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संडे व्यू: भारत की चुप्पी ‘रहस्यमयी’, करोड़ों वयस्क वोटर गैरवोटर कैसे?

पढ़ें इस रविवार मुकुल केशवन, पी चिदंबरम, श्याम सरन, करन थापर और चेतन भगत के विचारों का सार.

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<div class="paragraphs"><p>पढ़ें इस रविवार मुकुल केशवन, पी चिदंबरम, श्याम सरन, करन थापर और चेतन भगत के विचारों का सार.</p></div>
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पढ़ें इस रविवार मुकुल केशवन, पी चिदंबरम, श्याम सरन, करन थापर और चेतन भगत के विचारों का सार.

(फोटोः फाइल) 

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भारत की चुप्पी ‘रहस्यमयी’

मुकुल केशवन ने टेलीग्राफ में लिखा है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष के प्रति भारत सरकार की चुप्पी रहस्यमयी और चिंताजनक है. यह भारत के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है. भारत अपनी ऊर्जा (तेल और गैस) और उर्वरक (फर्टिलाइजर) की जरूरतों के लिए खाड़ी देशों और 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) पर निर्भर है. इस युद्ध और ब्लॉकेड के कारण न केवल ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि खेती के लिए जरूरी गैस की कमी से भारत की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी.

केशवन के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का इजरायल के प्रति झुकाव केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक है. वे इजरायल के 'जायनवाद' और 'हिंदुत्व' के बीच एक समानता देखते हैं. इस वजह से भारत अपने वास्तविक राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर रहा है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के हमलों की तो निंदा की, लेकिन इजरायल और अमेरिका की 'अवैध' बमबारी पर चुप्पी साधे रखी.

लेखक चीन का उदाहरण रखते हैं जिसने अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए दोनों पक्षों पर सवाल उठाए. शशि थरूर जैसे विचारकों द्वारा इस चुप्पी को 'यथार्थवाद' (Realism) कहना लेखक की नजर में गलत है, क्योंकि अमेरिका के प्रति इस समर्पण से भारत को चीन या व्यापार के मोर्चे पर कोई ठोस लाभ नहीं मिला है. लेखक का मानना है कि भारत की यह रहस्यमयी चुप्पी कोई रणनीतिक समझदारी नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदाराना शासनकला है. अमेरिका के पीछे आंख मूंदकर चलना भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक रूप से विनाशकारी हो सकता है. इसे लेखक ने 'आत्मसमर्पण' जैसा बताया है.

करोड़ों गैर वोटर वयस्क कैसे?

पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर पर सवाल उठाया है कि भारत में करोड़ों वयस्क गैर वोटर कैसे हो सकते हैं. चिदंबरम का मुख्य तर्क यह है कि मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं की संख्या राज्य की अनुमानित वयस्क जनसंख्या के लगभग बराबर होनी चाहिए. योगेंद्र यादव के आंकड़ों का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि हालिया पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची और वास्तविक वयस्क जनसंख्या के बीच औसतन 10% का भारी अंतर देखा गया है. इसका अर्थ है कि लाखों पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर हैं.

लेखक का मानना है कि टी.एन. शेषन के दौर में चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का निष्पक्ष प्रयोग कर एक मिसाल कायम की थी, लेकिन पिछले दशक में इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं. उनके अनुसार, SIR प्रक्रिया समावेशी नहीं थी और इसमें पारदर्शिता की कमी रही. लेख में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग ने एक 'शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण' अपनाया है. आयोग ने पात्र नागरिकों का नाम सूची में शामिल करने के बजाय, नागरिकों पर ही अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डाल दिया है. जो लोग ऐसा करने में असमर्थ रहे, उन्हें सूची से बाहर कर दिया गया.

चिदंबरम इसे एक गंभीर संकट बताते हैं. वे कहते हैं कि गैर-नागरिकों को बाहर रखने की कोशिश में आयोग ने लाखों वैध भारतीय नागरिकों को 'गैर-मतदाता' बना दिया है. यह स्थिति विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों, जैसे दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के लिए अधिक चिंताजनक है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से मतदान से वंचित करने की कोशिशें होती रही हैं. चिदंबरम के अनुसार, यह स्थिति 'जिम्मेदार शासनकला' के विपरीत है और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करती है. चुनाव आयोग का प्राथमिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि हर पात्र वयस्क नागरिक का नाम मतदाता सूची में हो, न कि उन्हें तकनीकी आधार पर बाहर करना.

वैश्विक संकट है खाड़ी में युद्ध

श्याम सरन ने बिजनेस स्टैंडर्ड में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष विशेषकर ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के वैश्विक और रणनीतिक प्रभावों का विश्लेषण किया है. उनका मानना है कि ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल का टकराव अब एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं बल्कि एक व्यवस्थागत संकट बन गया है. इस संघर्ष में रूस और चीन 'विजेता' बनकर उभर रहे हैं, क्योंकि पश्चिमी देश इस युद्ध में उलझे हुए हैं और उनकी ऊर्जा तथा सैन्य संसाधन नष्ट हो रहे हैं. इजरायल ने अमेरिका के साथ अपने गहरे संबंधों का उपयोग करके खुद को इस क्षेत्र की सबसे उन्नत सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है. हालांकि, ईरान ने अपनी पारंपरिक सैन्य कमजोरी के बावजूद वैश्विक कमजोरियों को निशाना बनाकर पलटवार किया है.

सरन लिखते हैं कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने या बाधित होने से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति ठप हो गई है. इसका सीधा असर कतर से होने वाली एलएनजी आपूर्ति पर पड़ा है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतें बढ़ी हैं और मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ गया है. श्याम सरन चेतावनी देते हैं कि भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है. भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है और खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा भी दांव पर है.

