Members Only
lock close icon
Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Opinion Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019संडे व्यू : संसद में तमाशा, राजनीति का सेंटर बना पूजा स्थल अधिनियम

संडे व्यू : संसद में तमाशा, राजनीति का सेंटर बना पूजा स्थल अधिनियम

पढ़ें इस रविवार कपिल सिब्बल, तवलीन सिंह, वसुंधरा मुखर्जी, करन थापर और गोपाल कृष्ण गांधी के आलेखों का सार.

क्विंट हिंदी
नजरिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>संडे व्यू : संसद में तमाशा, राजनीति का सेंटर बना पूजा स्थल अधिनियम </p></div>
i

संडे व्यू : संसद में तमाशा, राजनीति का सेंटर बना पूजा स्थल अधिनियम

(फोटो: क्विंट हिंदी)

✕

advertisement

राजनीति का केंद्र बन गया है ‘पूजा स्थल अधिनियम’

इंडियन एक्सप्रेस में कपिल सिब्बल ने लिखा है कि जब हम लोगों ने खुद को भारत का संविधान दिया तो हमने कुछ बुनियादी सिद्धांतों को अपनाया जो हमारे गणतंत्र की नींव है. देश के नागरिक को अपनी आस्था, विश्वास की स्वतंत्रता है, यह एक अविभाज्य अधिकार है. इसके अनुसार पूजा करने का अधिकार हमारी सांस्कृतिक परंपराओं में अंतर्निहित है. यह भारत में प्रचलित सभी धर्मों पर लागू होता है जो हमारे बहु सांस्कृतिक समाज का आधार है. वर्तमान में रह रहे हमारे लाखों नागरिकों को अतीत की कथित बर्बर हरकतों के लिए कैसे दोषी ठहराया जा सकता है? ऐसे राजनीतिक एजेंडे जो हमारे गणतंत्र के नागरिकों को ऐसे कथित ऐतिहासिक गलतियों के लिए निशाना बनाकर उन्हें पीड़ित करना चाहते हैं उनका कोई संवैधानिक या कानूनी आधार नहीं है.

कपिल सिब्बल लिखते हैं कि 6 दिसंबर 1992 कई लोगों के लिए विजय का दिन था लेकिन एक विशेष धर्म को मानने वालों के लिए यह एक त्रासदी के रूप में माना जाता है. संवैधानिक बर्बरता के भविष्य के कृत्यों को समाप्त करने के लिए संसद ने 1991 में पूजा स्थल अधिनियम को लागू करने का निर्णय लिया था. इसने निर्धारित किया कि 15 अगस्त 1947 को पूजा स्थलों के चरित्र में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.

सैकड़ों साल पहले हुए कृत्यों के लिए अतीत के घावों को फिर से खोलने के हालिया प्रयास, वर्तमान को शैतानी बताते हुए सार्वजनिक अव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं. हर दूसरे दिन हम देखते हैं कि अदालतों को एक विशेष समुदाय के पूजा स्थलों के खिलाफ संदिग्ध ऐतिहासिक दावों के लिए युद्ध का मैदान बनाया जा रहा है. ये दावे संदिग्ध दावों पर आधारित हैं कि वास्तव में ये संरचनाएं उस जगह के मलबे पर बनी हैं जहां किसी दूसरे धर्म का पालन किया जा रहा था. ऐसी याचिकाएं खुद ही ऐसी हरकते हैं जो संविधान के मूल्यों के साथ असंगत भावनाओं को भड़काती हैं जिन्हें हमने अपनाया है. 12 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश के जरिए ऐसी सभी याचिकाओं पर रोक लगा दी है जो एक स्वागत योग्य कदम है.

संसद में तमाशा

इंडियन एक्सप्रेस में तवलीन सिंह ने लिखा है कि संसद में तमाशे देखकर उन्हें बहुत शर्मिंदगी होती है. बीते दिनों राहुल गांधी ने मुखौटा पहने हुए दो व्यक्तियों से इंटरव्यू लिया. बच्चों जैसे सवाल पूछे और वहां मौजूद सांसदों ने ठहाके लगाए. संसद में मौजूद रहकर सवाल उठाने की जिम्मेदारी से अलग संसद से बाहर बच्चों जैसे खेल ने खुद अपना ही मजाक प्रतिपक्ष ने उड़ाया है. प्रियंका गांधी भी कुछ इसी रूप में जवाब देती नजर आयी हैं. मगर, सत्ता पक्ष के लोगों ने भी जिस तरीके से जॉर्ज सोरोस का मुद्दा उठाया उससे अपनी ही पोल खुली है. एक बात साफ है कि जॉर्ज सोरोस कुछ भी कर लें भारत की सरकार को अस्थिर नहीं कर सकते. भारत के मतदाता ही सरकार को बदल सकते हैं.

