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सुनंदा के दत्ता रे ने टेलीग्राफ में लिखा है कि इतिहास को बदला नहीं जा सकता. स्वतंत्रता के समय बांग्लादेश में 22 प्रतिशत हिन्दू थे जो घटकर 8 प्रतिशत रह गये हैं. यह दुखद है कि अपने देश की स्थिरता के लिए एकजुट होकर काम करने के बजाए बांग्लादेशी अभी भी बीते कल की लड़ाई लड़ रहे हैं. यह खतरा इसलिए और भी बड़ा है क्योंकि भारत पहले ही एक ऐसे युद्ध की पुनरावृत्ति में शामिल हो चुका है जो 1930 की गर्मियों के आखिर तक लगभग एक सदी तक शांत रहा था जब किशोरगंज में जो उस समय मैमन सिंह जिले का एक उपखंड था और जहां मुस्लिम किसानों ने हिंदुओं की संपत्ति को नष्ट कर दिया और हिन्दू परिवारों का कत्लेआम किया. 1947 के बाद उस विशेष दुश्मनी के बने रहने का कोई तार्किक कारण नहीं था. यहां तक कि राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई भी 1971 में ही सुलझ गयी थी. फिर भी उन दशकों की शिकायतें माहौल को विषाक्त करती रही हैं.
बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने शिकायत की है कि भारत यह छवि बनाने की कोशिश कर रहा है कि उनका देश अफगानिस्तान जैसा बन रहा है जबकि ममता बनर्जी बांग्लादेश के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति सेना की मांग करने के लिए पारंपरिक तीखेपन के साथ मंच पर आती इस तरह की भयावह बयानबाजी और कठोर प्रतिक्रियाएं भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव को और बढ़ा सकती हैं. इससे बांग्लादेशी हिन्दुओं की समस्याओं को और बढ़ा सकती हैं.
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि पूजा स्थल अधिनियम 1991 का एकमात्र उद्देश्य पूजा स्थलों के स्वरूप को जस का तस बनाए रखना है जैसा कि वे स्वतंत्रता प्राप्ति के समय थे. यह स्पष्ट है- उसमें कोई ‘अगर’ या ‘मगर’, ‘बावजूद’ या ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है. अधिनियम की धारा 3 और 4 (1) पर ध्यान देने की जरूरत लेखक बताते हुए लिखते हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी भी खंड के पूजा स्थल को उसी धार्मिक संप्रदाय के किसी अन्य खंड या किसी अन्य धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी खंड के पूजा स्थल में परिवर्तित नहीं कर सकता.
इसके अलावा 15 अगस्त 1947 को विद्यमान पूजा स्थल का धर्मिक चरित्र बनाए रखने की भी घोषणा है. यह भी कहा गया था कि अयोध्या स्थित राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाने वाला पूजा स्थल एकमात्र अपवाद होगा क्योंकि वहां विवाद चल रहा है. लेखक का दावा है कि इस अधिनियम के इरादे, उद्देश्य, भावना और दायरे को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया.
यह भी गौरतलब है कि याचिकाकर्ता के अनुसार ये ‘पूजा स्थल’ बर्बर आक्रांताओं द्वारा अवैध रूप से बनाए गये थे. तीनों अपीलों के पैराग्राफ में याचिकाकर्ता ने यह नहीं छिपाया कि वह किसका पक्ष ले रहा है और लक्षित समुदाय कौन है. वह ‘हिन्दुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों’ के दार्मिक स्थलों को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से पुनर्स्थापित करना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2023 को अपने आदेश में भानुमती का पिटारा खोल दिया. न्यायालय ने वादी के उद्देश्य की जांच नहीं की जिन्होंने 2022 का सिविल मुकदमा 18 दायर किया था जिसमे अपील की गयी थी कि वे ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में मौजूद कथित देवताओँ की पूजा करने के हकदार हैं.
हिन्दुस्तान टाइम्स में करन थापर लिखते हैं कि वह पसोपेश में हैं कि कौन से शब्द इस्तेमाल करें- अकल्पनीय, निन्दनीय, अजीब...उन घटनाओं के लिए जिनका वे जिक्र करने जा रहे हैं. पहली घटना है हिन्दू सेना द्वारा दायर याचिका जिसमें 800 साल पुरानी अजमेर शरीफ दरगाह का सर्वेक्षण करने की मांग की गयी है. इसका आधार इसकी नींव के नीचे एक शिव मंदिर छिपा होना है. यह दावा हर बिलास सारदा की 1910 में प्रकाशित पुस्तक पर आधारित है जो किंवदंती के आधार पर इसकी पुष्टि करती है.
