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ये 1960 और 70 के दशक की बात है. तब हर युवा क्रिकेटर इंग्लैंड जाने और वहां क्रिकेट खेलने के लिए बेताब रहता था. मैं भी कोई अपवाद नहीं था. मेरे स्कूल के दिनों से मेरे पेरेंट्स मुझे ये समझाने की कोशिश में रहते थे कि अगर किसी को क्रिकेट खेलना है, तो उसे इंग्लैंड में होना चाहिए. मेरा सपना क्रिकेट के मक्का यानी लॉर्ड्स के मैदान पर क्रिकेट खेलने का था.
आखिर 1979 में मेरी किस्मत तब खुल गई, जब मेरी कंपनी टाटा ऑयल मिल्स ने इंग्लैंड जाने के लिए मेरा टिकट स्पॉन्सर कर दिया. बस, उसमें ये शर्त जोड़ दी गई थी कि मैं वहां क्रिकेट खेलूंगा. स्वर्गीय राज सिंह डूंगरपुर ने तब मेरी बड़ी मदद की. उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि वे न सिर्फ मुझे इंग्लैंड में क्लब क्रिकेट खेलने में मदद करेंगे, बल्कि ये भी कि मुझे 1979 के विश्व कप के लिए वहां जाने वाली भारतीय टीम को बॉलिंग करने का मौका भी दिलाएंगे.
चूंकि अंग्रेजी का मेरा ज्ञान अच्छे स्तर का नहीं था, लिहाजा इंग्लिश इमीग्रेशन अथॉरिटी से क्लीयरेंस में ही मुझे 4 घंटे लग गए. आखिरकार मैं किसी तरह उन्हें समझाने में कामयाब रहा और इस प्रकार से इंग्लैंड की धरती पर पहली बार कदम रखने के लिए मैं बढ़ गया.
1979 का विश्व कप शुरू होने वाला था. मैं ओवल के ऐतिहासिक मैदान पर था. विश्व कप की शुरुआत से पहले मैदान पर इंग्लैंड की टीम अभ्यास करने वाली थी. ये मेरी किस्मत ही थी कि उसी मैदान पर मौजूद सुनील गावस्कर ने मुझे देख लिया और अगले ही मिनट मैं नेट पर भारतीय टीम को गेंदबाजी की प्रैक्टिस करा रहा था. मैंने तब सुनील गावस्कर, विश्वनाथ और अशोक मांकड जैसे खिलाड़ियों को 3 घंटे तक गेंदबाजी की. मुझे लगा कि मैं अब पूरी तरह से तैयार हूं लेकिन ये मेरे क्रिकेट के सफर की सिर्फ शुरुआत थी.
राजसिंह डूंगरपुर ने अपने वादे को पूरा किया और एडमॉनटन क्लब से अनुबंध में मेरी मदद की, चीजें काफी तेजी से मेरे हक में हो रही थीं. ये भरोसा कर पाना मुश्किल था कि एक ऐसा खिलाड़ी, जो कभी शिवाजी पार्क से बाहर खेला तक नहीं, वो अब इंग्लिश क्रिकेट की पवित्र धरती पर खेलने जा रहा है.
अगले 30 दिनों में मिडिलसेक्स लीग में मैंने 6 क्लब मैच खेले और इस दौरान 4 सेंचुरी लगाने में कामयाब रहा. इंग्लिश कंडीशन और वहां की ठंड के बारे में भारत में काफी चर्चा होती थी, लेकिन तेज विकेट के सिवा मुझे कोई फर्क महसूस नहीं हुआ. इंग्लैंड के महान तेज गेंदबाज जॉन स्नो उसी क्लब से खेलते थे, जिससे मैं खेल रहा था और वहां मुझे उनके साथ गेंदबाजी अटैक शुरू करने का मौका मिला. एक युवा क्रिकेटर के लिए इससे बड़ी बात भला और क्या हो सकती है. इसके बस एक साल बाद मैं भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बनकर इंग्लैंड के उसी मैदान पर था. 1979 में हुई इस शुरुआत और 2004 में इंडिया ए के कोच की शक्ल में इंग्लैंड के मेरे अनुभव के बीच मैंने वहां के चार दौरे किए. 1982, 1983 और 1986 में खिलाड़ी के तौर पर, जबकि 1996 में भारतीय टीम के कोच के रूप में.