वे सुझाव देते हैं कि भारत को अपनी रणनीतिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए, क्योंकि किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़े होने की लागत बढ़ती जा रही है. ईरान के सस्ते ड्रोन और मिसाइलों के सामने महंगी मिसाइलें जैसे पैट्रियोट आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं हैं. यह युद्ध अब श्रेष्ठता के बजाय 'सहनशक्ति' (Sustainability) का खेल बन गया है. लेखक का सुझाव है कि भारत को इस जटिल माहौल में यथार्थवाद के साथ अपनी अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए और क्षेत्रीय अस्थिरता से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए.

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नेपाल में 1977 जैसा जनता पार्टी मूवमेंट!

करन थापर ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा है कि नेपाल में आए चुनावी नतीजे किसी सामान्य बदलाव से कहीं बढ़कर हैं. यह एक 'नए जीवन' जैसा महसूस होता है. 35 वर्षीय पूर्व रैपर और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह (बालेन) और उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है. 275 सीटों वाली संसद में उन्होंने 182 सीटें जीती हैं, जो दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब है. नेपाल की जनता ने पुराने राजनीतिक दिग्गजों को पूरी तरह नकार दिया है. के.पी. शर्मा ओली और माधव नेपाल जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा है. यहाँ तक कि 'प्रचंड' की जीत के बावजूद उनकी बेटी चुनाव हार गईं. यह संदेश साफ है: नेपाल ने विचारधारा से प्रेरित पुराने नेताओं के बजाय युवा, तकनीक-प्रेमी और व्यावहारिक नेतृत्व को चुना है.

थापर लिखते हैं कि बालेंद्र शाह और रवि लामिछाने जैसे युवा नेता उभरे हैं. बालेंद्र शाह एक स्ट्रक्चरल इंजीनियर और पूर्व रैपर हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी छवि और काठमांडू में मेयर के तौर पर किए गए सुधारों से लोगों का दिल जीता है. वहीं रवि लामिछाने पूर्व टीवी एंकर और RSP के अध्यक्ष हैं जिन्होंने आम नेपाली जनता की आकांक्षाओं को आवाज दी और इस जीत की नींव रखी. बालेन ने कर्नाटक (भारत) से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की है, इसलिए वे भारत को गहराई से समझते हैं. वे भारत के साथ सहयोग बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें चीन के साथ भी संतुलन बनाए रखना होगा.

लेखक का मानना है कि यदि वे 'नेपाल फर्स्ट' की नीति पर चलते हैं, तो भारत के लिए कोई बड़ी समस्या नहीं होनी चाहिए. भारत की 1977 की जनता सरकार आंतरिक कलह के कारण 3 साल में गिर गई थी. क्या नेपाल में भी ऐसा होगा? लेखक का तर्क है कि RSP, जनता पार्टी की तुलना में अधिक एकजुट है और बालेन का अपनी पार्टी पर मजबूत नियंत्रण है. हालांकि 12 लाख नौकरियां पैदा करने और अर्थव्यवस्था सुधारने का वादा पूरा करना उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी निष्कर्ष यह है कि नेपाल के लिए नई सुबह है जहाँ उम्मीदें आसमान पर हैं, लेकिन इतिहास की गलतियों से बचने की चुनौती भी सामने है.

ईरान ‘स्मार्ट’ नहीं हताश है!

चेतन भगत ने टाइम्स ऑफ इंडिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का विश्लेषण किया है. उनका मानना है कि ईरान के हालिया कदमों को उसकी 'रणनीतिक चतुराई' के बजाय उसकी 'छटपटाहट' के रूप में देखा जाना चाहिए. लेखक का तर्क है कि दशकों से जारी आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव ने ईरान को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है. ऐसे में ईरान द्वारा 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' को बंद करने की धमकी देना या छिटपुट हमले करना उसकी ताकत नहीं, बल्कि अंतिम हथियार के तौर पर उसकी हताशा को दर्शाता है.

भगत लिखते हैं कि ईरान लंबे समय से हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों जैसे समूहों के जरिए 'प्रॉक्सी वार' लड़ता रहा है. लेकिन इजरायल द्वारा इन समूहों के शीर्ष नेतृत्व (जैसे नसरल्लाह) को खत्म करने के बाद, ईरान का यह सुरक्षा घेरा कमजोर हो गया है, जिससे वह सीधे युद्ध के मैदान में उतरने को मजबूर हुआ है. चेतन इस बात पर जोर देते हैं कि इजरायल और अमेरिका की सैन्य तकनीक के सामने ईरान की पुरानी सैन्य व्यवस्था टिक नहीं पा रही है. यह 'असममित युद्ध' (Asymmetric Warfare) ईरान को भारी नुकसान पहुंचा रहा है.

लेखक चेतावनी देते हैं कि ईरान अपनी हताशा में वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित कर सकता है. यदि ऐसा होता है, तो भारत जैसे विकासशील देशों के लिए कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू लेंगी, जिससे घरेलू मुद्रास्फीति और बजट बिगड़ सकता है. चेतन भगत के अनुसार, ईरान एक ऐसे कोने में फंस गया है जहाँ से बाहर निकलने का उसे कोई रास्ता नहीं दिख रहा. उनकी सलाह है कि दुनिया को इसे ईरान की 'चाल' समझने के बजाय एक 'हारे हुए खिलाड़ी' के अंतिम दांव के रूप में देखना चाहिए, जो पूरी दुनिया को संकट में डाल सकता है.

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