करन थापर का मानना है कि मुसलमानों को पीड़ा देना, दरगाह को नुकसान पहुंचाना और नष्ट करना और इस तरह ‘मुसलमानों को उनकी जगह पर रखना’ हिन्दू सेना का मकसद है. वे न्याय नहीं प्रतिशोध चाहते हैं. यह मुसलमानों, उनके इतिहास, संस्कृति, वास्तुकला और धर्म के प्रति नापसंदगी है जो उन्हें प्रेरित करती है. दूसरा घटनाक्रम यकीनन और और भी अधिक परेशान करने वाला है. कोलकाता और त्रिपुरा के अस्पतालों ने घोषणा की है कि उन्होंने बांग्लादेशियों का इलाज बंद करने का फैसला किया है. इसकी वजह कथित तौर पर तिरंगे का अपमान है.
इंडियन एक्सप्रेस में राम माधव ने लिखा है कि विश्व बैंक के अनुसार दक्षिण एशिया दुनिया में सबसे तेजी से आर्थिक विकास करने वाला रीजन बनने की राह पर है. भारत में मजबूत घरेलू मांग और अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों में तेजी से सुधार इसके आधार हैं. बैंक का अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों तक दक्षिण एशिया में विकास दर 6.4 प्रतिशत की मजबूत दर बनी रहने वाली है. अस्थिरता के कारण बांग्लादेश में विकास दर इस वर्ष 5.2 से 3.2 प्रतिशत के बीच रह सकती है वहीं भारत की विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक मजबूत बनी रहेगी. भूटान में 7.2 प्रतिशत, मालदीव में 4.7 प्रतिशत और नेपाल में 5.1 प्रतिशत की दर से विकास होने की उम्मीद है. राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल से जूझते पाकिस्तान और श्रीलंका में भी नई आर्थिक पहल और पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियों में तेजी के कारण अच्छी रिकवरी की उम्मीद है.
पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों में इस्लाम के राजकीय धर्म बन जाने के बाद अल्पसंख्यक समुदायों को कई प्रतिबंधों और अधिकारों से वंचित होना पड़ा. चिंता की बात यह है कि धर्म की राजनीति को अस्वीकार करने से पैदा हुआ बांग्लादेश भी इस्लामवादी राज्य में बदलने के कगार पर है. बांग्लादेश मे अस्थिरता के बीच बौद्धों और हिन्दुओं पर हमले चरम पर हैं. अवामी लीग से जुड़े लोगों पर भी अत्याचार किए जा रहे हैं. इस्कॉन के पुजारी चिन्मय दास की गिरफ्तारी के प्रकरण ने साबित कर दिया है कि हिन्दू न्याय के लिए देश की न्यायपालिका पर भी निर्भर नहीं रह सकते. लेखक इस बात की जरूरत बताते हैं कि उपमहाद्वीपीय नेतृत्व यह घोषणा करे कि सांप्रदायिकता का जीवन या कानून में कोई स्थान नहीं है.
गीता रविचंद्रन ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि लींड डार्क चॉकलेट पर हाल ही में आई एक खबर में कहा गया है कि इनमें लेड और कैडमियम की मात्रा स्वीकार्य स्तर से अधिक है. कंपनी ने इसका खंडन नहीं किया है. इसके विपरीत कंपनी ने जवाब दिया है कि भारी धातुओं की उपस्थिति अपरिहार्य है. कुछ साल पहले नेस्ले के मैगी नूडल्स को लेकर भी सवाल उठे थे. उत्तर प्रदेश में एक लैब टेस्ट के दौरान लेड और मोनो सोडियम ग्लूटामेट पाया गया था. 2015 में कुछ महीनों के लिए उत्पाद पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जिसे बाद में हटा दिया गया. विडंबना यह है कि परिष्कृत आटे से बने इस उत्पाद की मार्केटिंग ‘स्वाद भी, स्वास्थ्य भी’ टैगलाइन के साथ की गयी थी.
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने हाल ही में भ्रामक खाद्य लेबल की प्रकृति और व्यापकता पर एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कई उपभोक्ता खाद्य लेबल नहीं पढ़ते हैं. उदाहरण के लिए स्वस्थ नास्ते के रूप में प्रचारित बेरीज के पैकेज में अतिरिक्त चीनी हो सकती है जिसका उल्लेख सामग्री की सूची में है लेकिन पोषण संबंधी तथ्यों में रणनीतिक रूप से इसे निर्दिष्ट नहीं किया गया है. FSSAI ने हाल ही में पैकेज्ड पानी को अनिवार्य ऑड़िट के अधीन एक उच्च जोखिम वाले खाद्य पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया है. बोतलबंद पानी को निर्विवाद रूप से सुरक्षित माना जाता है. हालांकि मुनाफाकोरी इसके सुरक्षा मानकों को भी कम करने में कामयाब रही है.
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