
advertisement
झारखंड आंदोलन ने एक से बढ़ कर एक नेता को देखा. इसमें जयपाल सिंह,शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो, निर्मल महतो, एनई होरो, एके राय, शैलेंद्र महतो और देवेंद्र मांझी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि शिबू सोरेन ने जंगलों और पहाड़ों के बीच रह कर झारखंड आंदोलन को जितना धारदार बनाया,उसने अलग राज्य बनाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की. लंबे आंदोलन में कई ऐसे मौके आए जब शिबू सोरेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने या गोली मारने का भी आदेश दिया गया था.
जो लोग शिबू सोरेन को 1993 से देख या पढ़ रहे हैं, वो असली शिबू सोरेन को नहीं समझ सकते. असली शिबू सोरेन को समझने के लिए 1993 से पहले के शिबू सोरेन को समझना होगा. दरअसल 1993 और उसके बाद शिबू सोरेन के जीवन में कई ऐसी घटनाएं घटीं, जो पुराने संघर्षशील शिबू सोरेन पर हावी हो गईं. उन पर कई तरह के गंभीर आरोप लगे, जेल तक जाना पड़ा और उन्हें कई बार मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा. हालांकि बाद में सभी मामले में वे निर्दोष करार दिए गए. लेकिन देश यही जानता रहा कि शिबू सोरेन विवादित राजनेता हैं. इसलिए शिबू सोरेन के दूसरे चेहरे (संघर्षशील, मानवीय) को भी समझना होगा.
1957 का साल शिबू सोरेन के जीवन में टर्निंग प्वाइंट रहा. उसी वर्ष उनके पिता सोबरन मांझी की महाजनों ने हत्या करवा दी थी. वे गांधीवादी थे और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे. हत्या के बाद शिबू सोरेन ने स्कूल में ही पढ़ाई छोड़ दी और महाजनों से बदला लेने के लिए कूद पड़े. उन दिनों आदिवासियों (यहां खास कर संथालों की जमी पर ) की जमीन पर महाजन कब्जा कर लेते थे. हड़ियां-दारू पिला कर उनकी जमीन हड़प लेते थे.महाजनों का आतंक इतना था कि कोई कुछ बोल नहीं पाता. सब कुछ आदिवासी सह लेते थे, कोई उन्हें एकजुट करनेवाला नहीं था.
आदिवासियों के खेत पर गैर-आदिवासियों-महाजनों और जमींदारों ने कब्जा कर रखा था. उसमें वे धान रोपते थे और उसी खेत में आदिवासियों को काम करना पड़ता था. अनाज महाजन ले जाते थे. शिबू सोरेन ने संथाल युवकों एकजुट किया था और उन्हें तीर-धनुष से लैस कर दिया था.
मूल मंत्र था-खेतों में धान महाजन लगाये लेकिन जब फसल तैयार हो जाए तो हजारों आदिवासी खेतों को घेर लें और फसल काट कर ले जाएं. फिर उसे तीन हिस्सों में बांट लें. एक हिस्सा उसका होगा जिस आदिवासी का वह खेत पहले था. दूसरा हिस्सा काटनेवालों में बंटेगा. तीसरा हिस्सा आंदोलन के लिए और गांव में आपात स्थिति के लिए रहेगा. धान काटो अभियान के तहत महाजनों की और से गोलियां चलती थीं और आदिवासियों की ओर से तीर. कई लोग मारे गए लेकिन इस आंदोलन ने आदिवासियों को एकजुट कर दिया. उनके अंदर एक विश्वास जगा दिया था. उन्हें लगा था कि शिबू सोरेन के रूप में उन्हें एक ऐसा नेता मिला है, जो महाजनों के आतंक से उन्हें मुक्त करा सकता है.
धीरे-धीरे शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी जिले को अपना ठिकाना बनाया. वह पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच पलमा नाम की जगह पर रहते थे. बाद में पोखरिया में उन्होंने आश्रम खोल ने धनबाद जिले के टुंडी क्षेत्र को अपना अड्डा बना लिया था. वह संथाल बहुल क्षेत्र था. वे पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच पलमा नामक स्थान में रहते थे. बाद में उन्होंने पोखरिया में आश्रम खोल लिया. आंदोलनों के दौरान महाजनों पर हमले हुए थे. इसके बाद पुलिस शिबू सोरेन को खोज रही थी. लेकिन उसकी हिम्मत नहीं होती थी कि वह पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच जाए.
