Members Only
lock close icon
Home Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Hindi Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019Opinion Created by potrace 1.16, written by Peter Selinger 2001-2019'लव जिहाद' कानून को लेकर गुजरात हाई कोर्ट ने वो देखा जो किसी और को नहीं दिखा

'लव जिहाद' कानून को लेकर गुजरात हाई कोर्ट ने वो देखा जो किसी और को नहीं दिखा

इंटरफेथ शादियों पर गुजरात हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश से शातिर तरीके से गिरफ्तारी के मामलों पर कुछ रोक तो लगेगी

जस्टिस अमर सरन
नजरिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>लव जिहाद कानून पर आया गुजरात HC का आदेश</p></div>
i

लव जिहाद कानून पर आया गुजरात HC का आदेश

(फोटो: क्विंट हिंदी)
✕

advertisement

गुजरात हाई कोर्ट ने एक सराहनीय काम किया है, जो बाकी हाई कोर्ट्स और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी नहीं कर पाया. बाकी की अदालतों ने धर्म परिवर्तन विरोधी कानूनों पर राज्यों को सिर्फ कारण बताओ नोटिस जारी किए (सच्चाई यह है कि ‘लव जिहाद’ से निपटने के लिए ही ये कानून बनाए गए हैं), लेकिन गुजरात हाई कोर्ट ने इस संबंध में तत्काल कार्रवाई की जिसकी तारीफ की जानी चाहिए.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों के धर्म परिवर्तन विरोधी कानूनों को चुनौतियां दी गईं लेकिन किसी को कोई अंतरिम राहत नहीं मिली. हां, गुजरात हाई कोर्ट ने 19 अगस्त को एक गंभीर अंतरिम आदेश जारी किया. इस आदेश में हाई कोर्ट ने उन प्रावधानों पर रोक लगा दी है जो शादी के लिए अपनी मर्जी से धर्म बदलने पर लागू होते हैं.

इस सटीक और तीखे अंतरिम आदेश को देने वाले हैं, चीफ जस्टिस विक्रम नाथ (इन्हें हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा दिया गया है) और जस्टिस बीरेन वैष्णव. यह आदेश संविधान और कई मामलों के निष्पक्ष विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है.

जजों ने क्या किया

जजों ने गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता (संशोधन) एक्ट, 2021 की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है. इन संशोधनों के जरिए गुजरात के धर्म परिवर्तन विरोधी कानून में नए प्रावधान जोड़े गए हैं ताकि इंटरफेथ शादियों के लिए धर्म बदलने पर प्रतिबंध लगाए जा सकें. इसके लिए पहले स्थानीय अधिकारियों से मंजूरी लेनी होगी.

हालांकि उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि ये नए प्रावधान तब तक इस्तेमाल न किए जा सकें, जब तक अंतिम फैसला नहीं दिया जाता. इस बीच गुजरात का धर्म परिवर्तन विरोधी कानून अब भी उन धर्म परिवर्तनों पर लागू है जो स्पष्ट रूप से धोखाधड़ी, प्रलोभन या जबरदस्ती का नतीजा हैं.

अब यह देखते हुए कि पुलिस बल कितना प्रतिकूल होता है, और प्रशासन की दिमागी सोच कितनी मर्दवादी और बहुसंख्यक प्रेमी होती है, हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि इस आदेश के जरिए उन लोगों को सजा देने की कोशिशों पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई जा सकती, जो इंटरफेथ शादियां करते हैं और जिनमें एक पक्ष धर्म बदलता है.

लेकिन जब तक मामले पर अंतिम रूप से फैसला नहीं हो जाता, तब तक इस आदेश के कारण शातिर तरीके से नालिश और गिरफ्तार करने के मामलों पर कुछ रोक तो लगेगी- और उम्मीद है कि उस समय तक यह संदिग्ध कानून दफन हो जाएगा.

गुजरात हाई कोर्ट ने वह देखा, जो किसी दूसरे को नहीं दिखा

चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वैष्णव ने इतनी तेजी से कार्रवाई इसलिए की, क्योंकि 2021 के संशोधन उन्हें मौलिक अधिकारों का हनन महसूस हुए.

