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राम मंदिर: कांग्रेस पार्टी का प्राण प्रतिष्ठा में नहीं जाने का फैसला एक घातक गलती है

धर्म, सिद्धांत और विचारधारा को भूल जाइए, राजनीति में जीत मायने रखती है.

सुतनु गुरु
नजरिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी.</p></div>
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मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी.

(फोटो: X/@INCIndia)

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लगभग हर कोई रामायण (Ramayana) की कहानियों से प्रभावित होता है. यहां हम दूसरे महाकाव्य - महाभारत से युद्ध, रणनीति और नैतिकता पर कुछ अंश बताते हैं. जब अर्जुन युद्ध के मैदान में यह महसूस करने के बाद घबरा जाते हैं कि उन्हें अपने परिवार के सदस्यों को मारना है, तो भगवान कृष्ण युद्ध में बाकी सभी चीजों पर विजय पाने के लिए धर्म की जीत के बारे में शाश्वत उपदेश देते हैं.

युद्ध के दौरान, युधिष्ठिर द्रोणाचार्य को आधा सच बताते हैं. भगवान कृष्ण सूर्य के साथ छल करते हैं ताकि अर्जुन जयद्रथ को मार सकें, और भीम दुर्योधन को मारने से पहले उसके साथ बेईमानी करता है. लक्ष्य एक ही था कौरवों को हराना. भगवान कृष्ण द्वारा प्रोत्साहित किए गए पांडवों ने निर्णय लिया कि, कभी-कभी, परिणाम अच्छा है तो बुरा साधन भी ठीक होता है.

अब, अगर आप राहुल गांधी को बोलते हुए सुनते हैं, तो उन्हें विश्वास हो जाता है कि वह और उनकी पार्टी, बीजेपी और नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधित्व वाली "विभाजनकारी, अलोकतांत्रिक, फासीवादी" ताकतों को हराने वाले धर्मी योद्धा हैं. अगर आप कांग्रेस पार्टी के समर्थक हैं, तो उनका इरादा और दृढ़ संकल्प प्रेरणादायक लगता है. इसके अलावा, अगर आप कांग्रेस समर्थक हैं, तो लक्ष्य हासिल करने में उनकी राजनीतिक रणनीति आपको रोने पर मजबूर कर देगी और निराशा में आपको बाल नोचने पर मजबूर कर देगी.

माना कि यह कलयुग है और इस युवराज का मार्गदर्शन करने और सलाह देने के लिए कोई भगवान कृष्ण नहीं हैं. फिर भी, कांग्रेस के पास प्रतिभाशाली, अनुभवी और चतुर दिमागों की कोई कमी नहीं है जो पार्टी को आगामी लोकसभा चुनावों में बीजेपी को जीत सौंपने से रोक सकते थे.

ओपिनियन पोल में 2024 में बीजेपी को बहुमत, लेकिन भारी जीत नहीं

22 जनवरी को अयोध्या में नए मंदिर में भगवान राम की मूर्ति के प्रतिष्ठा समारोह का 'बहिष्कार' करने का फैसला अर्जुन के युद्ध के मैदान से दूर जाने जैसा आत्मघाती है. लेखक आश्वस्त है कि लोकसभा चुनाव एक साफ-सुथरा मामला है और नरेंद्र मोदी लगातार तीन लोकसभा जनादेश जीतने के राहुल गांधी के परनाना के रिकॉर्ड की बराबरी करेंगे.

राम मंदिर पर कांग्रेस का बयान.

(फोटो: क्विंट द्वारा प्राप्त)

इसका एक प्रमुख कारण यह होगा कि कांग्रेस ने राम मंदिर मुद्दे पर कैसा व्यवहार किया है. कई विश्लेषकों और टिप्पणीकारों ने पहले ही इसके धार्मिक पहलुओं के बारे में बोला और लिखा है और बताया है कि कैसे यह मंदिर उन लोगों के लिए भी भारतीय सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक बन गया है जो हिंदुत्व समर्थकों के रूप में नहीं गिने जाते हैं.

लेखक के पास असल में इसमें जोड़ने के लिए कुछ भी नहीं है. लेकिन, आखिरकार, यह राजनीति है, और किसी को उस राजनीतिक आत्महत्या पर गौर करने की जरूरत है जो कांग्रेस पार्टी करने पर आमादा है.

