

advertisement
रौशन किशोर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव नतीजों को देखने के कई एक तरीके हो सकते हैं. दोनों ही प्रदेशों में मौजूदा गठबंधन ने बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है. ये नतीजे लोकसभा चुनाव के बिल्कुल विपरीत है. झारखण्ड और महाराष्ट्र की सरकारों ने महिलओं के लिए नकद हस्तांतरण योजनाओं की घोषणा की थी. पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने भी इसी तरह की योजनाओं के दम पर अपने राज्यों में भारी जीत हासिल की थी. हरियाणा में भी बीजेपी सरकार ने महिलाओं को नकद हस्तांतरण योजना का वादा किया है. बीजेपी मुख्यालय से नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में हरियाणा का उल्लेख भी किया है.
हेमंत सोरेन अब न केवल झारखण्ड में बल्कि पूर्वोत्तर के बाहर लगभग पूरे भारत में एसटी के सबसे सफल नेता हैं. उन्होंने ऐसा गठबंधन बनाया जिसने एसटी-गैर एसटी वोटरों के बीच ऐतिहासिक दरार को खत्म कर दिया. बीजेपी ने 2014 में एक गैर एसटी को मुख्यमंत्री बनाया और इन चुनावों में सीएम उम्मीदवार का नाम नहीं दिया. इसके बदले झारखण्ड में हिन्दू-मुस्लिम की फिजां बनाई और वे बुरी तरह फ्लॉप रहे. उद्धव ठाकरे के गुट ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर वैचारिक उलटफेर करने की कोशिश की. उन्होंने पहले एकनाथ शिंदे के हाथों अपने अधिकांश विधायक दल को खो दिया और फिरलगभग अपना पूरा लोकप्रिय समर्थन खो दिया.
बद्रीनारायण ने हिन्दुस्तान टाइम्स में बताया है कि झारखण्ड में संपन्न चुनावों में इंडिया ब्लॉक के लिए कौन सी बात कारगर रही. महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों के मद्देनजर यह प्रवृत्ति उभर कर सामने आयी है कि गरीब-हितैषी कल्याणकारी नीतियां देश में लोकतंत्र के स्वरूप और विषय-वस्तु को नया आकार दे रही हैं. लाभार्थियों का एक मतदाता वर्ग उभरा है जो जाति और धार्मिक सीमाओं से परे ऐसी नीतियों को सफलतापूर्वक शुरू या लागू करने वाली पार्टियों को चुन रहा है. महिलाएं इस वर्ग में एक सुसंगत और संगठित उपसमूह है. लाडली, लाडकी और मंईयां योजनाएं महिलाओं को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं. इन योजनाओं का पूरा लाभ राजनीतिक दलों को मिला है.
‘जेल के बदले वोट’ जैसे नारे ने जेएमएम और इंडिया समूह के पक्ष में असर पैदा किया. कल्पना सोरेन ने इलाकों में आदिवासी उत्पीड़न के नैरेटिव को मजबूत किया. 28 फीसदी आबादी के ‘आदिवासी गौरव’ को बनाए रखने की कोशिश सफल रही. झारखण्ड में आदिवासी पहचान की राजनीति स्पष्ट रूप से मजबूत बनी हुई है. झामुमो का इस पहचान के साथ मजबूत जुड़ाव है. बीजेपी ने बाहरी घुसपैठ का डर पैदा करने की कोशिश की. यह कहानी राज्य के आदिवासी इलाकों में पैठ बनाने में विफल रही.
गिरीश कुबेर ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि जाति (Cash),जाति (Cast), सांप्रदायिकता (Communalism) और फसलें (Crops) के इर्द गिर्द महाराष्ट्र का चुनाव लड़ा गया. शुरू के तीन ‘सी’ चौथे ‘सी’ पर भारी पड़ गये. ग्रामीण इलाकों में फसल की गिरती कीमत का ज्वलंत मुद्दा मात खा गया. लाडकी योजना गरीब महिलाओं के हाथों में नकदी सुनिश्चित की. मराठा गुस्से का मुकाबला करने के लिए ओबीसी को संगठित करने में बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग की. इसके तहत ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ जैसे नारों में सांप्रदायिकता का तड़का भी दिखा. यह बीजेपी, एकनाथ के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी के लिए जीत का परफेक्ट मिश्रण साबित हुआ. हालांकि जनादेश के आकार ने निस्संदेह राजनीतिक वर्ग को चौंका दिया है.
