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संडे व्यू: तानाशाही से लड़ाई का दौर, ट्रंप को मोदी ने बेनकाब कर दिया

पढ़ें इस रविवार करन थापर, तेजस्वी यादव, आसिम अली, अदिति फडणीस और प्रभु चावला के विचारों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
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<div class="paragraphs"><p>पढ़ें इस रविवार करन थापर, तेजस्वी यादव, आसिम अली, अदिति फडणीस और प्रभु चावला के विचारों का सार.</p></div>
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पढ़ें इस रविवार करन थापर, तेजस्वी यादव, आसिम अली, अदिति फडणीस और प्रभु चावला के विचारों का सार.

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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देश का दुखद अनुभव ‘आपातकाल’

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि श्रीनाथ राघवन की ताजातरीन प्रकाशित किताब “इंदिरा गांधी एंड द इयर्स दैट ट्रांसफ़र्म्ड इंडिया” में आपातकाल को “स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे दुखद अनुभव” बताया गया है. सच यह है, जैसा कि श्रीनाथ राघवन की किताब में बताया गया है, इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र को कभी बहुत महत्व नहीं दिया. आपातकाल के ठंडे तथ्य रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं: 34,988 लोगों को मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत हिरासत में लिया गया, जबकि 75,818 को डिफेंस ऑफ इंडिया नियमों के तहत गिरफ्तार किया गया; लगभग पूरा विपक्ष जेल में डाल दिया गया; प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई; संविधान को बेरहमी से संशोधित किया गया; और यहां तक कि न्यायपालिका ने भी स्वीकार कर लिया कि जीवन का अधिकार निलंबित कर दिया गया था.

करन थापर ने लिखा है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि आपातकाल इंदिरा गांधी के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए घोषित किया गया था, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी चुनावी जीत को रद्द कर दिया और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें केवल सशर्त राहत दी. उनका दावा कि यह जरूरी था क्योंकि विपक्ष सरकार को पंगु करने की कोशिश कर रहा था और जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिस को आदेशों की अवहेलना करने का आह्वान किया था, केवल एक मनगढ़ंत बहाना था.

राघवन के हवाले से करन थापर ने लिखा है कि 25 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा वास्तव में “एक तख्तापलट” थी. तीन महत्वपूर्ण बातों पर गौर करना जरूरी है. पहला, संविधान के तहत एक समय में केवल एक आपातकाल हो सकता है, और 1975 में 1971 के बांग्लादेश युद्ध से संबंधित एक बाहरी आपातकाल पहले से ही लागू था. दूसरा, अनुच्छेद 352 के तहत, राष्ट्रपति केवल मंत्रिपरिषद की लिखित सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं. राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इसका इंतजार नहीं किया. उन्होंने प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत अनुरोध पर ऐसा किया. तीसरा, 25/26 जून की रात को बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और समाचार पत्रों के कार्यालयों की बिजली काटना “किसी कानूनी आधार के बिना था और पूरी तरह से प्रधानमंत्री के इशारे पर किया गया”.

लोकतंत्र और तानाशाही में निर्णायक लड़ाई का दौर

आसिम अली ने टेलीग्राफ में लिखा है कि पिछले आधे दशक में, पश्चिमी नेताओं ने बार-बार इस विचार को दोहराया है कि विश्व एक युग-निर्णायक 'लोकतंत्र और तानाशाही के बीच लड़ाई' में उलझा हुआ है. इस निर्णायक लड़ाई में, पहला पक्ष (मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप) जनसंप्रभुता, लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं, और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के सिद्धांतों का प्रतीक माना जाता है, जबकि दूसरा पक्ष (मुख्य रूप से रूस और चीन) अभिजात्य शासन, राज्य दमन, और बाहरी आक्रामकता का गढ़ माना जाता है. पश्चिम द्वारा समर्थित गाजा में इजरायली नरसंहार और अब ईरान के साथ पूर्व-नियोजित युद्ध ने इस सरलीकृत वैधता के ढांचे को पूरी तरह से खोखला कर दिया है. इजरायल के युद्धों के लिए पश्चिमी देशों का व्यापक सैन्य और कूटनीतिक समर्थन उनके अपने नागरिकों की व्यक्त इच्छा के विपरीत है.

आसिम अली लिखते हैं कि शक्ति का सबसे गहरा आयाम है — वैचारिक शक्ति — जहां अभिजात्य नियंत्रण उन आधारभूत प्रतीकों और मिथकों पर आधारित होता है, जिनके माध्यम से हम 'विश्व को पहचानते हैं' और जो हमारी पहचान और इच्छाओं को आकार देते हैं. यह प्रतीकात्मक आयाम ही है जिसके माध्यम से राजनीतिक अभिजात्य 'सांस्कृतिक मुद्दों' पर वैचारिक उग्रवाद को बढ़ावा देते हैं. साथ ही 'भौतिक मुद्दों' पर जनता की उम्मीदों को प्रोत्साहित करते हैं.

