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संडे व्यू: ट्रंप अमेरिका को महान बना रहे या कमजोर? बिना उकसावे के युद्ध क्यों?

पढ़ें इस रविवार करन थापर, अदिति फडणीस, आसिम अली, पी चिदंबरम और देवदत्त पटनायक के विचारों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>संडे व्यू: ट्रंप अमेरिका को महान बना रहे या कमजोर? बिना उकसावे के युद्ध क्यों? </p></div>
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संडे व्यू: ट्रंप अमेरिका को महान बना रहे या कमजोर? बिना उकसावे के युद्ध क्यों?

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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ट्रंप अमेरिका को महान बना रहे या कमजोर?

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि जब वे छोटे थे तो अमेरिका के साथ जिस डोनाल्ड को जोड़ते थे वह बत्तख था. इन दिनों ट्रंप हैं. इन दोनों में से कौन इस शक्तिशाली देश का अधिक प्रतिनिधित्व करता है इसे लेकर लेखक दुविधा मे हैं. प्रथम विश्वयुद्ध से पहले और बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति रहे जॉर्जेस क्लेमेंस्यू अमेरिका के बारे में बताया करते थे कि "अमेरिका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो सभ्यता के मध्यवर्ती चरण का अनुभव किए बिना बर्बरता से पतन की ओर आगे बढ़ा है."

डोनाल्ड और वोलोदिमीर जेलेंस्की के बीच जो अविश्वसनीय झगड़ा हुआ है वह न केवल अशोभनीय है बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति के व्यवहार का दिलचस्प उदाहरण भी है. डोनाल्ड ट्रंप ने जेलेंस्की को ‘तानाशाह’ कहा जिसने बहुत बुरा काम किया है. उनका दावा है कि जेलेंस्की को केवल 4% समर्थन प्राप्त है जबकि यूक्रेन के अपने सर्वेक्षण में यह समर्थन 57% है.

करन थापर लिखते हैं कि जेलेंस्की का कहना है कि 4% का आंकड़ा रूसी प्रचार है. ब्रिटिश पीएम स्टार्मर ने ट्रंप के साथ तनावपूर्ण बातचीत के बाद लंदन में जेलेंस्की को गले लगाया. ट्रंप का दावा है कि रूस शांति चाहता है और जेलेंस्की इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं कि उन्हें बातचीत में शामिल किया जाए. जवाब में जेलेंस्की ने ट्रंप पर गलत रूसी सूचना के बुलबुले में रहने का आरोप लगाया. उन्होंने यूक्रेन को अमेरिकी सहायता के एवज में 500 मिलियन डॉलर के अमेरिकी बिल पर भी आपत्ति जताई. यह अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल वाल्ट्ज दोनों को भड़काने के लिए पर्याप्त था. उन्होंने ट्रंप के लिए बुरा नहीं बोलने की चेतावनी दी. अब हमें इस सबका क्या मतलब निकालना चाहिए? डोनाल्ड डक जो एक सौम्य हास्य के साथ अच्छे व्यवहार का मॉडल है खुश नहीं होता. वह बड़बड़ाता है. क्लेमेंस्यू ने इसे अपनी राय के सबूत के रूप में देखा होगा. केवल पतित व्यक्ति ही इस तरह का व्यवहार कर सकता है.

हथकड़ी और बेड़ियों ने भी क्यों नहीं हलचल मचाई?

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि भारत और अमेरिका के रिश्तों पर देसी राजनीति में हमेशा से ही गरमागरम बहस होती रही है. अमेरिका ने 1956 में भारत की गुटनिरपेक्षता को ‘अनैतिक और बेवकूफाना’ बताया था जिसके बाद पूरी संसद पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ खड़ी हो गई थी. इंदिरा गांधी ने 1971 में तत्कालीन सोवियत संघ के साथ शांति, मैत्री तथा सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके साथ यह बात भी साफ हो गयी कि भारत सोवियत संघ के पाले में खड़ा है. उस समय अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर हो रहा था.

इस संधि को इंदिरा गांधी की चाल भी कहा जाता है जो उन्होंने 1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद अपने नेतृत्व को मिल रही चुनौती खत्म करने के इरादे से चली थी. उन्होंने अमेरिका को विदेशी ताकत करार देते हुए उसके प्रति शत्रुता की धारणा गढ़ी और उसे हवा भी दी. बाद में हुए चुनावों में यह राजनीतिक जुमला बन गया जिसका जमकर इस्तेमाल किया गया. भारत और अमेरिका में 2008 में असैन्य परमाणु समझौता होने पर वामपंथी पार्टियो ने समर्थन वापस ले लिया था.