तवलीन सिंह लिखती हैं कि सत्ता पक्ष खुद अपनी ही भद्द पिटवा रहे हैं. खुद को दुनिया के सामने कमजोर साबित कर रहे हैं. यहां तक कि बड़ी मुश्किल से जो दोस्ती डोनाल्ड ट्रंप के साथ नरेंद्र मोदी ने बनाई है उस पर भी मिट्टी डालने का काम कर रहे हैं.

संसद का समय बर्बाद करने के बदले अच्छा होता अगर सदन के अंदर बहस सुनने को मिलती. किसानो की ही चर्चा हो जाती. उनकी शिकायतों में दम न होता तो इतने महीनों से प्रदर्शन न कर रहे होते शंभू बॉर्डर पर. मुद्दे और भी हैं बहुत सारे जिन पर बहस होनी चाहिए संसद के अंदर. अर्थव्यवस्था में बहुत दिनों के बाद मंदी आई है. क्या यह मुद्दा नहीं है? बेरोजगारी बहुत बड़ा मुद्दा है. हिन्दू-मुस्लिम तनाव का बढ़ना चिंताजनक है. मस्जिदों के नीचे मंदिर ढूंढे जा रहे हैं. लेखिका का मानना है कि सांसद जो कर रहे हैं वह जनता के साथ अन्याय है.

स्विटजरलैंड ने भारतीय कंपनियों की मुश्किलें बढ़ाईं

बिजनेस स्टैंडर्ड में वसुंधरा मुखर्जी ने लिखा है कि स्विटजरलैंड ने भारत से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस ले लिया है और 1 फरवरी से इसके लागू हो जाने के बाद लाभांश पर कटौती की दर 5 प्रतिशत से दुगुनी होकर 10 प्रतिशत हो जाएगी. 2023 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया था. इसमें स्पष्ट किया गया था कि जब कोई देश आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) में शामिल होता है तो मोस्ट फेवर्ड नेशन स्वत: लागू नहीं होता. एमएफएन में सभी पक्षों के लिए समान व्यवहार सुनिश्चित होता है. एक देश जब किसी अन्य देश को अनुकूल शर्तें प्रदान करता है तो उसका लाभ मोस्ट फेवर्ड नेशन के दर्जे में आने वाले सभी देशों को एकसमान रूप से मिलना चाहिए.

वसुंधरा मुखर्जी ने लिखा है कि 2023 में नेस्ले ने मोस्ट फेवर्ड नेशन क्लॉज का लाभ उठाते हुए लाभांश पर भुगतान किए गये विदहोल्डिंग टैक्स की वापसी की मांग की थी. सुप्रीम कोर्ट ने नेस्ले के पक्ष में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया जिसमें कहा गया था कि भारतीय इनकम टैक्स अधिनियम की धारा 90 के तहत औपचारिक अधिसूचना के बिना मोस्ट फेवर्ड नेशन क्लॉज को स्वत: लागू नही किया जा सकता है.

इस स्पष्टीकरण के कारण स्विस अधिकारियों ने विदहोल्डिंग टैक्स दर में एकतरफा कमी पर पुनर्विचार किया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्विटजरलैंड के फैसले से भारतीय कंपनियों की मुसीबत बढ़ गयी है. स्विटजरलैंड से लाभांश प्राप्त करने वाली भारतीय कंपनियों पर कर का बोझ बढ़ जाएगा क्योंकि उन लाभांशों पर रोक कर 5 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत हो जाएगा. भारतीय सहायक कंपनियों से लाभांश प्राप्त करने वाली स्विस कंपनियों पर 10 प्रतिशत कर की दर लागू रहेगी क्योंकि यह कर दर हमेशा भारत-स्विट्जरलैंड डीटीएए के तहत लागू होती है.

ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT

इंटरव्यू में ‘सर’ कतई नहीं

हिन्दुस्तान टाइम्स में करन थापर ने साक्षात्कार के दौरान संबोधन को लेकर अपने अनुभवों को साझा किया है. एक इंटरव्यू से पहले लेखक को अपने बॉस का लेटर प्राप्त होता है जिसमें लिखा था, “मैंने देखा है कि आप जिन लोगों का साक्षात्कार लेते हैं, उन्हें संबोधित करने के आपके तरीके अलग-अलग हैं.” इससे आगे लिखा था, “कुछ लोगों को आप मिस्टर एक्स या मिसेज वाई कहते हैं, दूसरों को आप मंत्री कहते हैं और फिर कभी-कभी आप उनके पहले नामों का उपयोग करते हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैंने आपको कभी उन्हें ‘सर’ कहकर संबोधित करते सुना है. क्यों? और आप कैसे तय करते हैं कि उन्हें क्या कहना है?” दो दशक पहले इस सवाल के बाद डेविड वाडिंगटन के साथ इंटरव्यू लिया जो बाद में ब्रिटेन के गृह सचिव बने. 1983 में वे ब्रिटेन के इमिग्रेशन स्टेट मिनिस्टर थे. समीर शाह जो अब बीबीसी के अध्यक्ष हैं तब आईविटनेस के प्रोड्यूसर थे जिस टेलीविजन कार्यक्रम पर लेखक काम कर रहे थे. वे बॉस भी थे.

