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ब्‍लॉग से | नागरिकों सवाल मत पूछो, बस अग्नि-परीक्षा दो!

न अगर, न मगर. सरकार ने सही काम किया! बस.

कमर वहीद नकवी
नजरिया
Published:
कतार में लगे लोग. (फोटो: द क्विंट)
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कतार में लगे लोग. (फोटो: द क्विंट)
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जिनके परिवार के लोग मर गये, वह ‘ख़ुश’ हैं! जिनके यहाँ शादियाँ रुक गयीं, वह भी ‘ख़ुश’ हैं! और वह भी ‘ख़ुश’ हैं, जिनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, जिनका काम-धन्धा, खेती-बाड़ी, रोज़ी-रोज़गार चौपट हुआ पड़ा है, जिन्हें रोटी जुगाड़ना दूभर हो रहा है, वह सब भी ‘ख़ुश’ हैं! सारा का सारा देश बैंकों की लाइन में दिनों और घंटों को बर्बाद कर ‘ख़ुश’ है!

जनता की यह 'अग्नि-परीक्षा'

नहीं, नहीं, मेरा सिर नहीं फिरा है. यह ख़ुशी की नयी परिभाषाएँ हैं, जो लिखी और बाँटी जा रही हैं. 'त्याग' की ऐसी अनन्त कथाओं का महाकाव्य यह देश रच रहा है और उस पर इतरा रहा है.

सही बात है! देश के जवान सीमा पर दुश्मनों को मिटाने के लिए मरते हैं, तो देश के नागरिक क्या काले धन को मिटाने के लिए नहीं मर सकते? पवित्र कार्य है, मरना चाहिए! कहा और अनकहा वक्तव्य यही है कि यह राष्ट्रहित का महायज्ञ है, आहुति सबको देनी ही चाहिए, देनी ही होगी! कहा जा रहा है कि इससे 'ईमानदारों' और 'बेईमानों' की पहचान हो जायेगी. यानी जनता की यह 'अग्नि-परीक्षा' है! खरा एक तरफ़, खोटा दूसरी तरफ़! जो खरे हैं, वह आग से हो कर सुरक्षित बाहर निकल जायेंगे, जो खोटे हैं, उन्हें तो 'भस्म' होना ही है!

पचास से ज़्यादा मौतें : न सरकार को अफ़सोस है, न बीजेपी को

इसीलिए पैसे न होने की हताशा में पचास से ज़्यादा मौतें हो जाने का न सरकार को अफ़सोस है, न बीजेपी को. न ही सड़कों पर कहीं कोई उबाल दिखता है. बल्कि लोग यानी बहुत-से लोग मानते हैं कि सत्तर साल पुरानी बीमारी को 'जड़ से ख़त्म' करने के लिए ऑपरेशन करना ज़रूरी था. और ऑपरेशन में तकलीफ़ तो होती है, इसलिए वह झेल रहे हैं. ईमानदारी की अपनी परीक्षा में वह क्यों फ़ेल हों भला?

(फोटो: Twitter)

'आनन्द-रत्न' के लिए प्रसव पीड़ा!

सरकार बता रही है कि जो हो रहा है, वह 'राष्ट्र हित' में है. प्रसव पीड़ा है. इसे झेले बिना 'आनन्द-रत्न' की प्राप्ति सम्भव नहीं. अभी झेलिए, आगे आनन्द आयेगा.

जो इस 'आनन्द' की आशा से झूम रहे हैं, मगन हैं, वह राष्ट्रवादी हैं. और जो इस 'आनन्द' वाले तम्बू में नहीं हैं, वह जो भी हों, सब काले धन वाले हैं, चोर हैं, बेईमान हैं, खोटी नीयत वाले हैं, भ्रष्ट हैं, राष्ट्रविरोधी हैं! तो कौन 'राष्ट्रविरोधी' हुआ?

समूचा विपक्ष और वह सारे अर्थशास्त्री, विशेषज्ञ, लेखक और पत्रकार, जो दुनिया भर में हुए अब तक के सारे विमुद्रीकरण के नतीजों का हवाला देकर बता रहे हैं कि न तो ऐसे प्रयोग कभी काले धन को निकालने में सफल रहे हैं, न ही कहीं ऐसा नतीजा हासिल हुआ कि इससे काला धन बनना बन्द हो गया हो. आमतौर पर हर जगह विमुद्रीकरण ने अर्थव्यवस्था को चोट ही पहुँचायी है.