इससे पहले धर्म परिवर्तन विरोधी कानून की धारा 3 में बल का इस्तेमाल करके, या प्रलोभन देकर या धोखाधड़ी से किसी का धर्म बदलवाना प्रतिबंध था. हालांकि नए संशोधन के बाद इसमें "विवाह द्वारा या किसी व्यक्ति की शादी करके, या किसी व्यक्ति को शादी करने में मदद करके" धर्म परिवर्तन पर रोक लगा दी गई.

जैसा कि आदेश में कहा गया है, यह संशोधन पहली नजर में गैरकानूनी धर्म परिवर्तन की एक नई श्रेणी का निर्माण करता है. जरूरी नहीं कि इसमें व्यक्ति का लैक ऑफ च्वाइस हो, यानी शादी के लिए व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म बदल सकता है (लैक ऑफ च्वाइस का मामला मूल कानून में मौजूद है, भले ही वह त्रुटिपूर्ण तरीके से हो).

अब शादी के लिए धर्म परिवर्तन या शादी के बाद धर्म परिवर्तन को भी अपराध बनाने की कोशिश की गई है. यूं 'शादी के जरिए या उसकी वजह से अवैध धर्म परिवर्तन' वाला प्रावधान 2018 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का विरोधाभासी है. यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने शफीन जहां बनाम अशोकन मामले- हादिया मामले में सुनाया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर व्यक्ति को अपनी पसंद से शादी करने का हक है, और यह हक उसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिला हुआ है. यह अनुच्छेद जीवन और व्यक्तिगत आजादी के हक की गारंटी देता है.

इसमें इस बात की आजादी भी शामिल है कि व्यक्ति किससे शादी करे, या प्रेम करे, या पार्टनरशिप करे और उसे यह तय करने का अधिकार भी है कि वह क्या खाए या क्या पहने या किसी भी विश्वास या आस्था पर अमल करे- उसे नास्तिक रहने का भी हक है. ये सभी व्यक्ति के मूलभूत अधिकार हैं और उसकी खुशी की खोज के लिए अहम हैं जिसमें समाज को दखल देने की कोई जरूरत नहीं है.

हाई कोर्ट ने नए प्रावधानों पर रोक लगाने का निर्णय देते समय (धारा 3 सहित), जहां तक वे शादी के जरिए धर्म परिवर्तन से संबंधित हैं, हादिया मामले का उल्लेख खास तौर से किया.

इस सिलसिले में 2017 का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी प्रासंगिक है. यह फैसला निजता के अधिकार पर नौ जजों की बेंच ने दिया था. इसमें जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की राय यह थी कि शादी करने का फैसला अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और स्वायत्तता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. इसके अलावा यह अधिकार अनुच्छेद 19 से भी जुड़ा हुआ है जो व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आजादी देता है. इसके अलावा अदालत ने यह भी कहा था:

“अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की आजादी के संवैधानिक अधिकार में किसी भी आस्था को चुनने का सामर्थ्य और दुनिया को अपनी पसंद को जताने या न जताने की आजादी भी शामिल है.”

आप इन बातों को अपने दिमाग में रखेंगे तो आपको हाई कोर्ट की पहल पर कतई हैरानी नहीं होगी. अदालत ने उन प्रावधानों के खिलाफ कार्रवाई की जो शादी के लिए धर्म परिवर्तन को व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं मानते और इन धर्म परिवर्तनों को अपराध बनाते हैं. भले ही धर्म बदलने वाला शख्स अपनी मर्जी से अपने जीवन साथी के धर्म को अपना रहा हो.

2021 के संशोधन में कुछ नए प्रावधान जोड़े गए हैं. इस सिलसिले में जजों ने खास तौर से सेक्शन 6 ए पर चिंता जताई. यह सेक्शन इंटरफेथ शादी करने वाले लोगों पर इस बात का सबूत देने का बोझ (बर्डन ऑफ प्रूफ) डालता है कि शादी किसी धोखे, प्रलोभन या जोर-जबरदस्ती से नहीं कराई गई है.

ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT

अंतरिम आदेश में कहा गया है कि इससे “इंटरफेथ शादी करने वाले पक्षों पर खतरा मंडराता है.”

