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ये गोरक्षक नहीं हैं, हफ्ता वसूली और मांस का धंधा करते हैं

गोमाता की सेवा करने का दंभ भरने वाला ये दल आखिर कौन चला रहा है? बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार विवेक अवस्थी 

विवेक अवस्थी
नजरिया
Updated:
(फोटो: Rahul Gupta/The Quint)
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(फोटो: Rahul Gupta/The Quint)
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अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तब गोरक्षा आंदोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं : हरिशंकर परसाई

अपने समय के सबसे बड़े व्यंगकार में से एक हरिशंकर परसाई जी ने जब ये पंक्ति लिखी थी तब शायद ही उन्हें अंदाजा होगा कि उनकी मौत के 21 साल बाद भी ये प्रासंगिक होगी.

गोरक्षक आखिर कौन हैं ?

  • गोमाता की सेवा करने का दंभ भरने वाला ये दल आखिर कौन चला रहा है?
  • क्या ये सचमुच गौ सेवा की भावना से ओत-प्रोत लोग हैं या भय और आतंक फैलाने वाले किसी गिरोह का हिस्सा?
  • क्या ये गोरक्षा के नाम पर उगाही करने वाले छुटभैय्या बदमाश हैं ?

उत्तर प्रदेश में राम मंदिर मुद्दे का असर खत्म होने के कई साल बाद हिंदुओं को एकजुट करने के लिए नया मुद्दा गरमाया है, और इस मुद्दे का झंडा थामा है गोरक्षक दल ने. कहने को तो ये दल किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े नहीं है लेकिन सही मायने में ये भगवा ब्रिगेड का हिस्सा हैं.

विडंबना ये है कि इस दल ने गायों की रक्षा का ठेका ले रखा है.

लेकिन क्या ये इस काम में ईमानदारी से लगे हैं? या इसके पीछे गहरी राजनीतिक साजिश है और इसकी आड़ में ये गोरक्षक अपनी दुकान चला रहे हैं?

क्या मिला जवाब?

मामूली छानबीन करने पर पता चला की जगह-जगह अचानक पैदा हुए गोरक्षक दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लम्पटों का एक गिरोह है जिनका गायों की सेवा करने से कोई लेना देना नहीं है. बल्कि ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े-बड़े मांस निर्यातकों को द्वारा भाड़े पर रखे गए टट्टू हैं. जो धर्म की आड़ में गोरक्षा के गंदे खेल को अंजाम दे रहे हैं.

(फोटो: iStock)

पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों के लोगों का कहना है कि शुरुआत में गोरक्षक दल के लोग माथे पर भगवा पट्टी बांधे, हाथों में डंडे लिए मोटर साइकिलों पर सवार होकर आते थे.

लेकिन जल्दी ही ये स्कार्पियो जैसी बड़ी बड़ी गाड़ियों में आने लगे. इतनी जल्दी इनकी तरक्की कैसे हुई? इतना पैसा अचानक कहां से आ गया? कौन इन्हें पाल रहा है?

पता चला कि बड़े मीट निर्यातकों ने छोटे निर्यातकों का धंधा चौपट करने के लिए ये हथकंडा अपनाया है जो कि काफी कारगर भी साबित हो रहा है.

ये सबको मालूम है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश मीट व्यवसाय का एक बड़ा केंद्र है. मेरठ में 8, अलीगढ़ में 18 और गाजियाबाद में 20 मीट फैक्ट्रियां हैं.

इनमें से मेरठ और गाजियाबाद की फैक्ट्रियां में मीट प्रोसेसिंग के साथ-साथ सीधे निर्यात की सुविधा है, जबकि अलीगढ़ से सड़क के रास्ते प्रोसेस्ड मीट इन फैक्ट्रियों में पहुंचाया जाता है.

गोशाला में गायों को चारी खिलाती एक महिला. (फोटो: PTI)

ये भी सच है कि बूचड़खाने भेजे जाने वाले पशु उन पशुओं से अधिक भाग्यशाली हैं जो गोरक्षकों के छापों में पकड़े जाते हैं. पकड़े जाने वाले पशुओं को सरकारी गोशालाओं में भेज दिया जाता है जिनकी हालत दयनीय है.

आमतौर पर इन गोशालाओं में गायें भूख प्यास और बीमारी से मर जाती हैं. और वे गायें जो सड़कों पर छोड़ दी जाती उन्हें चमड़ा उद्योग से जुड़े स्थानीय व्यापारी जहर देकर मार देते हैं. गायों की खाल दिल्ली के कसाब पुरा मार्केट पहुंच जाती है जहां इनकी काफी मांग है.

चुनावी मुद्दा न बने गोरक्षा- बीजेपी का इशारा

कैबिनेट मीटिंग के बाद ऑफिस के लिए रवाना होते पीएम मोदी. (फोटो: IANS)

हाल ही में प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में साफ तौर पर तथाकथित गोरक्षकों को आड़े हाथों लिया है. उत्तर प्रदेश बीजेपी को संकेत मिल चुका है कि आने वाले प्रदेश चुनाव में गोरक्षा को मुद्दा बनाने से बचें. क्योंकि गौ रक्षा दल के निशाने पर जब से दलित आने लगे तब से बीजेपी सतर्क हो गयी है और उसे मालूम है कि प्रदेश में विकास से अधिक दलित और पिछड़ा राजनीति का सहारा लेना होगा.

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Published: 10 Aug 2016,10:55 AM IST

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