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लोकसभा अध्यक्ष ने भले ही 23 दिसंबर को संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन कांग्रेस पर की गई अपनी यह टिप्पणी वापस ले ली हो कि उसकी ‘राष्ट्रहित’ में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर ज्यादातर लोगों को लगता है कि सुमित्रा महाजन सही बात कह रही थीं.
जुवेनाइल जस्टिस बिल और कुछ अन्य को छोड़ दिया जाए, तो पूरे सत्र में कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुआ. इसके लिए कांग्रेस की वही पुरानी रणनीति जिम्मेदार है, जिसमें वह संसद से जुड़े कामों को लटकाने में यकीन रखती है. यही रणनीति कांग्रेस को धीरे-धीरे अलोकप्रिय कर रही है.
कांग्रेस ने हाल ही में जिन कुछ मुद्दों को लेकर संसद की कार्यवाही बाधित की है, उनमें एक केंद्रीय मंत्री द्वारा दलितों के लिए दिया गया असंवेदनशील बयान, अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल का कथित असंवैधानिक आचरण और वित्तमंत्री अरुण जेटली के कार्यकाल में (2013 तक) दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट असोसिएशन (डीडीसीए) में हुए संदिग्ध सौदों की बात शामिल है. कांग्रेस को लगता है कि यह मुद्दे इतने बड़े हैं कि जब तक इन पर कार्रवाई नहीं होती, संसद को न चलने देना ही सही होगा.
लेकिन लोगों में फैल रही इस धारणा के बाद कि कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य नरेंद्र मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों को रोकना और उनके ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को झुठलाना है, पार्टी की मुश्किलें और बढ़ी हैं.
यही वजह रही कि संसद एक बार फिर गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) को पारित कराने में नाकाम रही, जबकि प्रधानमंत्री ने इसकी महत्ता देखते हुए खुद पहल की थी और सोनिया गांधी के साथ मनमोहन सिंह को भी अपने आवास पर चर्चा के लिए बुलाया था.
जब कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए जीएसटी बिल पास कराने की सोची थी, तो बीजेपी ने इसमें अड़ंगा लगाया था और कांग्रेस निश्चित रूप से बीजेपी से इसी बात का बदला ले रही है. कुछ समय के लिए आम लोगों ने इसे ‘जैसे को तैसा’ वाली बात मानकर नजरअंदाज कर दिया, लेकिन कांग्रेस की पैदा की गई रुकावटों का सिलसिला कुछ ज्यादा ही चला.
अब तो इस तरह के विरोध को देश की तरक्की में बाधा डालने के तरीकों के तौर पर देखा जाने लगा है. अंत में इन सुधारों के लागू होने में देरी से सिर्फ मोदी नहीं, बल्कि पूरे देश का नुकसान होगा.
इस तरह की रणनीति से खुद को भी नुकसान पहुंचता है, क्योंकि ऐसे मामलों में यह साफ दिखता है कि कांग्रेस और उसके नेता बेवजह ही ऐसी दिक्कतें पैदा कर रहे हैं. नेताओं को, विशेषकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को यह तय करना होगा कि संसद को बाधित करने की इस रणनीति को कहां तक खींचना चाहिए, क्योंकि इसके तहत संसद को निश्चित तौर पर सत्र दर सत्र लगातार बाधित नहीं किया जा सकता.
फिलहाल मां-बेटे की इस जोड़ी ने मोदी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है और ऐसी स्थिति में ला दिया है, जैसे शतरंज के खेल में कोने में जाने के बाद आप हिल-डुल नहीं सकते. चुनावों में मोदी की पार्टी का खराब प्रदर्शन और इस बात का बढ़ता यकीन कि वह तेज विकास के अपने वादे को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं, ने उनकी आलोचना का मौका दे दिया है. वहीं उनकी पार्टी में भी डीडीसीए जैसे मुद्दों पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
यह सही है कि एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को दूसरे की मुसीबतों से फायदा उठाने की इजाजत होती है, लेकिन 130 साल पुरानी एक पार्टी से यह भी उम्मीद की जाती है कि वह यह काम जिम्मेदारी से करेगी, खासकर तब, जब मामला देश की आर्थिक तरक्की का हो.
यदि कांग्रेस ने सरकार को एक मंत्री की दलितों के प्रति की गई असंवेदनशील टिप्पणी या राज्यपाल के पक्षपातपूर्ण रवैये को लेकर घेरा होता और इस पर चर्चा के लिए मजबूर किया होता, तो पार्टी की इतनी आलोचना नहीं होती. वहीं पार्टी ने परिपक्वता दिखाते हुए ऐसे मामलों को अलग रख सुधार उपायों से जुड़े बिलों को पारित कराना भी सुनिश्चित किया होता, तो पार्टी तारीफ की हकदार होती.
अब जबकि ऐसा लगता है कि कांग्रेस बहस से ज्यादा संसद को न चलने देने में दिलचस्पी रखती है, सोनिया और राहुल की छवि ऐसे नेताओं की बन रही है, जो अभी भी लोकसभा चुनावों में हुई अपनी करारी हार पचा नहीं पा रहे हैं और मनमुटाव की भावना अपने दिल से निकाल पाने में नाकाम रहे हैं. सामंती विचारधारा वाली उनकी पार्टी में कोई ऐसा है भी नहीं, जो इन्हें बताए कि वे गलत कर रहे हैं और लंबी अवधि में इसके घातक राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं.
ऐसा हो सकता है कि गुजरात और बिहार के चुनावों में मिली आंशिक सफलता के बाद कांग्रेस की हालत कुछ सुधरती देख पार्टी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को यह लग रहा हो कि वे सही रास्ते पर हैं. यह भी हो सकता है कि 2018 में सत्ता विरोधी लहर में बीजेपी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को गंवा दे और कांग्रेस के ये शीर्ष नेता संसद को बंधक बनाने की अपनी रणनीति को सही मानते हुए आगे भी जारी रखें.
हकीकत तो यह है कि राज्यों और कुछ खास इलाकों में मिली सफलता से सही राजनीतिक तस्वीर नहीं मिलती. सही तस्वीर तो सिर्फ आम चुनावों में ही सामने आती है. कांग्रेस का ध्यान 2019 पर होना चाहिए और इस बात का मूल्यांकन करते हुए होना चाहिए कि संसद को बाधित करते रहना कितना उसके हक में होगा.
यदि आप किसी भी टेलीविजन चैनल पर सांसदों की प्रस्तावित वेतन वृद्धि पर देश के आम लोगों की राय लें, तो लगभग सभी यही कहेंगे कि ‘काम नहीं, तो पैसा नहीं’. राजनेता बदनाम ही इसीलिए हुए हैं, क्योंकि उनके बीच कुछ ऐसे नेता भी हैं, जिनका आपराधिक इतिहास रहा है. लोकसभा के 543 में से 186 सदस्यों का अतीत संदिग्ध रहा है. 2009 की लोकसभा में यह संख्या 158 थी. इस पर भी लोग अगर देखें कि उनमें से कुछ नेता देशहित के खिलाफ काम कर रहे हैं, तो वह दिन दूर नहीं, जब लोगों का संसदीय राजनीति से विश्वास उठ जाएगा.
(अमूल्य गांगुली एक राजनीतिक विश्लेषक हैं. इस लेख में उन्होंने अपने व्यक्तिगत विचार रखे हैं. उनसे amulyaganguli@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. इस लेख की व्यवस्था आईएएनएस से की गई है.)
Published: 29 Dec 2015,05:34 PM IST