अदिति लिखती हैं कि आज अमेरिका से हथकड़ियां और बेड़ियां पहनाकर भारत भेजे गये अपमानित और हताश भारतीयों की तस्वीरों ने भी देश की राजनीति में कोई हलचल नहीं मचाई तो इसकी वजह क्या है? गुजरात में पूर्व उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने आवाज उठाई तो गुजरात सरकार ने जवाब में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को धर पकड़ा और शिविरों में रख दिया, जहां से उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाएगा. गुजरात समेत पूरे देश में अवैध प्रवासी भारतीयों के लिए सहानुभूति नहीं दिखी. हरियाणा के मंत्री अनिल विज, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की राय भी विज जैसी ही दिखी. पंजाब में आम आदमी पार्टी नेताओं का रुख इस मामले में केंद्र सरकार के विरोध वाला रहा. कांग्रेस ने भी गुजरात और तेलंगाना में प्रदर्शन किए. ममता, उद्धव ने भी सवाल उठाए. इन सबके बावजूद लोग सड़कों पर नहीं आए. सरकार ने जरूर राजनीतिक पहल कर दी है. अमेरिका की तर्ज पर वह भी भारत में बैठे अवैध घुसपैठियों को उनके देश भेज सकती है.

‘रचनात्मक विनाश’ की ओर देश

आसिम अली ने वेंचर कैपिटल फर्म ब्लूम के रिसर्च के हवाले से टेलीग्राफ में लिखा है कि भारत में केवल 10 प्रतिशत लोग ही उपभोक्ता वर्ग का हिस्सा हैं. एक अरब लोगों के पास बुनियादी जरूरतों को छोड़कर कोई क्रयशक्ति नहीं है. इसके अलावा उच्च मध्यमवर्ग मजबूत हो रहा है लेकिन इसका फैलाव नहीं हो रहा है. इसके आसार हैं कि अमीरों का समूह और अमीर हो, लेकिन उनकी संख्या बढ़ती नहीं दिख रही है.

केंद्र सरकार की ओर से जारी आर्थिक सर्वेक्षण से भी चौंकाने वाले आंकड़े मिल रहे हैं. केवल 8 प्रतिशत भारतीय ग्रेजुएट ही अपनी योग्यता से मेल करने वाली नौकरी में हैं. हमारे कार्यबल का 88.2% कम योग्यता वाले व्यवसायों में हैं. 2020 वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम सर्वे कहता है कि ‘इंटर जेनरेशनल अपवार्ड मोबिलिटी’ के मामले में भारत का स्थान 82 देशों में नीचे से सातवां हैं.

आसिम अली लिखते हैं कि एशियाई विकास बैंक की 2020 की रिपोर्ट कहती है कि कुल रोजगार में एसएमई का हिस्सा जापान में 70 फीसद, कोरिया में 89 फीसद और चीन में 90 फीसद है. भारत में यह हिस्सा महज 40 फीसद है. चुनावी बॉन्ड की कहानी ने राजनीतिक और कुलीन वर्ग के बीच मिलीभगत पर रोशनी डाली है. 2024 के चुनावों को द इकॉनोमिस्ट ने दुनिया का सबसे महंगा चुनाव करार दिया है. भारत में केवल सूचना प्रौद्योगिकी और फार्मास्यूटिकल्स गतिशील और निर्यात उन्मुख क्षेत्र रह गये हैं. जीएसटी, विमुद्रीकरण और कोविड महामारी के लगातार प्रहारों ने देश को झकझोरा है. रचनात्मक विनाश प्रक्रिया के तौर पर इसे चिन्हित किया जा रहा है और देश इसके विनाशकारी नतीजों को भुगतने के लिए अभिशप्त है.

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बिना उकसावे के युद्ध

पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि बिना उकसावे के युद्ध किसी बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए नहीं बल्कि पक्षपातपूर्ण विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए होते हैं. बीजेपी को बिना उकसावे के युद्ध शुरू करने का शौक है. नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) इसके उदाहरण हैं. इन्हें किसी जरूरत को पूरा करने के लिए नहीं बनाया गया था. दोनों को आरएसएस-बीजेपी ने हिन्दू और गैर हिन्दू समुदायों के बीच मतभेद पैदा करने के लिए आगे बढ़ाया है. केंद्र सरकार ने एक और बिना उकसावे के युद्ध का बिगुल फूंका है. इस बार भाषा पर. तथाकथि त्रिभाषा फॉर्मूला (टीएलएफ) को सबसे पहले राधाकृष्णन समिति ने पेश किया था. किसी भी राज्य ने कभी टीएलएफ को लागू नहीं किया.