संसद में केंद्र सरकार के जवाबों के बाद केरल में एनआईए जांच और प्यू रिसर्च के हाल के कुछ सर्वेक्षणों से पता चलता है कि लव जिहाद की साजिश वाली थ्योरी के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं. यह सिर्फ कार्यकारिणी की कल्पना का मामला है, और उन ताकतों के वैचारिक झुकाव का नतीजा जिन्होंने कानून बनाने वालों की आंखों पर पट्टी बांधी हुई है.

संविधान, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस बात की पुष्टि करते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी पसंद से किसी भी धर्म में शादी कर सकता है, या अपनी मर्जी के किसी खास धर्म को अपना सकता है.

ऐसे हालात में किसी के अपराधी साबित होने तक उसे निर्दोष मानने के सिद्धांत का पालन न करना, और आरोपी पर सबूत पेश करने का बोझ डालना, पूरी तरह से गैर अनुपातिक और बेबुनियाद है.

और न ही बाकी के कानूनों की दुहाई देकर हम इस प्रावधान को जायज ठहरा सकते हैं. ऐसे कई कानून हैं जो ऐसा करते हैं, जैसे इंडियन एविडेंस एक्ट का सेक्शन 113-बी (शादी के पहले सात साल में किसी विवाहित महिला की मौत की स्थिति में ऐसी पूर्वधारणा कायम की गई है), या एनडीपीएस एक्ट में, अगर नशीले पदार्थों से संबंधित कुछ अपराधों की बात आती है.

लेकिन इन कानूनों में भी यह पूर्वधारणा तभी कायम की जाती है, अगर फिजिकल फैक्ट्स साबित होते हैं, जैसे नशीले पदार्थ की बरामदगी (एनडीपीएस एक्ट के मामले में) या क्रूरता (सेक्शन 113-बी के मामले में), और यह दिमागी सोच से जुड़े एकमात्र आरोप पर निर्भर नहीं होता.

सबूत का बोझ आरोपी पर डाल देना, दरअसल प्रक्रियागत तर्क के मानदंड पर भी खरा नहीं उतरता, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1978 में मेनका गांधी फैसले में कहा था. तब एपेक्स कोर्ट ने कहा था कि व्यक्तिगत आजादी के अधिकार पर पाबंदी लगाने के लिए कानून द्वारा बनाई गई प्रक्रिया "सही और न्यायपूर्ण और निष्पक्ष" होनी चाहिए और मनमानी, काल्पनिक या दमनकारी नहीं होनी चाहिए.

यह आदेश इसलिए भी अलग है क्योंकि एकदम सही समय पर दिया गया है.

अगर अदालतें जनता से जुड़े मामलों, जैसे इन ‘लव जिहाद’ कानूनों, में अंतरिम राहत नहीं देतीं या तत्काल फैसले नहीं सुनातीं तो जनता, समाज के विभिन्न तबकों और जनहित, सभी को नुकसान पहुंचता है.

जैसे उत्तर प्रदेश के ‘धर्म परिवर्तन विरोधी’ कानून को ही लीजिए.

29 दिसंबर, 2020 को इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में गुजरात जैसे ही ‘लव जिहाद’ कानून के लागू होने के 30 दिनों के भीतर 14 मामले दायर किए गए. इनमें 51 लोग गिरफ्तार किए गए जिनमें से 49 लोग रिपोर्ट लिखे जाने तक जेल में बंद थे. टाइम्स ऑफ इंडिया के हिसाब से, 8 जुलाई, 2021 तक कम से कम 80 लोग जेलों में बंद थे.

उत्तर प्रदेश के कानून के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जो याचिकाएं दायर की गईं, उन पर कोई तत्काल अंतरिम आदेश नहीं जारी किए गए.

इसके विपरीत, जब अदालतें समय पर, महत्वपूर्ण कार्रवाई करती हैं तो क्या होता है?

याद कीजिए कि 14 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन और बीआर गवई ने महामारी के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा कराने की हैरत भरी खबर पर खुद संज्ञान लिया था. इसका क्या असर हुआ, इसे भी याद कीजिए.

जजों ने उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किए और दो दिनों के भीतर जवाब मांगा कि वह कांवड़ यात्रा के कार्यक्रम को क्यों जारी रखना चाहती है- इसके बावजूद कि उत्तराखंड ने कोविड की तीसरी लहर को ध्यान में रखते हुए इस यात्रा को रद्द कर दिया है.