करन थापर ने लिखा है कि समीर ने उन्हें बता दिया था कि उन्हें मिस्टर वाडिंगटन या मंत्री कहना है, ‘सर’ नहीं. इंटरव्यू ब्रिटिश इमिग्रेशन नियमों में बदलाव को लेकर था जिस कारण एशियाई समुदाय को नुकसान पहुंचा था. उस इंटरव्यू के बाद से ही मिस्टर, मिसेज, मिस का संबोधन अधिक इस्तेमाल करने लगे लगे लेखक.

सरकार में रहने वाले व्यक्ति को मंत्री का संबोधन. ग्लैमर और सेलिब्रिटी स्टेटस वाले व्यक्ति से इंटरव्यू करते समय थोड़ी अलग स्थिति होती है. ऐसे अवसर पर अपने मेहमानों को लेखक पहले नाम से बुलाते हैं. जब भी ऐसे मेहमानों का इंटरव्यू लिया तो वे जावेद (अख्तर), शाहरुख (खान), माधुरी (दीक्षित), शर्मिला (टैगोर), विक्रम (सेठ) और सचिन (तेंदुलकर) थे. लेखक का मानना है कि जब वे उन लोगों का इंटरव्यू करते हैं जिन्हें वे अच्छे से जानते हैं तो चीजें थोड़ी अजीब हो सकती हैं. शशि के नाम से जानने के बावजूद उन्हें मिस्टर थरूर कहना होता है और यह अजीब लगता है. हालांकि किसी भी मंत्री को पीयूष या कपिल नहीं कहते जबकि उन्हें वे इन्हीं नामों से जानते हैं. औपचारिक इंटरव्यू में ऐसी मित्रता के लिए जगह नहीं होती.

लिटिल चैंपियन गुकेश

टेलीग्राफ में गोपाल कृष्ण गांधी ने लिखा है कि भारत मंगल ग्रह पर पहुंचा है तो तमिलनाडु चांद पर. और, चेन्नई जहां विश्व शतरंज के बादशाह गुकेश डोमराजू का जन्म हुआ था, जीत का ऐसा जश्न मना रहा है जैसा हाल के दिनों में शायद ही किसी ने मनाया हो. लेखक का मानना है कि गुकेश ने एक खेल और एक खिताब से कहीं ज्यादा जीता है. उसने क्षणिक आनंद का अनुभव किया है. दुनिया में सबसे कम उम्र में खिताब जीतना, विश्वस्तरीय खिलाड़ी डिंग लिरेन को हराना और अपनी जीत में गुकेश का इंसान के रूप में दिखाना बहुत वास्तविक है. जीत के बाद रोना सबसे स्वाभाविक बात है. अपने पिता और फिर अपने कोच की बाहों में आंसुओं में डूब जाना बहुत अर्थपूर्ण और मार्मिक बातें हैं.

गोपाल कृष्ण लिखते हैं कि पराजित डिंग ने कहा, “मैंने साल में अपना सर्वश्रेष्ठ टूर्नामेंट खेला है. मुझे कोई पछतावा नहीं है. धन्यवाद, मैं खेलना जारी रखूंगा.” और फिर, कुछ पल बाद उन्होंने कहा, “कल कोई खेल नहीं”. फिर अपने फेफड़ों और अपनी आवाज़ को ऐसी ध्वनि निकालने दिया जो अवर्णनीय है. यह कोई हंसी नहीं थी, यह कोई घुरघुराहट नहीं थी. यह कोई आह नहीं थी. और, यह कोई कराह नहीं थी. लेकिन यह कुछ और ही था. यह एक ध्यानपूर्ण आकांक्षा थी. इसमें त्याग था, करुणा थी.

डिंग बौद्ध हो सकता है या नहीं भी. लेकिन, उसके पास एक मास्टकर परिपक्वता है. उसने यह नहीं कहा कि उसकी हार मायने नहीं रखती. बेशक, यह मायने रखती थी. उसने यह नहीं कहा कि उसकी हार ने उसे प्रबावित नहीं किया है. बेशक, इसने प्रभावित किया है. डिंग एक सच्चे चैंपियन हैं. वहीं गुकेश ने दिखाया है कि भारतीय होने का क्या मतलब है. यह भी नहीं भूला जा सकता कि ये दो खिलाड़ी दो सबसे बड़ी सभ्यताओं चीन और भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

Become a Member to unlock
  • Access to all paywalled content on site
  • Ad-free experience across The Quint
  • Early previews of our Special Projects
Continue

Published: undefined

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT