगियों, गुरुओं ने महसूस किया है कि जिस दुनिया को हम इंद्रियों के माध्यम से देखते हैं वह नकली है, एक सपना है, नाटक है, वास्तविक नहीं है. प्रकाश के कारण ही अंधकार मौजूद है.

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