हाल ही में सीवोटर के सर्वेक्षण सहित लगभग सभी ओपीनियन पोल, लोकसभा चुनाव में बीजेपी को साधारण बहुमत तो दे रहे हैं, लेकिन प्रचंड बहुमत नहीं. उनमें से सभी पोल दिखाते हैं कि बीजेपी को केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बिल्कुल भी फायदा नहीं हो रहा है.

इनमें से ज्यादातर राज्यों में, क्षेत्रीय दलों ने 2019 में मोदी के रथ को सफलतापूर्वक विफल कर दिया और 2024 में भी ऐसा ही करने का अनुमान है. उस हद तक, कोई यह कह सकता है कि INDIA ब्लॉक के बीच एक सफल सीट-बंटवारे की व्यवस्था है. साझेदार यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि बीजेपी इन राज्यों में चुनावी रूप से कमजोर बनी रहे.

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राजनीति में जीत अहम

किसी भी रणनीतिकार के लिए, और कांग्रेस में बहुत सारे रणनीतिकार मौजूद हैं, पार्टी और उसके सहयोगियों के लिए स्पष्ट लक्ष्य बीजेपी को 250 या 240 सीटों से भी कम पर लाना है. अगर ऐसा होता है, तो मोदी उतने कद्दावर नेता नहीं रहेंगे, जितने 2014 के बाद से हैं.

हो सकता है कि वह अब भी 'फ्रेंडली' विपक्षी दलों द्वारा समर्थित गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हों, लेकिन प्रधानमंत्री की अजेय होने की चमक खत्म हो जाएगी. असल में, यह हर कांग्रेस नेता, कार्यकर्ता और समर्थक का सपना है.

लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब कांग्रेस मध्य, उत्तरी और पश्चिमी भारत में जरूरी बदलाव दर्ज करेगी, जहां आमतौर पर उसका सीधा मुकाबला बीजेपी से होता है. बीजेपी को 240 से नीचे लाने के लिए, राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली और उत्तराखंड में लगभग 50 सीटें जीते, जहां 2019 के चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर बीजेपी की तुलना में 15 फीसदी से 35 फीसदी तक कम था.

लेकिन प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण ठुकराने से कांग्रेस के लिए इसे पूरा करना लगभग असंभव हो गया है. एक बार फिर, धर्म को भूल जाइए. राजनीति में जीत अहम है.

संघ परिवार द्वारा समर्थित बीजेपी की संगठनात्मक मशीनरी पहले से ही इस संदेश के साथ शहर में जा रही है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी बनी हुई है. अब, इन द्विपक्षीय मुकाबलों में, अल्पसंख्यक (ज्यादातर मुस्लिम) वोट वैसे भी कांग्रेस पार्टी को जा रहे थे. यहां तक ​​कि एक स्कूल जाने वाला बच्चा भी जानता होगा कि हिंदू मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को बीजेपी से दूर करने में ही असल खेल छिपा है.

किसी से भी पूछें, 'सिद्धांत और विचारधारा' के मामले में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का 'बहिष्कार' आम हिंदू मतदाता को, जो पहले से ही राम से प्रेरित है, कांग्रेस को वोट देने के लिए कैसे राजी होगा? कांग्रेस की नंबर एक प्राथमिकता क्या है: मोदी को तीसरे कार्यकाल से वंचित करना या 'डॉन क्विक्सोट टूर' में राहुल गांधी का अनुसरण करना? (दरअसल डॉन क्विक्सोट एक स्पैनिश उपन्यास है जिसमें अव्यावहारिक आदर्शवादी की कहानी है).

जाहिर है, सबसे पुरानी पार्टी ने बाद वाले को चुना है. हम सभी राहुल गांधी की सहनशक्ति, दृढ़ संकल्प और जुझारू भावना की प्रशंसा करेंगे क्योंकि वह अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में मणिपुर से मुंबई तक यात्रा करेंगे, ठीक उसी तरह जैसे हम में से ज्यादातर ने उनकी पहली भारत जोड़ो यात्रा की प्रशंसा की थी. लेकिन फिर, राम पर सवार होकर नरेंद्र मोदी एक और जनादेश हासिल करेंगे.

(सुतानु गुरु सीवोटर फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक हैं. यह एक ओपीनियन आर्टिकल है और ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट न तो उनका समर्थन करता है और न ही उनके लिए जिम्मेदार है.)

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