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सुनंदा के दत्ता रे ने टेलीग्राफ में लिखा है कि ऑपरेशन सिंदूर ने अपने हिंदू नाम के साथ पहलगाम का कुछ हद तक बदला लिया होगा. लेकिन, क्या इससे आतंकवाद खत्म हो जाएगा, भले ही मारे गये सभी लोग आतंकवादी थे और हम यह नहीं जान पाएंगे कि वे कितने थे जब तक कि भारत और पाकिस्तान एक साथ सूची नहीं बना लेते? क्या इससे कश्मीर विवाद हल हो जाएगा जो उपमहाद्वीपीय विभाजन के केंद्र में है? ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेन्स के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने कश्मीर को ‘विभाजन के अधूरे काम’ का हिस्सा बताया है.
उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में स्वीकार किया कि उनकी सरकार ने दो वर्षों में 35.12 लाख से अधिक निवास प्रमाण पत्र जारी किए हैं जिनमें से 83,742 ऐसे व्यक्तियों को दिए गये हैं जो मूल रूप से राज्य के नागरिक नहीं थे. इससे मतदाताओं को चिढ़ होनी चाहिए. इस बीच दोनों पक्षों द्वारा जिस तरह से घातक प्रतिशोध का खेल खेला जा रहा है वह लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेरॉय द्वारा हमारे टीवी स्टूडियो को ‘मूर्खता का गढ़’ करार दिए जाने को उचित ठहराता है. भारत ने संकट के क्षणों में ब्रिटेन को भी हिला देने वाले उन्माद का प्रदर्शन नहीं किया. आधिकारिक कार्रवाई को अभी भी सार्वजनिक भावनाओं के सहज विस्फोट के रूप में नहीं समझा जा सकता है.
प्रशांत झा ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि भारत ने दिखा दिया है कि वह पाकिस्तानी धरती से होने वाले आतंकी हमलों को स्वीकार नहीं करेगा. भारत ने इसका मुकाबला करने के लिए गंभीर राजनीतिक इरादे और सैन्य क्षमता प्रदर्शित की है. पाकिस्तान ने दिखाया है कि वह आसानी से पराजित नहीं हो सकता. चीन ने दिखाया है कि वह भारत को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा. और, अमेरिका ने दिखाया है कि दुनिया में युद्ध और शांति के पाठ्यक्रम को आकार देने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में निर्णायक खिलाड़ी बना हुआ है.
ड्रोन ने युद्ध का नया अध्याय खोल दिया है. पाकिस्तान ने भारत की हवाई सुरक्षा को कमजोर करने की क्षमता दिखाई है. परमाणु ब्लैकमेल का विकल्प जारी है. पाकिस्तान की विनाश करने की क्षमता को कम नहीं आंकना चाहिए और इस प्रकरण में यह स्पष्ट रूप से दिखाई दिया. बीते पांच दिन में यह भी साफ हुआ है कि चीन के साथ भारत के तनाव गहरे हैं और इसमें पाकिस्तान का भी मजबूत आयाम है. रूस के साथ चीन के संबंधों का मतलब है कि मॉस्को अब पाकिस्तान के मामले में भी पहले की तरह भारत का उतना मजबूत सहयोगी नहीं रह सकता.
तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि 26/11 के बाद अगर भारत ने ऑपरेशन सिंदूर जैसा कुछ किया गया होता तो शायद पाकिस्तान की सेना अपनी जिहादी संस्थाओं को अभी तक समाप्त कर चुकी होती. क्या पाकिस्तान के फौजी शासक अब ऐसा करेंगे? कहना मुश्किल है लेकिन हम इतना जरूर कह सकते हैं कि उनको इतना तो पता लग गया होगा कि अगर वे जिहादी आतंकवाद पर रोक नहीं लगाएंगे तो भारत चुप नहीं बैठेगा.