मोदी जी ने कह दिया कि काला धन निकलेगा!

लेकिन कोई यह मानने को तैयार ही नहीं. उनकी ग़ज़ब की आस्था है कि दुनिया में चाहे जो हुआ हो, भारत में वैसा नहीं होगा. अब इसके आगे आप क्या बात करेंगे? मोदी जी ने कह दिया कि काला धन निकलेगा, तो निकलेगा? कह दिया कि अब इसके बाद से काला धन बन्द हो जायेगा, तो हो जायेगा. न अगर, न मगर. सरकार ने सही काम किया! बस.

कितना काला धन निकलेगा, इसके लिए तो दिसम्बर के बीतने का इन्तज़ार करना ही पड़ेगा. लेकिन पिछले दस दिनों में काले को सफ़ेद करनेवालों का धन्धा और आत्मविश्वास जैसा बढ़ा हुआ दिखता है, वह तो कुछ और ही कहानी कहता है! शायद यही वजह है कि नोटों की अदला-बदली को लेकर सरकार रोज़ नियम बदल रही है, उँगली पर 'अमिट स्याही' लगाने जैसे तरीक़े अपनाये जा रहे हैं.

और क्या नये नोटों के आने से काले धन का धन्धा रुक जायेगा?

नोटबंदी के आठवें दिन ही प्रधानमंत्री के अपने राज्य गुजरात ने बता दिया कि ऐसा सोचना शेख़चिल्लीपने से कम नहीं होगा. वहाँ तीन लाख की घूस पकड़ी गयी और वह भी दो हज़ार के नये नोटों में! जब लोग तीन-तीन दिन बैंकों में धक्के खा रहे हैं, तो घूस देने वालों ने चुटकी बजाते ही कैसे कर लिया इतने ज़्यादा नोटों का जुगाड़? उन्होंने दिखा दिया कि काले धन्धे वालों के हाथ कितने लम्बे होते हैं?

जो हमारे साथ, वह देश के साथ

लेकिन यह सब किसी को दिखता नहीं.

आस्थाओं के आगे न तर्क चलते हैं, न सवाल खड़े हो सकते हैं. वह गढ़ी ही इस तरह जाती है कि उसके चमत्कारी आभामंडल के पार किसी को कुछ न दिखे, और उसके जयकारों को भेद कोई आवाज़ कानों को न पहुँचे. और जो पहुँचे भी तो उसकी लठैत सेना की हुड़क इधर-उधर बहक रही भेड़ों को झुंड में लौटने पर मजबूर कर दे. दुनिया में धर्मों की सत्ता इसी सुपरहिट फ़ार्मूले पर चलती है.
(फोटो: AP)

अब यही देश के लोकतंत्र का मूलमंत्र है! देश को भेड़ों का झुंड बनाया जा रहा है. सोचना-समझना क्या, अच्छा-बुरा देखना क्या, जो हमारे साथ, वह देश के साथ. बाक़ी सब देश-विरोधी! इसलिए लोग वही बोल रहे हैं, जो आसपास के लोग बोल रहे हैं. या कुछ और बोलना चाहते हुए भी वह वही बोल रहे हैं, जो 'देशभक्त' बने रहने के लिए उन्हें बोलना चाहिए!

सवाल की गुंजाइश कहाँ?

(फोटो: Twitter)

इसलिए इस सवाल की गुंजाइश कहाँ कि पिछले चुनाव में जो अरबों रुपये फूँके गये थे, वह ईमानदारी से कमाये गये थे या बेईमानी से? इस सवाल की गुंजाइश भी कहाँ कि ईमानदारी की झंडाबरदार बनी बीजेपी ने अपने चन्दे का हिसाब चुनाव आयोग को अब तक क्यों नहीं दिया है? और इस पर भी चर्चा करने में किसी की रुचि नहीं है कि पिछले दस सालों में बीजेपी को 'अज्ञात स्रोतों' से सवा इक्कीस सौ करोड़ का चन्दा मिला है. वैसे काँग्रेस बीजेपी से आगे है. उसे सवा तैंतीस सौ करोड़ के चन्दे मिले. लेकिन बीजेपी 'ईमानदार' है, और काँग्रेस, बीएसपी (सिर्फ़ 448 करोड़ का चन्दा) वग़ैरह बेईमान हैं! लेकिन शरद पवार ईमानदार है!

अगर यही मनमोहन सरकार ने किया होता, तो?

