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अमेरिकी नेता बर्नाड बॉरुक ने एक बार उल्लेखनीय तौर पर कहा था, ‘’बुढ़ापा अक्सर उनकी जो असल उम्र है उससे 15 साल ज्यादा बड़ा होता है.” उनका आशावाद हमें बूढ़ा होने से कुछ बचाता है जब तक हम उम्रदराज होने की अनिवार्य प्रक्रिया से देर सवेर गुजरना शुरू नहीं कर देते. फिर हम बुजुर्ग की श्रेणी में आ जाते हैं ..वो अवस्था जहां हमारी अपनी चाह कम रह जाती है ..हम खुद भी बहुत कुछ नहीं चाहते हैं ..कभी कभी तो थोड़ा अलग-थलग और अकेला रखना पसंद करते हैं. और गलत तरीके से सठिया जाने जैसा महसूस करने लगते हैं या फिर कराए जाने लगते हैं. फिर अकेलापन और साथियों की कमी हमें अक्सर काटने दौड़ता है.
एक बात जो काफी मुश्किल था मानना वो यह था कि अब हमारे पास कोई रेगुलर जॉब यानि काम नहीं है और हम एक तरह से बेकार हो गए हैं और शायद इससे भी ज्यादा दुखद बात यह थी कि हमारे बाद जो आएगा वो हमारे काम को उसी तरह से कर सकता है जैसे हम कर रहे थे.भले ही वो बेहतर ना हों.
बीमार सेहत अक्सर किसी शिकारी की तरह हमारे पीछे पड़ा रहता है. हम अपना रोज का काम धंधा छोड़कर हॉस्पिटल के गलियारे में अपना समय बिताने को मजबूर रहते हैं.
मेडिकल खर्चे बढ़ते रहते हैं और ऐसे मुश्किल वक्त में इंश्योरेंस कंपनी के कुछ अति-कर्तव्यनिष्ठ चार्ली एक मामूली राशि को मंजूरी देने से पहले भी सिर चकराकर रख देते हैं. ऐसे समय में बहुत नफरत के साथ वो सभी भ्रामक विज्ञापन याद आते हैं जो मेडिकल इंश्योरेंस लेते वक्त भोले-भाले लोगों को लुभाने के लिए बीमाकर्ता बताते हैं.
करने के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं रहने से अक्सर बुजुर्ग लोग अपने बचे खुचे समय यानि सनसेट ईयर्स में अपने पुराने गुजरे वक्त को याद करते हुए बिताते हैं – जब उनका शासन अपने परिवार पर चलता था. वो फैसले लेते थे और अपने अंदर काम करने वालों पर उनका रौब रहता था. अक्सर वो बात बात में कहेंगे "वे दिन थे,दोस्त," "लेकिन, दुख की बात है कि अब वो दिन नहीं रहे !"
कई बुजुर्ग तो खुद को अपने किसी शौक या शगल में बिजी रखते हैं, ताकि उनके अकेलेपन और अलगाव की भावना कम रहे. टेलीविजन भी इसके लिए अच्छा उपाय है. लेकिन अकल्पनीय और दोहराव वाले विज्ञापनों के साथ टीवी स्क्रीन पर कोई कब तक नजर टिकाए रख सकता है ?
तथ्य यह है कि व्यक्तिगत शौक का पीछा करना (चाहे वह उनके बारे में कितना भी भावुक क्यों न हो) सामाजिक संपर्क का कोई विकल्प नहीं है, जो दोस्ती से वंचित बुजुर्गों के लिए जीवन रेखा से कम नहीं है और इसके मायने हैं.
अब अपने काम से रिटायर हो चुके जाने-माने बिजनेसमैन रतन टाटा, जो अपने 85 वें साल को भी थोड़ा हल्के में ही लेते हैं ने खुलासा करते हुए कहा, "आप नहीं जानते कि अकेला होना क्या है!" यह सिर्फ जो अकेले होते हैं वही जानते हैं ‘
वे तीव्रता से अलगाव और किसी का साथ नहीं होने की कमी की तकलीफ को महसूस करते हैं . और यह तब और बढ़ जाता है जब किसी ने अपने जीवन साथी को खो दिया हो. इस गंभीर रूप से महसूस की गई समस्या को कम करने के लिए बुजुर्गों की देखभाल करने वाली एजेंसियां भी बहुत कम ध्यान देती हैं.
अलगाव और अकेलापन शायद किसी भी शारीरिक बीमारी की तुलना में बुजुर्गों की बीमारी रखने में ज्यादा बड़ा फैक्टर है. सामाजिक संपर्क की कमी से पैदा होने वाली अवसाद और मानसिक बीमारी बढती उम्र में कमजोर दिमाग पर कहर ढा सकती है. क्या केयरटेकर और रिश्तेदार इस संबंध में बुजुर्गों की दुर्दशा के प्रति सहानुभूति रख सकते हैं? शायद नहीं, क्योंकि उनकी समस्याओं के बारे में एक बुजुर्ग ही दूसरे बुजुर्ग को बेहतर तरीके से समझ पाता है. इसके लिए समान होना जरूरी है तभी सहानुभूति आती है.
कई लोग उम्र को केवल एक नंबर मानकर इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते .. आसानी से यह भूल जाते हैं कि यह नंबर ही किसी को बूढ़ा या युवा बनाता है. विरोधाभास यह है कि मनुष्य लंबे समय तक जीना पसंद करता है, लेकिन कोई भी बूढ़ा होना पसंद नहीं करता है. बुजुर्ग होने के कई अपने नुकसान हैं, जिसकी वजह से लोग बुढ़ा होना पसंद नहीं करते. बूढ़े होने का मतलब ही बीमार होना और अपनी सेहत के लिए दूसरे पर निर्भर होना हो जाता है.
लोग कहते हैं कि उम्र होने के साथ ज्ञान और अनुभव आता है - साथ ही यह भी कि बुजुर्ग अपने प्रियजनों के लिए बोझ की तरह लगने लगते हैं, भले ही कोई कुछ भी क्यों ना कहें और अक्सर बुजुर्गों को वह देखभाल और ध्यान नहीं मिलता है, जिसके वे हकदार हैं, इसके अलावा उनके प्रियजन (जिस पर वे निर्भर हैं) अपने स्वयं के करियर और व्यक्तिगत प्रतिबद्धताओं के साथ अत्यधिक व्यस्त हैं.
भागमभाग वाले समय में अपने दायित्य और ड्यूटी में बैलेंस बनाना निश्चित तौर पर काफी मुश्किल है, लेकिन कठिन बाधाओं के बीच भी कई ऐसे लोग हैं, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता की सभी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाते हैं और उन्हें संतुष्ट रखते हैं ..ऐसे लोगों की संख्या समाज में और बढ़े..
(इस लेख को लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं, देश के कई बड़े पब्लिकेशन हाउस इंडियन एक्सप्रेस, टाइम ऑफ इंडिया में इनके लेख छपते रहे हैं. यह एक ओपिनियन पीस है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है.)
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