जवाब यह होना चाहिए कि जो सोच उन दरिंदों की थी, वह पाकिस्तानी थी और अगर यह जिहादी सोच हमारे देश में फैली है तो सिर्फ इसलिए कि यह सोच कट्टरपंथी है और पाकिस्तान कट्टरपंथ की वजह से पैदा हुआ था. यह बात वहां के सेनाध्यक्ष ने पहलगाम हमले से कुछ दिन पहले ही कहा था कि मुसलमान हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते हैं इसलिए पाकिस्तान बना था.
ऐसा नहीं है कि जिहादी आतंकवाद अब समाप्त हो गया है. पाकिस्तानी सेना ने उसको पहले भी जीवित रखा था और भविष्य में उसको जीवित रखने का काम फिर से आसिम मुनीर जैसे ‘जरनैल’ करते रहेंगे. लेकिन, अब भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए उनके संदेश दिया है कि वो आतंकवादी हरकतों को चुपचाप नहीं सहेगा. उम्मीद है कि पाकिस्तान को भी पता लग गया होगा कि जिहादी आतंकवाद को अब भारत बर्दाश्त नहीं करने वाला है.
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस-यूक्रेन संघर्ष के शुरुआती दिनों में हस्तक्षेप किया था और 16 सितंबर 2022 को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा था, ‘यह युद्ध का युग नहीं है’. इन शब्दों ने नरेंद्र मोदी को पूरी दुनिया में गर्मजोशी से भरी तालियां दिलाई थीं. भारत में भी उन्होंने अपने लिए एक राजनेता और शांतिदूत के रूप में प्रशंसा हासिल की.
चिदंबरम लिखते हैं कि भारत की प्रतिक्रिया ने नागरिक बस्तियों या संपत्ति को निशाना नहीं बनाया. न ही इसका लक्ष्य पाकिस्तान का सैन्य बुनियादी ढांचा था. इसके बाद जैसा अपेक्षित था पाकिस्तान ने सेना के जनरलों और आईएसआई के प्रभाव में एकमात्र तरीके से जवाबी कार्रवाई की- नियंत्रण रेखा के पार गोलीबारी. अगर पाकिस्तान ने पूर्ण पैमाने पर युद्ध शुरू किया होता तो उसे ओआईसी सहित अन्य देशों की निंदा का सामना करना पड़ता. किसी भी संघर्ष में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि केवल किसी एक पक्ष को ही जान या सैन्य उपकरणों का नुकसान होगा.
अजय साहनी ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि मणिपुर में जातीय संघर्ष के दो साल पूरे होने की तारीख 3 मई बिना किसी हलचल के बीत गयी. पिछले लगभग दो सालों से एक राज्य में मनमाने ढंग से सीमा खींची गयी है जो दो युद्धरत समुदायों को अलग करती है. बीच मे एक ‘बफर जोन’ या नो मैन्स लैंड है जिस पर सेना और सीआरपीएफ द्वारा गश्त और निगरानी की जाती है. आजादी के बाद से भारत में कहीं भी ऐसी स्थिति नहीं रही है. इससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि यह एक सीमावर्ती राज्य में होने दिया जा रहा है जो हिंसा से ग्रस्त और असफल म्यांमार राज्य से सटा हुआ है और अराजकता के कगार पर खड़े दूसरे देश बांग्लादेश से बहुत दूर नहीं है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुलह की दिशा में किसी भी महत्वपूर्ण कदम के लिए केंद्र की ओर से वर्तमान राजनीतिक स्पेक्ट्रम में चरमपंथी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए शक्तिशाली राजनीतिक पहल की जरूरत होगी. लेकिन, इसके सबूत दिखते नहीं हैं. हिंसा और राजनीतिक दुर्भावना ने मणिपुर में कुकी और मैतेई के बीच नफरत और संदेह की खाई पैदा कर दी है और निकट भविष्य में इसके भर जाने की संभावना नहीं है.
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