इस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि वह पूर्व मंजूरी और कोविड प्रोटोकॉल के साथ इस यात्रा को छोटे पैमाने पर जारी रखेगी. लेकिन अदालत ने अनुच्छेद 21 के मद्देनजर 16 जुलाई के अपने आदेश में कहा,

“भारत के नागरिकों का स्वास्थ्य और उनके जीवन का अधिकार सर्वोपरि है. धार्मिक होते हुए भी अन्य सभी भावनाएं इस बुनियादी मौलिक अधिकार के अधीन हैं.”

अदालत की टिप्पणियों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने कांवड़ यात्रा के अपने फैसले को वापस ले लिया और एक हलफनामा दायर किया कि कांवड़ संघ स्वास्थ्य समस्या को देखते हुए कांवड़ यात्रा को छोड़ने के लिए राजी हो गया है.

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के एक और आदेश को याद किया जा सकता है. 31 मई, 2021 को जस्टिस वाईएस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में एक बेंच ने कोविड राहत और तैयारी से संबंधित एक मामले पर खुद ही संज्ञान लिया था.

जजों ने केंद्र की टीकाकरण नीति को "प्रथम दृष्टया मनमाना और तर्कहीन" करार दिया था. नीति के तहत राज्यों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे 18-44 वर्ष के लोगों के लिए टीकों की खरीद करेंगे और लोग इन टीकों के लिए खुद भुगतान करेंगे.

बेंच ने कहा था कि सरकार उसे इस नीति से संबंधित दस्तावेज दे और यह बताए कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए ऑनलाइन बुकिंग क्यों जरूरी है जबकि बहुत से लोगों को इसका एक्सेस नहीं होगा.

एक हफ्ते बाद प्रधानमंत्री ने खुद राष्ट्रीय टेलीविजन पर आकर यह घोषणा की कि केंद्र सरकार ने फिर से 18-44 वर्ष के लोगों के लिए टीके खरीदने और उन्हें उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी संभाल ली है.

एक और मामला भी याद कर लीजिए. सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के राजनीतिक कार्यकर्ता लिचोबाम एरेंड्रो को 19 जुलाई शाम पांच बजे तक तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था (मामले की सुनवाई के पहले दिन ही) ताकि एरेंड्रो की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो. उन्हें फेसबुक के एक पोस्ट के कारण एनएसए के तहत दो महीने तक कस्टडी में रखा गया. उन्होंने उस पोस्ट में महज इतना कहा था कि कोविड का इलाज विज्ञान से होता है, गोबर या गोमूत्र से नहीं.

इसके बाद न सिर्फ उन्हें तत्काल रिहा किया गया, बल्कि उनके खिलाफ एनएसए का हिरासत वाला आदेश भी वापस लिया गया क्योंकि स्थानीय अधिकारियों ने महसूस किया कि उन्हें अपने कार्यों के लिए अदालती कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा. अदालत ने एरेंड्रो की उस याचिका पर सुनवाई का फैसला किया है जिसमें उन्होंने अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की है.

इसके विपरीत भीमा कोरेगांव मामले में 84 साल के बीमार फादर स्टेन स्वामी को जमानत न देने और कस्टडी में उनकी मौत के चलते अदालतों और अभियोजन पक्ष की बहुत आलोचना हुई, चूंकि फादर स्टेन स्वामी के जमानत के अनुरोध पर विचार करने में बहुत देरी लगाई गई.

इसलिए तत्काल अंतिम आदेश देना, या कम से कम प्रभावशाली अंतरिम आदेश देना भी एक बड़ा मौका होता है- न्यायिक इतिहास में ऐसे कितने ही उदाहरण हैं, जब ऐसे आदेशों के बाद ताकत के नशे में चूर पत्थर दिल सरकारों के भी ‘दिल पसीजे हैं’.

(जस्टिस अमर सरन इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज हैं. यह एक ओपिनियन पीस है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

Become a Member to unlock
  • Access to all paywalled content on site
  • Ad-free experience across The Quint
  • Early previews of our Special Projects
Continue

Published: undefined

ADVERTISEMENT
SCROLL FOR NEXT