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पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में संविधान पर चर्चा का जिक्र करते हुए लिखा है कि ऐसा कोई भाषण नहीं हुआ जो पचहत्तर वर्ष बाद भी याद रखने लायक हो, जैसे 14-15 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू का ‘नियति से साक्षात्कार’ या 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में बाबा साहेब अंबडेकर का दिया भाषण ‘जनता द्वारा सरकार’. आज कांग्रेस लोकसभा और राज्यसभा मे विपक्षी दल की कतार में बैठती है. यह नियति का दुखदायी बदलाव है मगर ऐसा कतई नहीं कि यह बदलेगा नहीं.
चिदंबरम ने लिखा है कि अगर वे संसद में बोलते तो कांग्रेस सरकारों द्वारा संविधान में किए गये महत्वपूर्ण संशोधन की याद जरूर दिलाते जिनके चलते वास्तव में संविधान सशक्त बना और संविधान की प्रस्तावना में निर्धारित उच्च लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सका- खासकर न्याय और समानता. पहले संशोधन से एससी और एसटी वर्ग की उन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ तो बयावीलसवें, बावनवें, तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संशोधनों से लोकतंत्र को गहरा और मजबूत बनाया गया. वन नेशन वन इलेक्शन और बीजेपी की ओर से इच्छित परिवर्तन बहुत खराब हैं. उनसे लोकतंत्र और संघवाद को कमजोर करने का खतरा महसूस होता है. आखिर में लेखक विश्वास जताते हैं कि संविधान की मजबूत रीढ़ और इसकी प्रगतिशील भावना अंतत: विजयी होगी.
तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि डॉक्टर भीम राव अंबेडकर की वह बहुत बड़ी प्रशंसक हैं. एक छोटे बच्चे को इस हद तक अछूत मानना कि उन्हें स्कूल में अलग बोरी पर बिठाया जाता हो जिसे वे स्वयं रोज घर ले जाने पर मजबूर थे. अंबेडकर की लिखी किताबें पढ़ीं तो उनके लिए लेखिका के दिल में सम्मान बढ़ता ही चला गया. लेखिका अपने सिख होने का हवाला देकर याद दिलाती हैं कि गुरुनानक ने इसलिए पंथ बनाया था कि जातपात और छुआछूत से उनको नफरत थी. सिखों के गुरुद्वारों में किसी से उनकी न जात पूछी जाती है न गोत्र.
नतीजा यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने मौका देखकर राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि उन्होंने उनके बुजुर्ग सांसदों को इस तरह धक्का मारके गिराया कि उनको अस्पताल के आइसीयू में भर्ती करना पड़ा. एक महिला सांसद से यह कहलवाया गयाकि राहुल गांधी ने उनको अपने रास्ते से ऐसे हटाया कि उन्हें ऐसा लगा कि उनकी इज्जत पर चोट पहुंची थी. इन उदाहरणों से लेखिका को लगता है कि डॉ अंबेडकर के लिए झूठी सहानुभूति जताने का काम किया गया है. लेखिका ने लिखा है कि उन्होंने आज तक देश में एक गांव नहीं देखा है जहां दलितों के घर सवर्णों की बस्तियों के बीच होते हैं. कई स्कूल आज भी हैं जहां दलित बच्चों को अलग बिठाया जाता हैऔर अलग बर्तन रखे जाते हैं. बाबा साहेब के लिए जो इज्जत आम दलित लोगों में है वह दलित राजनेताओं में नहीं दिखती. आज देश को एक बार फिर बाबा साहेब जैसे लोगों की जरूरत है.
बिजनेस स्टैंडर्ड में अदिति फडणीस ने सवाल उठाया है कि सदन में तयशुदा हार की बात जानते हुए भी विपक्ष ने आखिर महाभियोग का प्रस्ताव पेश क्यों किया? पहले यह जान लेना जरूरी है कि उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के खिलाफ महाभियोग केवल इसलिए नहीं लाया जा सकता कि उनके आचरणसे विपक्ष को परेशानी होती है. यह बात अलग है कि धनखड़ भी रूखे लहजे में कानूनी और सियासी तरीके से अपनी बात रखने का कोई मौका नहीं छोड़ते.