पी चिदंबरम लिखते हैं कि भाषा ‘शिक्षा’ के कारण नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 343 के कारण विस्फोटक मुद्दा बन गयी. घोषणा की गयी कि हिन्दी संघ की आधिकारिक भाषा होगी लेकिन अंग्रेजी का उपयोग पंद्रह साल की अवधि के लिए जारी रहेगा. पंद्रह साल 1965 में समाप्त हो गये. एक अविवेकपूर्ण तरीके से तत्कालीन सरकार ने घोषणा की कि 26 जनवरी 1965 से हिन्दी एकमात्र आधिकारिक भाषा होगी. तत्काल प्रतिक्रिया हुई. तमिलनाडु में राजनीति ने करवट ली और एक द्रविड़ पार्टी सत्ता में आ गयी.

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वादा किया था कि जब तक गैर हिन्दी भाषी लोग चाहेंगे तब तक अंग्रेजी सहआधिकारिक भाषा के रूप में जारी रहेगी. 1975 में ‘शिक्षा’ को समवर्ती सूची में डालना, 1991 में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की तरह अनिवार्य रूप से अंग्रेजी को अपनाया जाना और अभिभावकों की ओर से अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की मांग का बढ़ना महत्वपूर्ण घटनाएं हैं. सरकार दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी पढ़ाने में विफल रही है. ऐसे में सरकार को तीसरी भाषा पढ़ाने में सफल होने की महत्वाकांक्षा क्यों है?

क्या जीसस बुद्ध से प्रेरित हुए?

देवदत्त पटनायक ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि बुद्ध की कहानी हमें लगभग 2500 साल पहले की लगती है जिसकी शुरुआत भारत के पूर्वी हिस्से से हुई थी. जीसस की कहानी 2000 साल पुरानी है और यह पश्चिमी एशिया से आयी है. कई लोगों का मानना है कि जीसस ने अपने जीवन के कई साल पूर्व की यात्रा करते हुए बौद्ध भिक्षुओं और मठों के बीच बातचीत करते हुए और संभवत: कश्मीर तक की यात्रा करते हुए बिताए. इस बात के भी पुख्ता संकेत हैं कि बाद में ईसाई संस्थाएं पूर्व के विचारों से काफी प्रभावित रहीं.

बौद्ध धर्म से मठवासी समुदाय या संघ जैसी अवधारणाएं आईं. बौद्ध भिक्षु ब्रह्मचर्य, एकांत और स्वीकारोक्ति का अभ्यास करते थे जो ईसाई धर्म में भी देखी जाती है. पश्चिमी आस्था पर भारतीय प्रभाव की संभावना को समझने के लिए हमें ज्ञानवादी परंपराओं का पता लगाना चाहिए.

देवदत्त पटनायक ने लिखा है कि ज्ञानवादी लोग मानते थे कि शुद्ध आत्मा अशुद्ध शरीर में फंसी हुई थी और प्रदूषित दुनिया में मौजूद थी. उनकी मान्यताओं के अनुसार जीवन का उद्देश्य शुद्धिकरण के कार्यों के माध्यम से इस भ्रष्ट अस्तित्व से मुक्त होना था. उपवास और ब्रह्मचर्य का पालन करना, भौतिक संपदा से दूर रहना, विवाह से परहेज, बहते पानी में शरीर को शुद्ध करना और आध्यात्मिक मुक्ति की तलाश ज्ञानवाद की खासियत रही है. पश्चिम एशिया में मंडियन समुदाय इसी विश्वास से जुड़ा है.

न्यू टेस्टामेंट के जॉन द बैपटिस्ट भी हैं जिन्होंने यीशु को बपतिस्मा दिया था. मध्य एशिया और फारस में पारसी धर्म के साथ भी ज्ञानवाद का विस्तार हुआ. भारत में ज्ञानवादी अवधारणाओं ने बौद्ध धर्म और जैन धर्म का रूप ले लिया. बुद्ध और यीशु के बारे में आख्यानों में आश्चर्यजनक समानताएं हैं. बुद्ध शाही परिवार से आए थे तो यीशु की वंशावली डेविड के शाही घराने से जुड़ी हुई है. दोनों ही आकृतियां चमत्कारी जन्मों से जुड़ी हुई है. बुद्ध अपनी पत्नी को छोड़ देते हैं और सांसारिक मोह माया त्याग देते हैं. यीशु कभी शादी नहीं करते. बुद्ध 80 साल की आयु में शांतिपूर्वक मर जाते हैं. यीशु को रोमनों द्वारा क्रूरतापूर्लवक सूली पर चढ़ा दिया जाता है.

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