यूरोप और लैटिन अमेरिका में 20वीं सदी में लोकतंत्रों के टूटने के अपने सर्वे में, राजनीतिक वैज्ञानिक नैन्सी बर्मियो ने निष्कर्ष निकाला कि सामान्य नागरिकों के बजाय "राजनीतिक अभिजात्य" आमतौर पर लोकतंत्र से तानाशाही की ओर बढ़ने में "मुख्य अभिनेतता" होते हैं.. "लोकतंत्रें तभी पतन होंगी यदि अभिनेतता इन्हें जानबूझकर विघटित करते हैं, और इस विघटित करने की प्रक्रिया में मुख्य अभिनेतता राजनीतिक अभिजात्य होते हैं.." विश्व भर में, अमेरिका से यूरोप तक भारत तक, लोकतंत्र एक उदास सूर्यास्त में प्रवेश कर चुके हैं, न केवल 'तानाशाहीकरण' करने वालों की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाइत्यों से, बल्कि उनके उदार विरोधियों की नाकारा निष्क्रियता के कारण भी.

जाति जनगणना पर नीतीश का ‘पाखंड’ उजागर!

तेजस्वी यादव ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि हाल ही में उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जाति जनगणना के संदर्भ में संपर्क किया था और उनकी मांग पर चुप्पी से सीएम नीतीश का पाखंड उजागर हो गया है. नीतीश का कुछ न कहना स्पष्ट रूप से गरीबों, उत्पीड़ित लोगों और हाशिए पर रहने वालों के प्रति उनकी गहरी वैचारिक और शत्रुतापूर्ण रवैये को दर्शाता है.

तेजस्वी लिखते हैं कि विस्तृत जाति डेटा ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित और हाशिए पर रहने वाले समूहों को एक शक्तिशाली चुनावी और नीतिगत हथियार प्रदान करेगा. इससे आरक्षण वास्तविक आधार पर पुनर्गठित और संरक्षित होगा. एक वैज्ञानिक जाति जनगणना के निष्कर्षों के आधार पर बढ़े हुए आरक्षण कोटे का कार्यान्वयन एक राजनीतिक निर्णय और संवैधानिक समानता और न्याय के आदर्शों में निहित सामाजिक-आर्थिक अनिवार्यता होगी.

तेजस्वी ने अपने लेख में इस बात पर जोर दिया है कि हमारी तरह की विपक्षी पार्टियां जाति जनगणना के लिए जोर दे रही हैं क्योंकि यह संविधान में किए गए वचनों को मजबूत करता है. एक जाति जनगणना आरक्षण को इस तरह से पुनर्गठित करने के लिए अनुभवजन्य आधार प्रदान करती है जो जमीन पर वास्तविक सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को दर्शाता है. इससे समानता और सामाजिक न्याय का संवैधानिक वादा पूरा होता है.

तेजस्वी लिखते हैं कि जब तक हमें यह जनगणना नहीं मिलती, तब तक हमारा सामाजिक न्याय का संघर्ष विधानसभाओं, संसद, और हमारे लिए उपलब्ध प्रत्येक लोकतांत्रिक मंच के माध्यम से जारी रहेगा. सत्य को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता, और भारत के लोग उन नेताओं के हकदार हैं जो डेटा, दृढ़ संकल्प, और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के साथ उनके अधिकारों के लिए लड़ेंगे.
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नीतीश का आखिरी चुनाव!

अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक दलित विधायक के साथ हाल ही में हुई बातचीत में राज्य में आगामी विधान सभा चुनाव के बारे में नई सच्चाई सामने आई. समस्तीपुर क्षेत्र के विधायक एक गणितज्ञ हैं, वह पंचायत और बाद में 2020 के विधान सभा चुनाव लड़ने के लिए भाजपा द्वारा उनकी सेवाएं मांगे जाने तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में पूर्णकालिक प्रचारक भी थे. वह भाजपा में एक प्रभावशाली दलित आवाज हैं. उन्होंने बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री के बारे में कहा,

“हम वास्तव में नीतीश जी का सम्मान करते हैं, न केवल सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए, बल्कि उनके जीने के तरीके के लिए भी. उनका कोई परिवार नहीं है. पिछले इन सभी वर्षों में, उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है. उनके पास जो कुछ भी था, उन्होंने बिहार को दिया है. इस हिसाब से वह उन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो हमें आरएसएस में सिखाए गए हैं.“

नीतीश चुनावों में अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड का नेतृत्व कर रहे हैं और यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है.