अदिति फडणीस लिखती हैं कि राज्यसभा के उपसभापति ने धनखड़ को पद से हटाने की मांग वाला विपक्ष का नोटिस खारिज कर दिया तो वह बहुत उचित कदम था. वास्तव में किसी का स्वाभिमान आहत होना सभापति के खिलाफ महाभियोग लाने का आधार नहीं हो सकता और विपक्ष इसे उचित ठहरा भी नहीं सकता. विपक्ष का तर्क है कि उन्हें बोलने नहीं दिया जाता है. विपक्ष ने नियम 267 के तहत 40 से अधिक प्रस्ताव पेश किए लेकिन धनखड़ ने एक भी स्वीकार नहीं किया. विपक्षी नेता कहते हैं कि धनखड़ बोलते समय अक्सर हस्तक्षेप करते हैं जिससे उनके विचारों का तारतम्य टूट जाता है और सत्ता पक्ष को चुटकी लेने का मौका मिल जाता है. जगदीप धनखड़ कांग्रेस, जनता दल और चंद्रशेखर की पार्टी समेत बीजेपी में रहे. वे आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता रह चुके हैं. उपराष्ट्रपति बनने के बाद जयपुर में आयोजित सम्मान समारोह में कहा था, “मैंने ताऊ देवीलाल और भैरों सिंह शेखावत के चरणों में बैठकर जादू सीखा है.”
टेलीग्राफ में आसिम अली ने लिखा है कि 1920 और 1930 के दशक के बाद किसी भी युग को वैश्विक दक्षिणपंथ द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता है जितना कि वर्तमान युग को. वर्तमान युग यकीनन फासीवादी युग की तुलना में वैश्विक दक्षिणपंथ का उच्चतम स्तर है. दक्षिणपंथी आंदोलन अब न केवल यूरो अटलांटिक क्षेत्र में बढ़ रहे हैं बल्कि उभरती मध्य शक्तियों- भारत, इजराइल, तुर्की और कुछ हद तक ब्राजील और रूस की शासकीय संरचनाओं में गहराई से समाहित हो गये हैं. इनमें भारत निश्चित रूप से प्रमुख उदाहरण है जहां दक्षिणपंथी ताकतों ने अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व को संस्थागत रूप दिया है.
आसिम अली बताते हैं कि हाल ही मे प्रकाशित ‘वर्ल्ड ऑफ द राइट: रेडिकल कंजर्वेटिज्म एंड ग्लोबल ऑर्डर’ में पॉलिटिकल साइंटिस्ट और इंटरनेशनल रिलेशन्स के विद्वानों के एक समूह ने बताया है कि कैसे इस वैश्विक दक्षिणपंथी उभार ने न केवल घरेलू राजनीति बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी बदल दिया है. ये दक्षिणपंथी आंदोलन एक-दूसरे से बातचीत करते हैं और एक-दूसरे से सीखते हैं. ये साथ मिलकर रणनीतिक स्वायत्तता, सभ्यतागत मूल्य और बहुध्रुवीय व्यवस्था जैसे शक्तिशाली व्याख्यात्मक ढांचों के गिर्द जुड़ाव की वैश्विक शर्तों को आकार दे रहे हैं.
‘सोरोस नेटवर्क’ और व्यापक ‘विदेशी हाथ’ का खतरनाक भूत सरकारीअधिकारियों के विमर्श में जगह बना रहा है.आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले साल ‘सांस्कृतिक मार्क्सवादियों या जागरूक लोगों’ को धोखेबाज और विनाशकारी ताकतों के रूप में परिभाषित किया था. इन दिनों डीप स्टेट, वोकिज्म, सांस्कृतिक मार्क्सवादी जैसे शब्द चर्चा में हैं.
करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में दुबई और अबूधाबी की कलात्मक तुलना की है. अबू धाबी का वातावरण दुबई की तुलना में अधिक शांत है. यदि दुबई न्यूयॉर्क है तो अबू धाबी पेरिस के करीब. यातायात, राजमार्ग, होटल, रेस्टोरेंट सब बेहद शानदार हैं. दुबई की तुलना में अमीराती अपने शहर का आनंद लेते हुए दिखते हैं चाहे वह खरीदारी होया बाहर खाना. अबूधाबी के अजूबों में इसके सांस्कृतिक रत्न शामिल हैं. लौवर और शेख जायद ग्रैंड मस्जिद इसके दो स्पष्ट उदाहरण हैं.
करन थापर लिखते हैं कि अमीरात के लोग बिना किसी हिचकिचाहट के यातायात नियमों कापालन करते हैं. यही कारण है कि चीजें काम करती हैं लेकिन उन्हें तोड़ने का दंड असाधारण रूप से कठोर है. लाल बत्ती कूदने पर आपको 5000 दिरहम का जुर्माना लगता है. 2025 से यह 50 हजार हो जाएगा. यह लगभग 15 हजार डॉलर है. सड़क पर कभी कोई हॉर्न सुनाई नहीं पड़ता. दुबई ज्यादा बोल्ड, बेबाक है. इसके अरब के पड़ोसी होने का प्रभाव थोड़ा सूक्षम है लेकिन कुछ समय बाद उतना ही दृढ़ और आकर्षक. तो,अगली बार जब अमीरात बुलाए तो अबू धाबी आजमाएं. हो सकता है कि आप अपनी वफादारी न बदलें लेकिन यह एक ऐसी छुट्टी होगी जिसे आप कभी नहीं भूलेंगे. वास्तव में लेखक वापस लौटने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं.
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