महाराष्ट्र में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली समूह मराठाओं की सियासत के समांतर ओबीसी को खड़ा करने में बीजेपी को सफलता मिली. बीजेपी ने ताओं ने विभिन्न ओबीसी गुटों के साथ 330 बैठकें कीं. भूपेंद्र यादव इस ऑपरेशन की देख-रेख कर रहे थे. संसदीय चुनावों के तुरंत बाद महाराष्ट्र को उन्होंने अपना घर बना लिया था. आरएसएस ने पूरी ताकत के साथ इस काम में बीजेपी की मदद की. बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के साथ-साथ सांप्रदायिक हथौड़े का भी इस्तेमाल किया. योगी आदित्यनाथ का नारा ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ असरदार रहा. ये तीन ‘सी’ चौथे ‘सी’ यानी फसलों की गिरती कीमत से पैदा हो रहे असंतोष पर भारी पड़ गये. सोयाबीन, कपास और प्याज की गिरती कीमतें भी किसानों की नाराजगी को सरकार विरोधी वोटों में तब्दील नहीं कर सकीं.
तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि यह बहुत शर्मनाक है कि बीते हफ्ते महाराष्ट्र और झारखण्ड में चुनाव में हमारी दिलचस्पी ने आम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे को पीछे कर दिया. कर्नाटक के अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा की कीमत दुगुनी हो गई. ऐसा इसलिए हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी की पांच गारंटियों पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया जा रहा है. इनमें महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, मासिक जेब खर्च, सस्ती घरेलू गैस और बहुत कुछ शामिल हैं.
तवलीन सिंह लिखती हैं कि गरीबी से बाहर निकालने की कोशिश नहीं दिखती. उच्च गुणवत्तावाले स्कूल, अस्पताल जैसी जरूरतों की अनदेखी हो रही है. खैरात के बजाए असली नौकरियां वक्त की जरूरत है. मोदी के शासनकाल में भी गरीबी में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आयी है और सार्वजनिक सेवाओं में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ. वास्तव में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और कल्याणकारी योजनाओं के भुगतान के बाद सड़कें बनाने, पीने के पानी की सुविधा देने या अधिकांश भारतीयों के रहने की गंदी स्थितियों को सुधारने के लिए खर्च करने को बहुत कुछ नहीं बचता है.
आसिम अली ने टेलीग्राफ में लिखा है कि एक दशक पहले 400 एक्यूआई को प्रदूषण के उच्चतम स्तर पर रिपोर्ट किया जाता था. मगर, अब यह स्तर ‘थोड़ा सुधार’ का आंकड़ा बन गया है. दिल्ली और उत्तरी गंगा क्षेत्र में क्या अगले दशक में भी सुधार होगा? शायद नहीं. जब तक हम अपनी राजनीति की प्रकृति को मौलिक रूप से दुरुस्त नहीं करेंगे, ऐसा करना बहुत कठिन होगा. विकृत राजनीति हमारे समाज और अर्थव्यवस्था के कमांडिंग ढांचे में समा गयी है. राष्ट्रीय मीडिया में प्रदूषण की समस्या पर चर्चा का केंद्रीय विषय ‘पराली जलाने वाले किसान’ हैं.
शिकागो विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के हवाले से लेखक ने बताया है कि आठ साल तक प्रदूषण के खिलाफ युद्ध लड़ने के बाद चीन ने 2021 में इस दिशा में प्रगति की और वह लड़ाई जीत रहा है. भारत में उदारीकरण के बाद भारत में योजना और समन्वय के लिए राज्य की क्षमता को व्यवस्थित रूप से खत्म कर दिया गया है. योजना आयोग की जगह सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग की स्थापना की. यह आयोग स्वास्थ्य और शिक्षा के खराब स्तर, बेरोजगारी और अल्प रोजगार में वृद्धि और गंभीर पर्यावरणीय गिरावट जैसी राष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने में उल्लेखनीय रूप से अक्षम साबित हुआ है.
Published: undefined