अदिति फडणीस लिखती हैं कि बिहार के अत्यंत पिछड़े वर्ग (ईबीसी) और कुर्मी व कोइरी जातियां अभी भी नीतीश कुमार के पीछे मजबूती से खड़ी हैं. सामाजिक विरोधाभासों के कारण, उनके भाजपा में आने की संभावना नहीं है. नीतीश कुमार ने वैकल्पिक कुर्मी नेताओं को खड़ा करने की कोशिश की है जो उनके बाद बागडोर संभाल सकते हैं. अफसरशाह से राजनेता बने और कुर्मी आरसीपी सिंह ऐसे ही नेताओं में से एक थे. लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षा उन पर हावी हो गई. भाजपा के आकलन के अनुसार, बिहार के वर्तमान मंत्री श्रवण कुमार अगले सबसे अच्छे दावेदार हैं, जो नालंदा से सात से अधिक बार विधायक रह चुके हैं. नीतीश कुमार के प्रति उनकी निष्ठा निर्विवाद है और इसी तरह उनकी अपने समुदाय पर पकड़ भी. संजय झा और विजय कुमार चौधरी जेडीयू में प्रभावशाली हैं और नीतीश कुमार के विश्वासपात्र हैं. लेकिन वे उच्च जाति के हैं.

बेनकाब ‘सौदेबाज शांतिदूत’

प्रभु चावला ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि मध्यस्थता ही संदेश है. जब भी कोई संघर्ष उत्पन्न होता है तो राजनेता जो राजनयिक होने का तमगा चाहते हैं, तुरंत दौड़ पड़ते हैं और श्रेय लेने की कोशिश करते हैं. जब जून 2025 में डोनाल्ड ट्रम्प ने सुर्खियों में आकर दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम करवाया, तो उनकी घोषणा से ज़्यादा तेज़ थी नई दिल्ली की चुप्पी—जब तक कि यह एक फोन कॉल से टूट नहीं गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि युद्धविराम 1972 के शिमला समझौते पर आधारित सैन्य-से-सैन्य समझ का परिणाम था.

लेखक ने अपने सूत्रों के अनुसार हासिल जानकारी के आधार पर दावा किया है कि पीएम मोदी ने कहा, “भारत ने कभी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की, न ही कभी करेगा.” उनका तिरस्कार स्पष्ट था. यह तीखा आदान-प्रदान एक गहरे संकट को उजागर करता है—कि ईरान-इजरायल, इजरायल-हमास, रूस-यूक्रेन और भारत-पाकिस्तान जैसे युद्धों से टूटे हुए विश्व में विश्वसनीय, सर्वमान्य मध्यस्थों की पूर्ण अनुपस्थिति है. इसने कूटनीति को पंगु बना दिया है, जिससे हिंसा बेलगाम हो गई है.

प्रभु लिखते हैं कि आज के तथाकथित शांतिदूत सौदेबाज हैं. ट्रम्प का मध्यस्थता रिकॉर्ड एक दर्पणों का हॉल है: सर्बिया-कोसोवो की एक फोटो ऑप जो हफ्तों बाद ध्वस्त हो गई, एक उत्तर कोरिया शिखर सम्मेलन जो कहीं नहीं पहुंचा, और अब, दक्षिण एशिया में युद्धविराम का दावा जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया. यहां तक कि रूस के व्लादिमीर पुतिन, जिनके 2025 के मॉस्को-तेहरान समझौते ने उन्हें पश्चिम एशिया में मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, वह ईरान को ड्रोन और सामरिक सलाहकार प्रदान करने में इतना व्यस्त हैं कि इजरायल उसे गंभीरता से नहीं लेता.

दुनिया को एक शांतिदूत की सख्त जरूरत है, न कि एक लोकलुभावन, न ही सत्ता-लोलुप अवसरवादी, बल्कि कार्टर की नैतिक प्रामाणिकता और किसिंजर की भू-राजनीतिक चतुराई वाले राजनयिक की. जब तक ऐसा व्यक्ति नहीं उभरता, दुनिया में खून बहता रहेगा, लाखों लोग विस्थापित होंगे और विनाश पर फलने-फूलने वाला हथियार उद्योग पनपता रहेगा. मोदी का ट्रम्प को झिड़कना शायद व्यक्तिगत था. लेकिन इसने एक वैश्विक मूड को भी दर्शाया: अब बहुत हो चुका.
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