इस विमुद्रीकरण के गुण-दोष को अगर अलग भी रख दें, तो भी इस मामले में अब तक सरकार की जैसी भयानक अकुशलता सामने आयी है, उस पर भी कोई बात नहीं. यह जगज़ाहिर है कि इसे लागू करने के पहले किसी ने कुछ नहीं सोचा कि किस तरह की समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं, वरना सरकार हर दिन नियम नहीं बदलती.

कैसे इतनी बड़ी आबादी के जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ किया गया? कल्पना कीजिए कि ठीक-ठीक ऐसा ही अगर मनमोहन सरकार ने किया होता, तो देश में आज क्या माहौल होता?

लेकिन अब है 'मास्टरस्ट्रोक' सरकार!

लेकिन यह मनमोहन सरकार नहीं, मोदी सरकार है. जिसका हर काम 'मास्टरस्ट्रोक' ही होता है. ऐसा जो आज से पहले किसी ने नहीं किया. इस सरकार का हर काम 'राष्ट्रहित' में होता है. उस पर सवाल करना मना है. उसका विरोध यानी राष्ट्र-विरोध. चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी के छवि-प्रबन्धकों ने उनका जो मिथक गढ़ा था, वह अब भी न सिर्फ़ बरक़रार है, बल्कि पिछले ढाई सालों में उस पर 'राष्ट्रहित' का मुलम्मा भी बड़े सलीक़े से चढ़ाया जा चुका है. जेएनयू, भारत माता की जय, पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक और अब काले धन के ख़िलाफ़ युद्ध, ध्यान से देखिए तो यह सब एक कड़ी में नज़र आते हैं.

छवि गढ़ने और तोड़ने की कला

(फोटो: AP)

इसीलिए एक आर्थिक सवाल को बीजेपी ने 'ईमानदार बनाम बेईमान' और 'राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रविरोधी' में बदल दिया. छवि गढ़ने और तोड़ने के मामले में नरेन्द्र मोदी का जवाब नहीं. इसीलिए जब अख़बारों में तसवीरें छपनी शुरू हुईं कि बीमार बूढ़ी औरतों को बैंकों से पैसा निकालने में कितनी दिक़्क़त हो रही है, तो देश को दिखाया गया कि देखिए मोदी जी की माता हीराबेन भी ख़ुद कैसे बैंक जा कर पैसे निकाल रही हैं.

सन्देश साफ़ है. अगर प्रधानमंत्री की माँ इस उम्र में इतना 'कष्ट' उठा रही है, तो शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरिए कि आप क्यों नहीं थोड़ा त्याग कर सकते!

क्यों याद आ रहे हैं जार्ज आरवेल?

अब यह अभियान विफल भी हो जाये तो बहस इसकी विफलता पर नहीं होगी. बल्कि इसे सफल बनाने के लिए अगले क़दम पर होगी. मोदी ख़ुद एलान कर चुके हैं कि अब इसके बाद बेनामी सम्पत्तियों को पकड़ा जायेगा. ज़रूरत पड़ी तो आज़ादी के बाद से अब तक के रिकार्ड खँगाले जायेंगे. कैसे होगी बेनामी सम्पत्ति की पहचान?

क्या हर सम्पत्ति पर नोटिस चिपकायी जायगी कि उसका मालिक अपने काग़ज लेकर सरकार के सामने पेश हो, बताये कि किस पैसे से उसने सम्पत्ति ख़रीदी और फिर सरकार से ईमानदारी का ठप्पा हासिल करे और न कर पाये तो अपनी सम्पत्ति गँवाये! बेनामी सम्पत्ति पकड़ने का और कोई तरीक़ा तो मुझे समझ में आता नहीं.

यानी नागरिकों के लिए ईमानदारी और राष्ट्रहित की अग्नि-परीक्षाएँ अभी और हैं. तैयार रहिए. राष्ट्रवाद के नाम पर पिछले ढाई साल से चल रहे खेल के पत्ते तो अब खुलना शुरू हुए हैं और मुझे जार्ज आरवेल का '1984' बेतहाशा याद आ रहा है.

(यह आलेख कमर वहीद नकवी के ब्लॉग ‘राग देश‘ से लिया गया है. इसमें उनके निजी विचार हैं. स्वतंत्र स्तम्भकार कमर वहीद नकवी पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चैनलों के न्यूज डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे. अपने ब्लॉग ‘राग देश’ में देश-दुनिया के ज्वलंत मुद्दों परअपनी राय देते रहे हैं.)

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