मुझे अभी भी वो वक्त याद है, जब 1982 में इंग्लैंड दौरे के लिए मेरा चयन हुआ था. कई क्रिकेट पत्रकारों और कॉलम लिखने वालों ने कहा कि इंग्लिश कंडीशन के लिहाज से मेरा खेल फिट नहीं है लेकिन अपना अनुमान लगाते हुए उन्होंने मेरी इच्छाशक्ति का ख्याल नहीं रखा. मैं इस दृढ़निश्चय में था कि मैं कथित ‘मुश्किल इंग्लिश कंडीशन’ में अपने टैलेंट को साबित करने का रास्ता निकाल लूंगा.
मैं बाद के सालों में भी इस बात का जवाब ढूंढता रहा कि आखिर ये सब क्यों हुआ? शायद 1980 के दशक में टीम के अंदर की राजनीति इसकी वजह रही.
जब मैंने क्रिकेट से रिटायर होने का फैसला लिया, तब सिर्फ 30 साल का था और ये 1986 में भारत के इंग्लैंड दौरे के ठीक बाद हुआ. इस सीरीज के बाद टेस्ट मैचों की एक खास संख्या या एक खास साल तक खेलने की मेरी कोई इच्छा नहीं रह गई. लोग आज भी मुझसे पूछते हैं कि आखिर मैंने इतनी जल्दी अपना बल्ला क्यों टांग दिया? लेकिन इसके लिए मेरे अंदर कोई अफसोस या किसी के लिए शिकायत नहीं है. मैंने भारत के लिए इंग्लैंड में टेस्ट खेलने का अपना सपना पूरा किया.
मैं वास्तव में इस बात से चकित होता हूं कि खिलाड़ी और मीडिया आखिर क्यों इंग्लैंड के कंडीशन और मौसम को लेकर हौवा खड़ा करते हैं. वास्तव में मुझे तो लगता है कि इंग्लैंड में क्रिकेट के लिए परिस्थितियां दुनिया में सबसे बेहतर में से एक हैं. मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि अगर मैं इंग्लैंड में जाकर स्कोर कर सकता हूं, तो बाकी खिलाड़ी क्यों नहीं ऐसा कर सकते हैं. मैं ये भी कहना चाहूंगा कि इंग्लैंड के होटेल्स भारतीय होटेल्स के सामने कहीं नहीं ठहरते. उनके होटेल्स काफी छोटे हैं और उनके मुकाबले हमारे होटेल्स काफी अच्छी सुविधाएं मुहैया कराते हैं.
(इंग्लैंड में टेस्ट मैच के दौरान एक्शन में संदीप पाटिल। फोटो साभार : संदीप पाटिल)
Sandeep Patil in action during a Test match against England.(Photo Courtesy: Sandeep Patil)
जब मैं खिलाड़ी के तौर पर रिटायर हुआ, तो मुझे कोचिंग का जिम्मा मिला. मैं 3 टेस्ट मैचों की सीरीज के लिए 1996 में इंग्लैंड गई टीम का कोच था. मैं ये स्वीकार करता हूं कि ये दौरा एक कोच के रूप में मेरे लिए त्रासदी की तरह था.
मैंने इसके बाद 2004 में इंडिया ए टीम के साथ भी इंग्लैंड का दौरा किया, जिसमें गौतम गंभीर और दिनेश कार्तिक सरीखे खिलाड़ी मौजूद थे, जो बाद में भारत के लिए खेले. मैं इस जिम्मेदारी के लिए आज भी गर्व महसूस करता हूं.
अगर ए-टीम का कोई खिलाड़ी भारतीय सीनियर टीम के लिए खेलता है, तो एक कोच के तौर पर इससे बड़े गर्व की बात आपके लिए और क्या हो सकती है.
इसका कोई मतलब नहीं है कि क्रिकेट के पंडित क्या लिखते हैं और पूर्व क्रिकेटर क्या कहते हैं. मौजूदा भारतीय टीम को अपने भीतर विश्वास के भाव को बनाए रखना चाहिए. उन्हें इस भरोसे के साथ होना चाहिए कि वो इंग्लैंड में अपना दबदबा कायम करेंगे. टीम के सभी खिलाड़ियों के पास पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय अनुभव है. बस उन्हें अपनी क्षमता के हिसाब से अपना काम करना है. मुझे भरोसा है कि हम इंग्लैंड में इतिहास रच सकते हैं.
(लेखक पूर्व भारतीय क्रिकेटर हैं, जिन्होंने देश के लिए जनवरी 1980 से मई 1986 के बीच 29 टेस्ट मैच और 45 एकदिवसीय मैच खेला। इस दौरान इन्होंने टेस्ट मैचों में 1,588 और एकदिवसीय मैचों में 1,005 रन बनाए)
Published: 19 Jun 2018,04:37 PM IST