शिबू सोरेन का आंदोलन इसलिए सफल हुआ क्योंकि उन्होंने आंदोलन के साथ साथ-साथ कई ऐसे काम किए जिनसे आदिवासियों को लाभ हुआ. जिस जमीन को शिबू सोरेन ने महाजनों के चंगुल से मुक्त कराया था, उस पर वे सामूहिक खेती करवाते थे. आदिवासियों को बताते थे कि कैसे उनकी आय बढ़ सकती है. कैसे वे खेती करें, उसकी जानकारी अपने कृषि मंत्री झगड़ू पंडित के माध्यम से बताते थे. खुद शिबू सोरेन अपने सहयोगियों के साथ छोटी-छोटी नदियों को बांध कर चेकडैम भी बनाते थे ताकि पूरे साल खेती की जा सके. मुर्गी पालन और सुअर पालन पर शिबू सोरेन जोर देते थे. पढ़ाने के लिए रात्रि पाठशाला खोला था, वह भी जंगलों में.
उन्हें पता था कि बगैर शिक्षित किए आदिवासियों का भला नहीं हो सकता है. शराब के वे खिलाफ रहते थे. शराबबंदी चलाते थे. खुद भी उन्होंने कभी शराब नहीं पी. जो शराब पीते पाया जाता, उसकी पिटाई भी करते थे. कहा जा सकता है कि टुंडी में एक ओर वे शोषकों और महाजनों के खिलाफ कड़ा रूख अपनाते थे, वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के बीच समाज सुधारक के तौर पर काम करते थे. शिबू सोरेन का क्षेत्र बढ़ता जा रहा था.
इसी बीच एक दारोगा की तोपचांची में हत्या हो गई थी. बड़ा हंगामा हुआ था. तब केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी. दिल्ली से आदेश आया कि किसी भी प्रकार शिबू सोरेन को गिरफ्तार किया जाए. उपायुक्त थे केबी सक्सेना. उन्होंने खुद जंगल मे जाकर शिबू सोरेन से मुलाकात कर उन्हें मुख्य धारा में लौटने की बात की. केबी सक्सेना, शिबू सोरेन के काम को देख कर प्रभावित हुए थे. उन्हों शिबू सोरेन को समझा कर समर्पण के लिए तैयार कराया था.
इसी बीच उनका तबादला हो गया था. बाद में शिबू सोरेन को नये उपायुक्त ने समर्पण करवाया था. उन्हें समझाया गया था कि जो काम वे आदिवासियों के लिए कर रहे हैं, उसमें सरकार भी सहायता करेगी. उसके बाद कुछ दिनों के लिए शिबू सोरेन जेल में रहे. फिर सक्रिय राजनीति में आ गये. शिबू सोरेन ने सामूहिक खेती का जो काम किया था, उसका अध्ययन करने के लिए दिल्ली से पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम आती थी, टुंडी के गांवों में जाती थी और उनके काम को देखती थी. उसके बाद धीरे-धीरे शिबू सोरेन ने टुंडी के साथ-साथ संथालपरगना को ठिकाना बनाया, लेकिन शिबू सोरेन का टुंडी का काम और संघर्ष आज भी याद किया जाता है. बाद में शिबू सोरेन के आंदोलन की दिशा बदल गयी और झारखंड राज्य की लड़ाई पर उन्होंने आंदोलन का फोकस किया. अनेक साथी इस आंदोलन में शहीद हो गए.
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे झारखंड आंदाेलन और झारखंड पर लंबे समय
से लिखते रहे हैं. झारखंड आंदाेलन समेत कई पुस्तकें लिख चुके हैं. )
ये भी पढ़ें : बिरसा मुंडा ट्रेंड के पीछे वो लड़ाई जो अंग्रजों के समय से है जारी
Published: 11 Jan 2020,09:25 AM IST